अग्नि आलोक
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भीतर से हर कोई रो रहा : हमारे हास्य-गुलाल से करें गाल गुलाबी!

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          कुमार चैतन्य 

*1. दवा में दम नहीं!*

          ~हरिशंकर परसाई

मेरे एक मित्र को पीलिया हो गया था। वह  अस्पताल में भर्ती थे। प्रभावशाली आदमी थे। सब डॉक्टर लगे थे। एक दिन मैं देखने गया तो पाया कि वे पानी की थाली में हथेलियां रखे हैं और एक पंडित मंत्र पढ़ रहा है। कार्यक्रम खत्म होने पर मैंने कहा- आप तो दो-दो इलाज करवा रहे हैं। एक  एलोपैथी का  और दूसरा यह जो पता नहीं कौन-सी ‘पैथी’ है। उन्होंने कहा- दोनों ही कराना ठीक है। परंपरा से यह चला आ रहा है। एलोपैथी का तो अभी की है। मैंने कहा- परंपरा ही  इसलिए पड़ी कि तब कोई वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति थी नहीं। थी भी तो लोग उससे डरते थे। विश्वास नहीं करते थे। पर अब पूरी वैज्ञानिक जांच के बाद आपका इलाज हो रहा है। मगर आप अवैज्ञानिक  परंपरा  का पालन भी करते जाते हैं। आपका विश्वास है किसमें? आप किस चिकित्सा से अच्छे होंगे?  मेरे उनके आत्मीय और खुले सम्बन्ध थे। वे बुद्धिमान आदमी थे। इसलिए इस तरह कह गया। वे सोचते रहे। फिर शांति से बोले- विश्वास तो मेरा कह लीजिए या अंधविश्वास- सब कुछ जानते हुए भी मेरे मन में यह खटका शुरू से बना था कि कुछ यह भी करा लेना चाहिए। मैं अस्पताल में भर्ती था। मेरे कमरे में दो बिस्तर थे। एक पर मैं पड़ा था और दूसरे पर एक युवा इंजीनियर। हम लोगों में अच्छी बातचीत होती। मरीज के पिता भी सम्पन्न और शिक्षित थे। एक दिन उस मरीज के पिता एक पुरोहित को ले आए। साथ में पूजा का सामान भी था।

वहां छोटा-सा अनुष्ठान होने लगा। मरीज के पिता मेरी तरफ देखकर कुछ झेंपे और बोले- दवा के साथ दुआ भी होनी चाहिए। अनुष्ठान खत्म होने पर इन सज्जन ने पुरोहित के हाथ में नोट दिए। उसने नोट गिने और उत्तेजित होकर कहा- यह क्या है? यह सत्तर रुपये हैं। आपने सवा सौ रुपये देने के लिए कहा था। इधर से यह तैश में बोले- कतई नहीं। आपने कहा था कि इच्छा अनुसार दे दीजिए। पुरोहित ने कहा- झूठ मत बोलिए। मैंने साफ कहा था कि सवा सौ लूंगा। दोनों काफी देर तक गर्म बहस करते रहे। आखिर में 80 रुपये लेकर पुरोहित  भुनभुनाते हुए चला गया।   

मैंने उस सज्जन से कहा- पुरोहित ने पहले मंगल कामना की थी। पर रुपये कम मिलने से वह आपके अमंगल की कामना करता चला गया। दोनों में से उसकी  कौन-सी  बात असर करेगी? वह सोचने लगे। उनके लड़के ने बिस्तर पर से कहा- मैंने बाबू जी को बहुत समझाया कि यह मत कराइए। सज्जन ने खिन्न भाव से कहा- अरे बेटे, मैं क्या समझता नहीं हूं। हमारे मन में यह बात है कि इसे भी करा लेना चाहिए। जिसे वैज्ञानिक स्वभाव और वैज्ञानिक दृष्टि कहते हैं, उसके विकसित होने में यही एक अटक है। अविज्ञान के युग में जो विश्वास, संस्कार और मन की प्रयासहीन क्रियाएं पड़ गई हैं, वे विज्ञान के ऊपर जाकर तत्काल प्रतिक्रिया कर देती हैं।

विज्ञान के प्रफेसर  हैं। प्रयोगशाला में पूरी तरह वैज्ञानिक हैं। कोई अंध-विश्वास नहीं मानते। मगर प्रयोगशाला के बाहर सफलता के लिए साई बाबा की भभूत, शनि-शांति, मंत्र-जाप कराते हैं। वैज्ञानिक तरीके से वे कार्य-कारण सम्बन्ध जानते हैं। वे पदार्थों के गुण जानते हैं। वे पदार्थों में परस्पर रासायनिक क्रिया जानते हैं। किसी वैज्ञानिक तरीके से वे भभूत और तरक्की का सम्बन्ध नहीं जोड़ सकते। वे खुद भी यह बता देंगे। पर फिर कहेंगे- भाई, संस्कारों से मन में यह बात पड़ी है कि इससे भी कुछ होता है। इस तरह विज्ञानी अविज्ञानी से लड़ता है और जीतता भी है। पर अंधविश्वास के मोर्चे पर विज्ञानी अविज्ञान से हार जाता है।

*2. किसका टेलीफोन?*

         ~शरद जोशी

बोर्ड लगा है। खादी भंडार। टेलीफोन की घंटी बजती है। वाला टेलीफोन की ओर देखता है।  ‘सुनिए, टेलीफोन है’, वह दूसरे से कहता है, जो सुस्त बैठा सड़क की ओर देख रहा है। ‘अब आप ही उठाइए!’ वह सिर टिकाए जवाब देता है, ‘उठाइए-उठाइए, हम हिसाब कर रहे हैं।’ काली जाकट वाला जोड़ लगाने लगता है। ‘हिसाब बाद को कर लीजिएगा, कौन जल्दी है, अभी फोन तो सुन लीजिए।’  उत्तर मिलता है, ‘आप तो कुछ कर नहीं रहे, फिर आप ही क्यों नहीं सुन लेते?’- काली जाकेट वाला कहता है। ‘आप जहां बैठे हैं उसके पास ही है, हाथ बढ़ाएंगे तो सुन लेंगे। हम यहां दूर बैठे हैं।’ सुस्त व्यक्ति सड़क से बिना नजर हटाए बोलता रहता है। काली जाकेट वाले ने उसे इस बार साफ समझाया। ‘प्रश्न यह नहीं है। हम उठ भी सकते हैं। पर सोचते हैं, कोई जरूरी फोन हो, तो आप ही उचित उत्तर दे सकेंगे।’ ‘अब उठ भी जाइए, घंटी बज रही है, जवाब दे दीजिए।’ इस पर दूसरे व्यक्ति ने सड़क से नजरें हटाकर उसकी ओर देखा और कहा, ‘क्या जवाब देना है?’ ‘अब फोन सुनिएगा तभी न कहिएगा कि क्या जवाब होगा। अभी से कोई कैसे बता सकता है?’ इस पर वह सुस्ती से गंभीर चेहरा लिए फोन की तरफ बढ़ा और उसे उठाने के पहले काली जाकेट वाले से बोला, ‘हम समझे शायद आप जानते हों। हलो, हलो। हां हम बोल रहे हैं खादी भंडार से। खादी भंडार। हां-हां। क्या कहा कपड़ा चाहिए? तो यहां कपड़ा ही तो बिकता है और क्या, आइए और ले जाइए। जी, हां जी, कहां से बोल रहे हैं? थियेटर से?

‘थियेटर का भी कपड़ा है, पड़दा-उड़दा लगाना है क्या? शौक से लगाइए। रंगीन कपड़ा है छापादार, जौन रंग का कपड़ा चाहिए, तीन रंग का कपड़ा ले लीजिए। या यों तो रंगवा लीजिए। थियेटर का कपड़ा तो बहुत है। क्या कहा? ऑपरेशन थियेटर से बोल रहे हैं? कहां लगा है यह आपका थियेटर? हां, हां, ऑपरेशन थियेटर। अरे हमहू देखेंगे। ऐसी क्या बात है साहेब। हैं! अस्पताल में! अस्पताल में थियेटर लगा है! वाह, आप अस्पताल से बोल रहे है? और क्या। थियेटर में फोन नहीं होगा ना! अरे साहेब, हम क्या गलत समझ रहे! आप जो बोल रहे. सो ही समझ रहे। कोई डॉक्टर-आक्टर का तमाशा है, नर्स-उर्स। नहीं, अरे, हम क्या गलत समझे? जो आप बोल रहे सो ही समझे। थियेटर में तो रंगीन कपड़ा चलता है। देखिए श्रीमान जी, आप यहां आ जाइए और जैसा चाहिए, ले जाइए। ऑपरेशन थियेटर या जौन भी थियेटर हो। नमस्कार, हां जी, नमस्कार!’

*3. तंज़ के तीर*

       ~मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी

– दुश्मन तीन तरह के होते हैं। दुश्मन, जानी-दुश्मन और रिश्तेदार।

– प्राइवेट अस्पताल में मरने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि मरहूम की जायदाद और बैंक बैलेंस के बंटवारे पर औलादों में खून-खराबा नहीं होता क्योंकि सब डॉक्टरों हिस्से में आ जाता है।

– ईजाद ( आविष्कार)  और औलाद के लच्छन पहले ही से मालूम हो जाया करते तो दुनिया में न कोई बच्चा होने देता और न ईजाद।

– आदमी एक-बार प्रफेसर हो जाए तो उम्र-भर प्रफेसर ही रहता है, भले ही बाद में समझदारी की बातें ही क्यों न करने लगे।

– मेरा ताल्लुक उस भोली-भाली नस्ल से है जो यह समझती है कि बच्चे बुज़ुर्गों की दुआओं से पैदा होते हैं।

– कुछ लोग इतने धार्मिक होते है कि जूता पसंद करने के लिए भी धार्मिक स्थलों का रुख करते हैं।

– सिर्फ 99 प्रतिशत पुलिस वालों की वजह से बाकी 1 प्रतिशत भी बदनाम हैं।

– हमारे मुल्क की अफवाहों की सबसे बड़ी खराबी यह है कि वे सच निकलती हैं।

– ग़ालिब दुनिया में इकलौता शायर है जो समझ में न आए तो दोगुना मज़ा देता है।

– मूंगफली और आवारगी में खराबी यह है कि आदमी एक दफा शुरू कर दे तो समझ में नहीं आता, खत्म कैसे करें।

– हमारे ज़माने में तरबूज इस तरह खरीदा जाता था जैसे आजकल शादी होती है – सिर्फ सूरत देखकर।

– बुढ़ापे की शादी और बैंक की चौकीदारी में ज़रा भी फर्क नहीं, सोते में भी एक आंख खुली रखनी पड़ती है।

– जो देश जितना गरीब होगा, उतना ही आलू और मजहब का चलन ज्यादा होगा।

– इंसान वह हैवान है जो अपना ज़हर दिल में रखता है।  

– ताश के जितने भी खेल हैं वे मर्दों ने एक-दूसरे को चुप रखने के लिए ईजाद किए हैं।  

– खाली बोरी और शराबी को कौन खड़ा कर सकता है।

– बंदर में हमें इसके अलावा और कोई ऐब नज़र नहीं आता कि वह इंसान का जद्द-ए-आला (पूर्वज) है।

– इससे ज्यादा बदनसीबी और क्या होगी कि आदमी एक गलत पेशा अपनाए और उसमें कामयाब होता चला जाए।

– बीती हुई घड़ियों की आरज़ू करना ऐसा ही है जैसे टूथपेस्ट को वापिस ट्यूब में घुसाना।

– सुनने वाले और बोलने वाले, दोनों को मालूम हो कि झूठ है तो यह गुनाह नहीं है।

*4. एक आदर्श गांव*

         ~संपत सरल

आज भी जो यह मानते हैं कि भारत की आत्मा गांव में बसती है मेरे ख्याल में उन्होंने गांव उतने ही देखे हैं जितनी कि आत्मा। जिस आदर्श गांव का जिक्र आज मैं करने जा रहा हूं वैसे तो वह शहर से 10 किलोमीटर दूर है। चूंकि रास्ते में शराब के कई ठेके पड़ते हैं तो यह दूरी घटती-बढ़ती रहती है। कहते हैं इस आदर्श गांव को किसी जालिम सिंह नामक व्यक्ति ने बसाया था जो निहायत ही ईमानदार और परोपकारी डाकू थे क्योंकि निर्वाचित नहीं थे।

हालांकि बाद में उन्होंने भी डाकू जीवन से वीआरएस लेकर पॉलिटिक्स जॉइन कर ली थी। उनको यह समझ आ गया होगा कि एक डाकू को जिनके यहां डकैती करने जाना पड़ता है चुनाव जीत लेने पर वे ही लोग घर बैठे दे जाते हैं। यों भी अपराध और राजनीति में वोटिंग का ही अंतर तो रह गया है।

     आदर्श गांव में दसों दिशाएं, तीनों मौसम, बारहों महीने और सातों बार होते हैं। बस एक तो गांव के उत्तर में हिमालय नहीं है और तीनों तरफ से समुद्र से घिरा हुआ नहीं है। अगर डाकू जालिम सिंह आज जीवित होते तो ये दोनों चीजें भी गांव में होती।

   गांव के लोग किफायती इस हद तक हैं कि मिस्ड कॉल भी अपने फोन से नहीं करते और दरियादिल ऐसे कि मिस्ड कॉल करने के बाद फोन करके पूछते रहते हैं कि मिस्ड कॉल मिला क्या? गांव में कुल 13 पर्यटक स्थल हैं- 3 शराब के ठेके, 1 मंदिर, 1 प्राइमरी स्कूल, 1 पुलिस चौकी, 2 कुएं और 5 श्मशान घाट। सरकारी ठेकों के बावजूद हस्तनिर्मित शराब को ही वरीयता दी जाती है ताकि ग्लोबलाइजेशन के इस भीषण दौर में आंचलिकता बरकरार रहे। गांव के अधिकांश लोग शराब पीते हैं, कई लोग नहीं भी पीते हैं। जो नहीं पीते हैं, वे पीने वालों को समझाते-बुझाते रहते हैं। उनके समझाने से जब पीने वाले नहीं समझते तो दुखी होकर वे भी पीने लगते हैं।

    लोगों में सरकारी नौकरियों के प्रति बड़ा मोह है। सबका प्रयास रहता है कि काम ऐसा हो जिसमें काम न हो। जहां तक काम का सवाल है, मेहनत करने वाले को मजदूरी नहीं मिलती। जिसे मजदूरी मिल जाती है वह मेहनत बंद कर देता है। सबके आपसी संबंध गठबंधन सरकारों जैसे हैं अर्थात स्वार्थ ही दो लोगों को जोड़ता है। उम्र का फासला भी रिश्तों में बाधक नहीं बनता। दिन में बेटे का जो क्लासफेलो होता है, शाम को वही बाप का ग्लासफेलो होता है।

*5. श्मशान में डिस्काउंट*

           ~प्रेम जनमेजय

मेरे मोहल्ले के पास श्मशान है। मेरे मोहल्ले में चिपकू कवि भी रहते हैं। इसे कहते हैं सोने पर सुहागा। ऐसे सोने पर सुहागे हम सबके जीवन में खूब हैं। जैसे हमारे राजनीतिक जीवन में चुनाव हैं तो वोट मांगते हमारे सेवक सत्तासेवी भी हैं, जैसे करेले-सा आलोचक है तो नीम-सा प्रकाशक भी है। तो कब आ रहे हैं आप हमारे यहां श्मशान देखने और चिपकू कवियों से मिलने।हे गद्यकार! क्यों कवियों-सी बे सिर-पैर  की हांक रहे हो। श्मशान को खूबसूरत बता रहे हो। माई-बाप मैं झूठ नहीं बोल रहा हूं, मुझे श्मशान को चुनाव थोड़े ही लड़ाना है, उसके लिए वोट भी नहीं जुटाना है। न ही मुझे अपने मोहल्ले को मोहल्ला श्री की पदवी दिलाने के लिए झूठा जनमत बनाना है। सच, मेरे मोहल्ले का श्मशान बहुत सुंदर है, इतना कि वहां रहने को देवता भी तरसते हैं और देवियां हवा-पानी बदलने के लिए आती हैं। आप तो जानते हैं अपने देश की औरतों को, क्या मोल-भाव करती हैं! उनका बस चले तो मुफ्त में मुरदा जलवा लें। और क्या याददाश्त होती है इनकी! जब कोई औरत आंख मटकाकर कहती है- भाई साहब, पिछली बार तो आपने 25 पर्सेंट डिस्काउंट दिया था इस बार 20 ही दे रहे हैं। हम तो आपके पर्मानेंट ग्राहक हैं, औरों को भी आपका रेफरेंस देते हैं। अपनों से ऐसा व्यवहार और वह भी श्मशान जैसी पवित्र जगह पर। एक दिन सबको यहीं खाक हो जाना है।

 आपने ठीक कहा महानुभाव, श्मशान कोई सुंदर कन्या है जिस पर दिलफेंकुओं  मरने का दिल चाहे! हमारे मोहल्ले का श्मशान आज से कुछ साल पहले बदसूरत ही था जिस पर दिलफेकुओं का मरने का नहीं, उसे मारने का दिल चाहता। कोई गरीब मुर्दा ही इस श्मशान में जलने को आता था। पैसे वाले इज्जतदार मुर्दे तो निगम बोध घाट ही जाते थे। आप तो जानते ही हैं, अपनी संस्कृति की महानता। मरने के बाद भी मुर्दे के सामाजिक स्तर का ध्यान रखती है। आखिर मुर्दों की भी कोई इज्जत होती है! देखा जाए तो आजकल तो मुर्दों की ही इज्जत है। जो नैतिकता, ईमानदारी, मानवता आदि से मुर्दा हो गया, वही समाज में सम्मानजनक जीवन जी गया। गरीब का तो जीना गरीब और मरना तो उससे भी गरीब।

*6. ईश्वर की दो कहानियां*

         ~विष्णु नागर

{अ}.

एक बार एक पागल से ईश्वर का सामना हुआ। उसने सफाई दी, ‘मैं पागल नहीं हूं। मैं कहता हूं कि मैं ईश्वर हूं तो सब मुझे पागल समझते हैं जबकि मैं ईश्वर हूं।’ लेकिन ईश्वर ने कहा, ‘मगर ईश्वर तो मैं हूं, तुम नहीं।’ पागल ने जवाब दिया, ‘चुप-चुप। किसी ने सुन लिया तो तुझे भी पागल समझेगा।’ ईश्वर ने आसपास देखा, खुशकिस्मती कि किसी ने सुना नहीं था। वह चुपचाप आगे बढ़ गए।

{ब}.

एक दिन शाम के समय ईश्वर टहल रहे थे। उन्हें 6-7 साल की उम्र के कुछ बच्चे क्रिकेट खेलते मिले। वह खड़े हो गए और खेल देखने लगे। थोड़ी देर में बॉल गलती से उन्हीं की ओर आती दिखाई दी। वह फुर्ती से उस जगह से हटे। फिर भी वह बॉल उनके बगल से गुजरती हुई निकल गई। एक बच्चे ने कहा, ‘सॉरी अंकलजी।’

ईश्वर को उस बच्चे का माफी मांगना अच्छा लगा। उन्होंने मन-ही-मन में क्रिकेट को लोकप्रिय होने का आशीर्वाद दिया। तभी से क्रिकेट लोकप्रिय है और टेलीविजन पर दिन-रात दिखाया जाता है।

*7. जूते का प्रतिरोध*

         ~सूर्यबाला

जूते चिढ़ गए हैं इन दिनों। कहते हैं, यह हमारी तौहीन है। यह क्या कि हमें जिस-तिस पर उछाल दिया, जैसे हमारी कोई इज्जत ही नहीं।

बात सही है कि चिरकाल से हमारा निवास आदमी के पैरों में ही है और लोगों के सिर पर उछाली जाने वाली स्थिति हमारे लिए सुखद ही होनी चाहिए। आप डपटकर कह सकते हैं कि सदियों से पैरों से लगे घिसटते रहे, धूल-धक्कड़ फांकते रहे और आज हम तुम्हें लोगों के सिरों पर उछाल रहे हैं तो कृतकृत्य होने के बदले आपत्ति दर्ज करा रहे हो? शुक्र करो कि हमने तुम्हें जमीन से उठाकर 5 फुट ऊपर उछाल दिया। टीवी तक में धमाकेदार एंट्री हो गई। दनादन चैनलों में फ्लैश हो रहे हो और क्या चाहिए आदमी को, यानी तुम जूतों को?

लेकिन जूते अपनी जिद पर अड़े हैं। जूते हैं न! आदमी होते तो ऐसी पब्लिसिटियों पर मर मिटते लेकिन जूते इन्हें अपनी नोक पर लेते हैं। कहते हैं, यह जूतागीरी तुम आदमियों को ही मुबारक हो। हमारी तोb रूखी-सूखी यानी धूल-गर्द ही भली लेकिन देश-दुनिया के साथ मजाक करने वालों के साथ अपना नाम जोड़ा जाना हमें भी मंजूर नहीं है। दूसरी बात, हम जूते जरूर हैं लेकिन जूतमपैजारी में हमारा विश्वास नहीं। आदमी हो तो आदमी की तरह प्रतिरोध करना सीखो। जूतों के बहाने गुस्से का इजहार क्यों? हम ऐसे फेंके जाते हैं जैसे कोई सबसे गई-गुजरी बेगैरत चीज हों। अपमान और अवहेलना के प्रतीक। सोचने की बात है, आपके मकसद की संजीदगी लोगों तक पहुंचाने की मंशा होती तो समाचार चैनल जूतों को कम, आपको ज्यादा दिखाते न। लेकिन जानते हैं आज आदमी से ज्यादा जूता, संवेदना से ज्यादा सनसनी बिकती है सूचना क्रांति के बाजार में। इसलिए जूतागीरी  का कारोबार दिन-दूनी रात चौगुनी तरक्की पर है।

*8. लक्ष्यहीन होने का सुख*

        ~गिरीश पंकज

लक्ष्यहीन जीवन का सुख ही अलग है, बॉस! मैं लगातार इस सुख को एंजॉय कर रहा हूं। देर रात तक मोबाइल में लगा रहता हूं, मुन्ना भाई की तरह और सुबह आराम से उठता हूं, 10 बजे तक। कई बार तो दैनिक दिनचर्या करने का भी मन नहीं होता और बिना मुंह-हाथ धोए ही घर के बाहर निकल जाता हूं। पास के पान के ठेले पर जाकर गुटका चबाता हूं। सिगरेट फूंकता हूं। वहां मेरी ही तरह लक्ष्यहीन जीवन को एन्जॉय करने वाले दो-चार बंदे मिल जाते हैं। उनसे डिस्कस करता हूं कि पार्टनर! आज कौन-सी फिल्म देखनी चाहिए और किस मॉल में? अरे! मेरा भी अपना कुछ स्टेटस है! अब मैं शहर के सिनेमाहॉल में जाकर फिल्में नहीं देखता। और मुझमें रईसी इतनी है कि क्या कहूं! जब तक 700 रुपये का पॉपकॉर्न और कोल्ड ड्रिंक न पीऊं तो जबरदस्त ‘रिच फीलिंग’ ही नहीं आती। जब तक इतना खर्च न हो, लगता ही नहीं कि मॉल में आकर फिल्म देखी है।

यह और बात है कि घरवाले अक्सर मुझ पर चिल्लाते रहते हैं- ‘काम के न काज के, दुश्मन अनाज के। तुम फिजूलखर्ची बहुत करते हो। अरे, पहले तय तो कर लो कि तुम्हें जीवन में करना क्या है?’

तब मैं अपने डैड को साफ-साफ कह देता हूं- ‘वन्स अपॉन ए टाइम, गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा था न- ‘होइहै वही जो राम रचि राखा’- राम ने जो सोच लिया है, वही तो होगा न! इसलिए डोंट बॉदर अबाउट माय करियर। जो होगा अच्छा होगा।’

‘फेल होने के पीछे भी मेरा एक फंडा है डैड। नींव मजबूत हो। मेरे जो सब्जेक्ट हैं, उनको मैं गंभीरता से रट रहा हूं। सबको कंठस्थ कर रहा हूं। देखना, अगले साल में टॉप करूंगा।’मेरी बात सुनकर डैड बहुत जोर से हंसे। यह पहली बार हुआ कि उन्हें इस तरह हंसते हुए देखा। मुझे खुशी हुई।

*9. रामबाबू के जीवन में बसंत*

         ~ज्ञान चतुर्वेदी

मास्टर रामबाबूजी जैसा निबंध ‘बसंत’ पर कोई लिखवा नहीं सकता, ऐसा सारे छात्र कहते हैं। ‘दीपावली’, ‘विज्ञान के चमत्कार’, ‘चांदनी रात में नौका-विहार’ आदि लिखे, पर ‘बसंत’ वाले निबंध के क्या कहने! सही-सही रटा भर हो, फिर बोर्ड की परीक्षा में काहे का डर। बसंत का नाम परचे में पढ़ते ही छात्र एक-दूसरे को आंख मारते हैं कि ‘प्यारे आ गया अपना बसंत’। परीक्षा हॉल में जैसे कोयल कूकने लगती है फिर मास्टर रामबाबूजी चौड़ी छाती उठाये, बुलबुल-से सारे कमरों में घूम आते हैं और एक ही बात कहते हैं कि मैंने पहले ही कहा न कि इम्पोर्टेंट है। वैसे कुछ अध्यापक उनसे ईर्ष्या भी करते हैं और बसंत व उनके बीच के इस अलौकिक संबंध का ठट्ठा भी करते है पर उसकी रामबाबूजी को परवाह नहीं। वह बसंत के होकर रह गए हैं।

   रामबाबूजी पिछले 25 बरस से 35 रुपयों पर लगे थे, अब 150 पाते हैं। दांत गिर गए, स्कूल की छत गिर गई, उन पर कर्ज बढ़ता गया, पर वह बसंत पर अपने निबंध के सहारे चलते रहे। आठवीं कक्षा की परीक्षा बोर्ड की होती है। सभी लोग एक सलाह अवश्य देते हैं हिंदी में पास होना है तो रामबाबूजी से बसंत पर निबंध लिखवा लो। रामबाबूजी सुनते रहते हैं। यह बात उनके कान सुनना चाहते हैं। वह कान खड़ा किए स्कूल में घूमते हैं मार्च के महीने में तो जैसे चारों तरफ कोलाहल-सा उठता है। बसंत, बसंत, बसंत, रामबाबूजी यही सुनना भी चाहते हैं। रामबाबूजी बसंत पर फिर लिखवाते हैं। फिर-फिर पढ़ते हैं। हर साल फिर परीक्षा आती है, फिर बसंत पर निबंध पूछा जाता है। फिर रामबाबूजी की तारीफ होती है। हेड मास्साब कहते हैं कि रामबाबूजी ने बढ़िया लिखवा दिया था, स्साले सब निकल जाएंगे। रामबाबूजी शरमा जाते हैं। संक्षेप में कहें तो रामबाबूजी के जीवन में बसंत ही बसंत है, बस! परन्तु, क्या सचमुच रामबाबू के जीवन में बसंत है।

Ramswaroop Mantri

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