शशिकांत गुप्ते
सीतारामजी आज पुरानी फिल्मों को याद कर रहे थे,और वर्तमान दौर की फिल्मों की समीक्षा कर रहे थे।
प्रायः फिल्मों की कहानी कल्पनातीत ही होती है।
पिछले कुछ वर्षों से पुरानी फिल्मों के नाम से ही नई फिल्म निर्मित की जाती है।
कहानी में थोड़ा हेरफेर कर के फिल्म दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत की जाती है।
सीतारामजी को सन 1957 में प्रदर्शित फिल्म नया दौर का स्मरण हुआ।
सीतारामजी व्यंग्यकार है,इसलिए वे हर मुद्दे पर कटाक्ष ही करते हैं।
सीतारामजी मुझसे चर्चा करते हुए कहा कि,यदि नया दौर नाम से पुनः फिल्म निर्मित की जाए और मुझसे ही पटकथा लिखवाई जाए तो मैं निम्नानुसार कथा लिखूंगा।
फिल्म का नाम दौरे अच्छेदिन
फिल्मों की पटकथा में शुरुआत में सिर्फ और सिर्फ भावनात्मक कहानी होती है। फिल्म के मध्य से अंत तक हिंसा और अंत में सिर्फ पांच मिनिट में हिंसा का अंत हिंसा से ही होता है।
हां बीच में धार्मिक स्थानों पर भक्ति गीत अनिवार्य होता है।
कारण फिल्मी अभिनेता की अंतः भगवान ही रक्षा करता है। ऐसा दृश्य प्रत्येक फिल्म दर्शाया जाता है। यह अंधश्रद्धा को बढ़ावा देने के लिए नहीं,बल्कि दर्शकों में भावनात्मक रूप से भगवान के प्रति श्रद्धा बनी रहे इसलिए।
मैने पूछा आप फिल्म नया दौर के प्रसिद्ध गाने की पैरोडी कैसे लिखेंगे?
सीतारामजी ने कहा मैं अपनी व्यंग्यात्मक शैली में ही लिखूंगा।
यह देश है युवा बेरोजगारों का
रोजगार मांगने वालों को प्रताड़ित करने वालो का
यहाँ चौड़ी छाती नेताओं की
गिनती नहीं होती कुपोषण से पीड़ितों की
फिर भी गातें है भक्त स्तुति गान……. होय!!
यहाँ नित नित नए वादे होतें हैं
वादे सिर्फ कोरे वादे होते हैं
यहाँ अधखिली कली मसली जाती है
*
फिर भी हंसता है,बागवान गालों में
भक्त लोग करते है.. होय होय!
मैने कहा बस करों मैं समझ गया। अब जल्दी ही आप को भी जांच एजेंसियों की कतार में खड़ा किया जाएगा?
सीतारामजी ने जवाब में निम्न शेर सुनाए।
बहकाना मेरी फितरत में नहीं पर
संभलने में परेशानी बहुत है
रह-गुज़र का है तक़ाज़ा कि अभी और चलो
एक उम्मीद जो मंज़िल के निशाँ तक पहुँची
कश्तियाँ लिखती रहें रोज़ कहानी अपनी
मौज कहती ही रही ज़ेर-ओ-ज़बर मैं ही हूँ
(जेर-ओ-ज़बर मतलब पुथल पुथल)
मैने कहा चर्चा को यहीं विराम देना ही उचित है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





