सुधा सिंह
जिसे अच्छा मानते हो, यदि उसे अपने आचरण में नहीं लाते तो यह तुम्हारी कायरता है। हो सकता है कि भय ऐसा नहीं करने देता हो, लेकिन इससे न तो चरित्र ऊँचा उठेगा और न गौरव मिलेगा।
मन में उठने वाले अच्छे विचारों को दबाकर बार-बार जो आत्महत्या का यत्न कर रहे हो आखिर उससे किस लाभ का अंदाजा लगाया है?
अपनी बात को ही प्रधान मानने और ठीक मानने का अर्थ और सबकी बातें झूठी मानना है। इस प्रकार का अहंकार अज्ञान का द्योतक है।
इस असहिष्णुता से घृणा और विरोध बढ़ता है, सत्य की प्राप्ति नहीं होती।
सत्य की प्राप्ति होनी तभी संभव है जब हम अपनी भूलों, त्रुटियों और कमियों को निष्पक्ष भाव से देखें। अपने विश्वास बीजों का हमें निरीक्षण और परीक्षण करना चाहिए।
संसार में लगभग ऐसे मनुष्य हैं जो स्वयं तो उन्नति कर नहीं सकते और दूसरों के भी उन्नति पथ में रोड़े अटकाते हैं। ऐसे पुरुषों की परवाह न करके हमें तो केवल बढ़ना ही चाहिए, क्योंकि उन्नति को कष्ट साध्य समझने वाले मानव उन्नति पथ पर आपकी खिल्ली उड़ायेंगे और आपको निरुत्साहित करने की कोशिश करेंगे, परन्तु यदि आप उनकी ओर ध्यान देंगे तो आपको अपनी ही उन्नति से भय लगेगा जैसे पर्वत की चोटी पर चढ़े हुए पुरुष को उसके नीचे देखने से।
उत्साह जीवन का धर्म है। अनुत्साह मृत्यु का प्रतीक है। उत्साहवान मनुष्य ही सजीव कहलाने योग्य है। उत्साहवान मनुष्य आशावादी होता है। उसे सारा विश्व आगे बढ़ता हुआ दिखाई देता है।
विजय, सफलता और कल्याण सदैव आँख में नाचा करते हैं, जबकि उत्साहहीन हृदय को अशान्ति ही अशान्ति दिखाई देती है।
मनुष्यता के गुणों से हीन प्राणी चाहे रावण से धनवान्, शुक्राचार्य से विद्वान्, हिरण्यकश्यपु से पराक्रमी, कंस से योद्धा, मारीच से मायावी, कालनेमि से कूटनीतिज्ञ, भस्मासुर से शक्तिशाली क्यों न हो जावें, पर वे न अपने लिए, न दूसरों के लिए-किसी के लिए भी शान्ति का कारण न बन सकेंगे।
यह समृद्धि अयोग्य लोगों के, कुपात्रों के हाथ में जितनी बढ़ेगी उतना ही क्लेश बढ़ेगा, अशान्ति की कालिमा घनी होगी।ईश्वर को प्रसन्न करने का उपाय केवल यही है कि अपने से निःस्वार्थ भाव से जो भी सेवा,त्याग,परोपकार हो सके,वह किया जाय।
संसार क्या करता है ? संसार क्या कहेगा ? यह सब व्यर्थ की बातें हैं। आपकी आत्मा क्या कहेगी? ईश्वर क्या कहेगा ? यही मुख्य बात है। यही खुदा की ख़ुशी है।





