अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

ऐतिहासिक फलक : वासुदेव श्रीकृष्ण

Share

डॉ. प्रिया मानवी

   _चौथी सदी ई0 पू0 में जब सिंकंदर का आक्रमण भारत पर हुआ तो यूनानियों ने देखा कि पंजाब के मैदानों में लोगों द्वारा उनके प्रसिद्ध देवता हेराक्लीज से मिलते-जुलते एक देवता की पूजा का प्रचलन अधिक है जबकि उनके डायोनिसियस देवता से मिलते जुलते एक अन्य देवता की पूजा पहाड़ी क्षेत्रों में प्रचलित है।_
   मेगस्थनीज बताता है कि शूरसेन (मथुरा) में लोग हेराक्लीज के उपासक हैं। सिकन्दर के साथ रहे यूनानी लेखकों के अनुसार पोरस की सेना अपने साथ हेराक्लीज़ की मूर्ति रखकर सिकन्दर से युद्ध करती थी।
 _यह हेराक्लीज से मिलता-जुलता देवता निश्चय ही हमारे यहाँ के कृष्ण थे। हेराक्लीज, यूनानी परम्परा में एक मल्लयोद्धा था, कड़ी धूप में रहने के कारण उसका रंग भी काला पड़ गया था, उसने हाइड्रा नामक एक विशालकाय सर्प का वध किया था, हेराक्लीज की भी मृत्यु ठीक उसी प्रकार होती है जैसे कि कृष्ण की मृत्यु एक विष युक्त तीर से होती है।_
    हेराक्लीज को कृष्ण समझने का पुरातात्विक साक्ष्य यूनानी सिक्कों से भी देखा जा सकता है।

यूनानियों ने जिस दूसरे देवता को डायोनिसियस समझ लिया था उसे इंद्र समझा जा सकता है। इससे यह मालूम होता है कि भले ही प्राचीन यदुओं का नाश हो चुका था लेकिन पंजाब के उपजाऊ क्षेत्रों में इंद्र-पूजा का स्थान कृष्ण-पूजा ले चुकी थी।
यूनानी उल्लेखों के अनुसार डायोनिसियस (इंद्र,कुछ शिव भी अनुमान करते हैं) ने भारत में सर्वप्रथम लोहे तथा धातुओं का ज्ञान, खेती के लिए बैलों के उपयोग की जानकारी और वास्तुकला का ज्ञान लाया था।
कृष्ण द्वारा इंद्र को अपदस्थ करने का संबंध पशुचारी जीवन से कृषि-जीवन को ओर जाने का है। कृष्ण गोरक्षक के रूप में सामने आते हैं क्योंकि जिन यज्ञों में पशुबलि दी जाती थी उनमें कृष्ण का आह्वान कभी नहीं हुआ है जबकि इंद्र, वरुण और अन्य वैदिक देवताओं का हमेशा आह्वान हुआ है (यज्ञ बहुत प्राचीन काल से भारत में होते आ रहे हैं, इसका सबसे बड़ा सबूत ये है कि ईस्वी सदी के पहले के प्राकृत भाषी लेखों में भी यज्ञों की भरमार मिलती है, संस्कृत वाले तो हैं ही)।
जो पशुचारी लोग धीरे-धीरे कृषि जीवन को अपना रहे थे उन्हें इंद्र के जगह कृष्ण को अपनाना निश्चय ही लाभदायक बात थी। कृषि देवता बलराम को कृष्ण के साथ जोड़ना भी इसी ओर इशारा करती है (दूसरी सदी ई0 पू0 के सिक्कों पर ये दोनों अपने-अपने हल और चक्र के साथ दिखाई पड़ते हैं और उसी समय के घोसुंडी अभिलेख में इन दोनों का नाम साथ-साथ है)।
हल और मूसल लिए बलराम की एक सुंदर मूर्ति लगभग दूसरी सदी ई0 पू0 मथुरा से मिली है।

बुद्ध से पहले ही चक्र का इस्तेमाल रथारोही द्वारा युद्ध में किया जा रहा था, क्या इसे वृष्णि कबीले (शूरसेन जनपद) के वासुदेव कृष्ण से जोड़ा जा सकता है? सोच के देखिए सोचने में क्या जाता है बाकी चक्र तो था ही एक युद्ध सामग्री इसलिए वासुदेव कृष्ण को चक्र के साथ मूर्तिकला और साहित्य में दिखाया जाता था।
पाषाण काल के हैंडएक्स चक्र जैसे फेंककर मारे जाने वाले औजार का प्रारंभिक स्वरूप हो सकता है। बाद में गौतम बुद्ध ने इसे शांति प्रतीक के रूप में अपने अष्टांगिक मार्ग के लिए चुना क्योंकि यह पहले से ही लोगों में प्रसिद्ध था।
(चेतना विकास मिशन)

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें