एक ऐसे एथलीट की कहानी जिसके सजदे में दुनिया का सबसे क्रूर तानाशाह न केवल झुका बल्कि नाजी सैल्यूट भी ठोका। साथ ही इस कहानी से समझेंगे कि झुकने को तो आसमान भी झुकता है, झुकाने का जिगर चाहिए… सिर्फ कहावत नहीं है। इसके इतर अमेरिका के उस चेहरे को भी बेनकाब करेंगे, जहां देश के नाम मेडल जीतने के लिए अफ्रीकी एथलीट तो चाहिए थे, लेकिन उन्हें सम्मान देने का दम राष्ट्रपति तक नहीं दिखा सके थे।
दुनिया में खुद को सर्वशक्तिमान समझने वाला हिटलर किसी से दबता नहीं था,वह काले लोगों से नफरत करता था, गंदा खून कहता था और छूता तक नहीं था,उसने अफ्रीकन अमेरिकन एथलीट को सैल्यूट मारा था, जिसे खुद के देश ने सम्मान नहीं दिया,दुनिया जिसके कत्लेआम से कांप गई थी और यूरोप के देशों का जिसने जीना हराम कर दिया उस हिटलर ने एक एथलीट को नाजी सैल्यूट मारा था। रोचक बात यह है कि एथलीट काला था, जिसे खुद के देश अमेरिका ने 4 ओलंपिक गोल्ड मेडल जीतने के बावजूद स्वीकार नहीं किया था।

बर्लिन ओलंपिक 1936 की मेजबानी जर्मनी ने अपनी पावर दिखाने के लिए की थी। यह पहला टूर्नामेंट था जो ग्लोबली टीवी पर प्रसारित होना था और लगभग 43 देशों में रेडियो पर कॉमेंट्री होनी थी। जर्मन तानाशाह एडोल्फ हिटलर पूरी दुनिया को इसके माध्यम से अपनी ताकत दिखाना चाहता था, साथ ही बताना चाहता था कि इंसानों में आर्यंस खासकर जर्मनी की नस्ल सबसे बेहतर है और दुनिया पर राज करने का हक सिर्फ गोरों का है। वह गैर-आर्यंस और यहूदियों को गंदा खून कहता था। यही नहीं, उनसे हाथ मिलाना तो दूर छूना तक शान के खिलाफ समझता था। उसकी तमन्ना थी कि बर्लिन खेलों में जर्मनी के एथलीट सबसे अधिक मेडल जीतें, जिससे दुनिया उसका वर्चस्व देखे, लेकिन उसे क्या पता था कि एक बटाई पर काम करने वाले मजदूर के बेटे के आगे उसे झुकना पड़ेगा। वह काला लड़का जेसी ओवेंस थे, जो बचपन में कपास चुना करते थे, जबकि उनके दादा और दादी गुलाम थे।
कहानी एथलेटिक की दुनिया के बादशाह अफ्रीकन अमेरिकन जेसी ओवेंस की है, जिनका पूरा नाम जेम्स क्लीवलैंड ओवेंस था। वह 12 सितंबर 1913 को अलबामा के ओकविले में शेरक्रॉपर (बटाई पर काम करने वाले) फैमिली में जन्मे थे, जबकि उनके दादा-दादी गुलाम थे। जेसी माता-पिता की 10वीं और आखिरी संतान थे। वह कपास चुनते हुए बड़े हो रहे थे तो उनका परिवार क्लीवलैंड चला गया। क्लीवलैंड के एक हाई स्कूल में पढ़ते समय ओवेंस ने 1933 में शिकागो में नेशनल इंटर स्कोलास्टिक चैंपियनशिप में 3 इवेंट जीते, जबकि दो साल बाद 5 मई 1935 को ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी में एक ही दिन में 3 विश्व रिकॉर्ड तोड़ डाले। उन्होंने 100-यार्ड डैश को 9.4 सेकंड में पूरा करके विश्व रिकॉर्ड की बराबरी की। उन्होंने 220-यार्ड डैश को 20.3 सेकंड में, 220-यार्ड लो हर्डल्स को 22.6 सेकंड में और लंबी कूद को 8.13 मीटर में पूरा करके विश्व रिकॉर्ड तोड़े। लंबी कूद का रिकॉर्ड 25 साल तक कायम रहा।
जेसी ओवेंस का नाम आज भी एथलेटिक्स की दुनिया में सम्मान से लिया जाता है।
एक लाइन में कहा जाए तो जेसी इंसान नहीं, चलता फिरता तूफान थे। ..और कहते हैं न तूफान जब झूम कर उठता है तो वह रोके नहीं रुकता… कुछ ऐसा ही देखने को मिला बर्लिन में। लगभग 23 साल के छरहरे गठीले बदन और औसत हाइट वाले काले रंग के इस लड़के ने जर्मनी की धरती पर जब कदम रखा तो वहां के अखबारों में खलबली मच गई। दो साल पहले ही नाजी पार्टी से चांसलर बना महत्वाकांक्षी रुडोल्फ हिटलर दुनिया पर राज करना चाहता था। दबदबा दिखाना चाहता था और यह लगभग 5 फीट 11 इंच का यह लड़का उसके मिशन का सबसे बड़ा कांटा था, क्योंकि वह कई इवेंट में अकेले कई मेडल जीत सकता था। मानो वह यह सोचकर जर्मनी आया कि ‘तुम्हें गुरूर है खुद पर, माना इस शहर में तुमसा नहीं कोई तो कोई हमसा भी नहीं…।’ अखबारों में खलबली का कारण उनके नाम इंटरनेशनल अमेच्योर एथलेटिक फेडरेशन (बाद में इंटरनेशनल असोसिएशन ऑफ एथलेटिक्स फेडरेशन) के सभी मान्यता प्राप्त विश्व रिकॉर्ड दर्ज थे।
![]()
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान हिटलर ने अपनी हार सामने देख आत्महत्या कर ली थी।
अहम बात यह है कि दुनियाभर के एथलीटों के लिए यह रेस भले ही सिर्फ दौड़ रही होगी, लेकिन जेसी के लिए इसका अर्थ कुछ और भी था। दरअसल, अंग्रेजी में Race दो मतलब होता है- दौड़ और नस्ल। जेसी ऐसे एथलीट थे, जिन्हें खुद अमेरिका सम्मान नहीं देता था, लेकिन वह रेस यानी दौड़ से दुनियाभर में अपनी नस्ल का लोहा मनवा रहे थे। जेसी ओवेंस ने ट्रैक पर उतरने के बाद करिश्मा करते हुए 100 मीटर फर्राटा (10.3 सेकंड, ओलंपिक रिकॉर्ड), 200 मीटर फर्राटा (20.7 सेकंड, एक विश्व रिकॉर्ड), लंबी कूद (8.06 मीटर) और 4 × 100 मीटर रिले (39.8 सेकंड) इवेंट के चार गोल्ड मेडल पर अपना नाम दर्ज करा दिया। खेल गांव का हर एथलीट उनका दीवाना बन चुका था।

इधर अमेरिका में दावा किया गया कि ओवेंस की जीत के बाद हिटलर ने स्टेडियम छोड़ दिया। गैर आर्यंस होने की वजह से उसने ओवेंस से हाथ मिलाने से इनकार कर दिया। अमेरिकी अखबारों ने इसे ‘स्नब’ करार दिया, लेकिन एक सच यह भी था कि खेल के पहले दिन के बाद हिटलर ने किसी भी एथलीट को न तो सार्वजनिक रूप से बधाई दी और न ही मेडल दिया। यही वजह है कि कि गोल्ड मेडल जीतने के बावजूद हिटलर ने ओवेंस से मुलाकात नहीं की थी, जबकि परंपरा के अनुसार हिटलर को ओवेंस से मिलना था।
दरअसल, अमेरिका के एक बड़े अखबार की रिपोर्ट में दावा किया गया कि ओवेंस के पहले गोल्ड मेडल जीतने के बाद हिटलर ने स्टेडियम छोड़ दिया था। वह उनसे मिलने से कतरा रहा था। उधर बर्लिन से खेल पत्रकार और लेखक पॉल गैलिको ने अपनी स्पेशल रिपोर्ट में लिखा- एक गोल्ड मेडल जीतने के बाद जब ओवेंस को पोडियम से नीचे ले जाया गया तो उन्होंने मुस्कुराकर सिर झुकाया। इस पर हिटलर ने उन्हें एक दोस्ताना छोटा नाजी सैल्यूट किया। वह हाथ मोड़कर बैठा था। ओवेंस ने बाद में खुद इसकी पुष्टि की और बताया उन्होंने एक-दूसरे को बधाई दी थी।

एक सच तो हालांकि यह भी है कि ओवेंस को हिटलर से नहीं, बल्कि US प्रेसिडेंट फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट से निराशा हुई, जिन्होंने ऐतिहासिक प्रदर्शन करने के बावजूद उन्हें वाइट हाउस में आमंत्रित करने तक की जरूरत नहीं समझी। ओलंपिक खेलों के एक महीने बाद ओवेंस ने एक इवेंट में भीड़ से कहा- हिटलर ने मुझे नजरअंदाज नहीं किया। यह रूजवेल्ट थे जिन्होंने मुझे नजरअंदाज किया। राष्ट्रपति ने मुझे एक टेलीग्राम तक नहीं भेजा। रूजवेल्ट ने ओवेंस की जीत या बर्लिन ओलंपिक में भाग लेने वाले 18 अफ्रीकी अमेरिकियों की जीत को कभी सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं किया। 1936 में केवल गोरे ओलंपियनों को वाइट हाउस में आमंत्रित किया गया था। माना जाता है कि रूजवेल्ट नस्लीय मुद्दे पर नरम दिखकर दक्षिणी डेमोक्रेट्स का समर्थन खोने का जोखिम नहीं उठाना चाहते थे। बर्लिन में प्रतिस्पर्धा करने वाले ब्लैक ओलंपियनों को 2016 तक सम्मान का इंतजार करना पड़ा। प्रेसिडेंट बराक ओबामा ने एथलीटों के रिश्तेदारों को देश को गौरवान्वित करने के लिए आमंत्रित किया था।
खैर, हिटलर के ओवेंस से हाथ नहीं मिलाने के पीछे एक और कहानी भी है। ओलंपिक के पहले दिन हिटलर ने सभी जर्मन गोल्ड मेडल विजेताओं से मुलाकात की और हाथ मिलाया। कुछ टॉप फिनिश करने वाले एथलीटों से भी मुलाकात की। उस रात हिटलर अफ्रीकी अमेरिकी हाई जम्पर कॉर्नेलियस जॉनसन के पहला गोल्ड मेडल जीतने से पहले स्टेडियम से चला गया था। हिटलर के कर्मचारियों कहा कहना था कि उसकी पहले से तय अपॉइंटमेंट थी। इस बात के लिए हिटलर को फटकार लगाते हुए IOC के प्रमुख हेनरी डी बेलेट-लाटौर ने खुलेआम कहा कि या तो वह सभी गोल्ड मेडल विजेताओं को बधाई दे या किसी को नहीं। जर्मनी में ‘आर्यंस ओनली’ (गोरे इनसान, जिनकी आंखें नीली हों) पॉलिसी लागू कर चुके हिटलर ने इस पर किसी को भी सम्मानित नहीं करने का फैसला किया। रोचक बात है कि खेलों के तीसरे दिन ओवेंस के गोल्डन सफर का आगाज हुआ।
दरअसल, हिटलर काफी सख्त था। उससे मिलना तो दूर उसकी मर्जी के बिना कोई उसके करीब भी नहीं जा सकता था। ‘गैर-आर्यन’ (गैर-श्वेत और यहूदी) जातियों के लोगों को हीन और पतित समझता था। ऐसे लोगों से मिलना हिटलर की शान के खिलाफ था। रोचक बात तो यह भी है, जिससे पूरी दुनिया खौफ खाती थी वह भारत के सुभाषचंद्र बोस और हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद का फैन था। दावा किया जाता है कि उसने ही द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान मुलाकात के बाद बोस को ‘नेताजी’ (एक दावा और यह है कि बोस को नेताजी की उपाधि आजाद हिंद फौज के साथियों से जर्मनी में मिली थी) नाम दिया था, जबकि ध्यानचंद के सामने जर्मन सेना में उच्च पद का प्रस्ताव रखा था। बर्लिन की धरती पर झंडा फहराने वाली भारतीय टीम के हीरो मेजर ने इसे अस्वीकार कर दिया था।
जेसी ओवेंस को हिटलर के सैल्यूट पर विवाद क्यों?
एक ओर अमेरिका में तरह-तरह की खबरें थीं तो दूसरी ओर हिटलर की जर्मनी में ओवेंस छा गए थे। यहां तक कि लॉन्ग जंप इवेंट के लिए जर्मन एथलीट कार्ल लुडविग ‘लूज’ ने उनकी मदद भी की थी, जिनकी वजह से वह शुरुआती खराब प्रदर्शन से उबरकर गोल्ड जीत सके। सिल्वर विनर कार्ल ओवेंस को बधाई देने वाले पहले शख्स थे। बाद में वे अच्छे दोस्त बन गए। 1976 में ओवेंस को प्रेसिडेंशियल मेडल ऑफ फ्रीडम मिला। इसके चार साल बाद ओवेंस की मौत 31 मार्च 1980 को टक्सन, एरिजोना में लंग कैंसर से लड़ते हुए हुई। वह 66 वर्ष के थे। उनके बारे में कहा जाता है कि वह चेन स्मोकर थे।
एक और रोचक बात यह भी है कि जिस बर्लिन में हिटलर ने ओवेंस से हाथ नहीं मिलाया, वहां निधन के चार साल बाद एक सड़क को ओवेंस का नाम दिया गया। जिस अमेरिका के वो गौरव थे, उन्हें कांग्रेसनल गोल्ड मेडल सम्मान मौत के 10 साल बाद मिला। बता दें कि ओवेंस ने दुनियाभर में दबे कुचले लोगों को सपोर्ट किया और वह यही वजह है कि आज भी वह हीरो कहे जाते हैं। एक और बात, बर्लिन खेलों में जर्मनी ने सबसे अधिक 38 गोल्ड सहित कुल 101 मेडल जीते थे, जबकि यूएस 24 गोल्ड सहित 57 मेडल जीतकर दूसरे नंबर पर रहा था।




