~ पवन कुमार ‘ज्योतिषाचार्य’
भारतीय आर्ष मनीषा ने शास्त्रों को छः की संख्या में परिगणित कर सन्तोष नहीं किया, अपितु उनका मानव के साथ अभिन्न तादात्म्य स्थापित करने के लिये उन्हें पुरुष रूप में इस दृष्टि से प्रस्तुत किया, जिससे भगवान् बादरायण की वाणी से निःसृत- ‘न हि मानुषात् श्रेष्ठतरं हि किञ्चित्’ की अन्वर्थकता उजागर हो और वह सहजता से मानव के साथ तादात्म्य स्थापित कर अपनी महत्ता अथवा विशेषता उसे हृदयंगम करा सके।
शास्त्रों में कहा गया है :
अविज्ञातेऽपि बन्धौ हि बलात् प्रह्रादते मनः।
कुछ ऐसी ही स्थिति शास्त्र- पुरुष की रही। वह मानव के हित साधन के लिये सदैव उद्विग्न रहा।
आर्ष मेधाने शास्त्रको मानवीय रूपमें अभिव्यक्तकर ही विराम नहीं किया, अपितु विभिन्न शास्त्रोंको विभिन्न महत्त्वपूर्ण मानवीय अंगोंके रूपमें प्रस्तुतकर उसकी महत्ता उजागर करनेका स्तुत्य प्रयास किया। इसी प्रयासके फलस्वरूप ज्योतिषकी अभिव्यक्ति नेत्ररूपमें हुई।
‘निः प्रापणे’ धातुसे निष्पन्न नेत्रका अर्थ है-वह इन्द्रिय, जो सामने विद्यमान वस्तु या दृश्यको आत्मसात्कर मन-मस्तिष्कको उसके स्वरूप, रंग, गुण आदिसे यथावत् परिचित कराये।
मानव ही नहीं, सभी शरीरधारी प्राणियोंके पास दो- दो स्थूल नेत्रगोलक हैं। ज्योतिष नेत्रवान् नहीं, स्वयं नेत्ररूप है। नेत्रवान् प्राणियोंके नेत्र स्थूल नेत्र हैं। ये गोलक उत्पादक (Generator) की शक्तिसे ही परिचालित होते हैं अर्थात् ईश्वरीय नेत्ररूपी उत्पादकसे ही इन्हें देखनेकी शक्ति मिलती है, बिना उसकी सहायताके ये न देख सकते हैं, न रंगोंका अन्तर जान सकते हैं, न स्वयंका मार्ग जान सकते हैं, न किसीको मार्ग दिखा सकते हैं। दूसरे शब्दों में नेत्र रहते हुए भी नेत्रधारी प्राणी दिनमें सूर्यके प्रकाशकी सहायताके बिना नहीं देख सकते, रात्रिमें चन्द्रमाका प्रकाश देखने में उनकी सहायता करता है तथा उक्त दोनोंकी अविद्यमानतामें अग्नि, दीपक, मशाल, टॉर्च, विद्युत् बल्ब आदि आग्नेय उपकरण उसकी सहायता करते हैं।
सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि तीनों ही ईश्वरीय नेत्र हैं, मूल उत्पादक हैं। इसीलिये ईशस्तुतिमें कहा गया है-
“वन्दे सूर्यशशाङ्कवह्निनयनम् ।”
दूसरी ओर आत्मज्योतिसे ज्योतित दिव्य नेत्ररूप है— ज्योतिष । वह स्वयं ही इतना समर्थ है कि तीनों कालोंमें घटित होनेवाली घटनाओंको हस्तामलकवत् प्रत्यक्ष देखकर मानवको अतीतसे शिक्षा लेने, वर्तमानको सँवारने तथा भविष्यमें सावधानी बरतनेका सन्देश देता है। दूसरे शब्दोंमें ज्योतिषरूपी नेत्र स्थूल नेत्र नहीं, अपितु अपनी आभासे स्वयं प्रकाशित दिव्य नेत्र हैं।
इसीलिये स्थूल नेत्रगोलकोंसे जो दिखायी नहीं देता, वहीं ज्योतिषरूपी नेत्रके लिये प्रत्यक्ष दृश्य होता है।
ज्योतिष मानवका परम हितैषी पथप्रदर्शक है। वह एक सच्चे मित्रकी भाँति आपद्ग्रस्त मानवके दैहिक, दैविक, भौतिक विपद् – कारणको जानकर उसे उससे उबरनेका उपाय बताता है।
उदाहरण के लिये यात्राको लीजिये। मानवको निज जीवनकालमें विभिन्न कारणोंसे विभिन्न यात्राएँ करनी पड़ती हैं। तीर्थयात्रा, विदेशयात्रा, आजीविका प्राप्तिहेतु की जानेवाली यात्रा, साक्षात्कार आदिमें भाग लेनेके लिये की जानेवाली यात्रा, व्यापारके लिये की जानेवाली यात्रा आदि-आदि।
यात्रा करनेवाला चाहता है कि उसकी यात्रा सुखद और सफल हो, परंतु कई बार ऐसा होता नहीं। कभी धनहानि, कभी प्राणहानि, कभी रोगप्रकोप, कभी अनपेक्षित घटनाओंका सामना आदि करना पड़ जाता है।
ऐसे संकटमें पड़कर मानव किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है। तब ज्योतिषकी शरणमें जानेपर वह उसे बताता है कि यदि मनुष्य दिक्शूल, कालराहु, योगिनी, चन्द्रमाकी मेरे द्वारा निर्दिष्ट स्थितिको ध्यानमें रख यात्रा करे तो न केवल इन आपदाओंसे बच सकता है, अपितु यात्राद्वारा उद्देश्यमें सफलता भी मिल जाती है।
दिक्शूल, जैसा कि नामसे ही स्पष्ट है, तत्तद् दिशाकी यात्रा करनेपर शूलकी चुभन जैसी कष्ट- प्राप्तिकी सम्भावना। दिक्शूल कब किस दिशामें रहता है, इसका निदर्शन इस प्रकार किया गया है-सोम- शनिको पूर्वमें, रवि- शुक्रको पश्चिममें, गुरुवारको दक्षिणमें, मंगलवार बुधवारको उत्तर दिशामें जिन दिनोंमें जिस दिशामें दिक्शूल हो, उस दिशाकी ओर यात्रा नहीं करनी चाहिये।
यदि यात्राके उद्देश्यमें पूर्ण सफलता पानेकी उत्कट कामना हो तो योगिनीको पीठके पीछे लेकर यात्रा करनी चाहिये; क्योंकि-
“योगिनी सुखदा वामे पृष्ठे वाञ्छितदायिनी।
दक्षिणे धनहन्त्री च सम्मुखे मरणप्रदा॥”
अर्थात् यात्राकालमें योगिनी यात्रीके बायीं ओर रहनेपर यात्राको सुखद बना देती है, पीठपीछे रहनेपर अभिलषित अभिलाषा पूर्ण कर देती है, परंतु दायीं ओर रहनेपर धनकी हानि करती है और सामने रहनेपर मृत्यु या मृत्युतुल्य कष्ट देती है।
योगिनी प्रतिपदा और नवमी तिथिको पूर्वमें, षष्ठी और चतुर्दशीको पश्चिममें, द्वितीया और दशमीको उत्तरमें एवं पंचमी और त्रयोदशीको दक्षिणमें रहती है।
इसीसे मिलती-जुलती स्थिति कालराहुकी है। वह शनिवारको पूर्वमें, मंगलवारको पश्चिममें, गुरुवारको दक्षिणमें तथा रविवारको उत्तरमें रहता है। कहा है-
“अर्कोत्तरे वायुदिशांच सोमे भौमे प्रतीच्यां बुधनैर्ऋते च।
याम्ये गुरौ वह्निदिशां च शुक्रे मन्दे च पूर्वे प्रवदन्ति कालः॥”
यदि दिक्शूल, योगिनी, कालराहु आदिकी अनुकूलता सुलभ न हो और यात्रा करना अनिवार्य हो तो और कुछ न सही, एकमेव चन्द्रको ही सामने रखकर यात्रा करनेका प्रयास करना चाहिये; क्योंकि कहा है-
‘हरति सकलदोषं चन्द्रमा सम्मुखस्थः। ‘
चन्द्रमा कब सामने रहेगा – यह यात्राकी दिशा तथा चन्द्रकी विद्यमानताकी दिशाकी स्थितिसे जाना जा सकता है। मेष, सिंह तथा धनु राशिका चन्द्रमा पूर्व दिशामें रहता है। वृषभ, कन्या तथा मकर राशिका चन्द्र दक्षिणमें रहता है।
मिथुन, तुला और कुम्भ राशिका चन्द्र पश्चिम दिशामें रहता है तथा कर्क, वृश्चिक और मीन राशिका चन्द्र उत्तर दिशामें रहता है-
“मेषे च सिंहे धनु पूर्वभागे वृषे च कन्या मकरे च याम्ये।
युग्मे तुला कुम्भसु पश्चिमायां कर्कालिमीने दिशि चोत्तरस्याम्॥”
यदि चन्द्रमाको सामने रखकर यात्रा की जायगी तो यात्राके उद्देश्यकी पूर्तिको सम्भावना पर्याप्त सीमातक बढ़ जाती है।
अर्थलाभार्थ की जानेवाली यात्रा चन्द्रको सामने लेकर करनी चाहिये तथा सुख और सम्पत्ति प्राप्तिकी कामनासे की जानेवाली यात्रामें चन्द्रको अपने दायें भागमें रखना चाहिये। चन्द्रको पीठ पीछे अथवा अपने बायीं ओर लेकर यात्रा नहीं करनी चाहिये; क्योंकि पृष्ठभागस्थित चन्द्र मृत्यु या मृत्युतुल्य कष्ट देता है एवं वामभागस्थ चन्द्र धनहानि करता है-
“सम्मुखे अर्थलाभाय दक्षिणे सुखसम्पदः।
पृष्ठतो मरणं चैव वामे चन्द्रे धनक्षयः॥”
केवल यही नहीं, ज्योतिष इससे भी एक पग आगे बढ़कर मानवजीवनका पूरा रेखाचित्र प्रस्तुत करते हुए बताता है-जब जीव माँके गर्भमें आता है, तभी विधाताद्वारा निम्न पाँच बातें उसके भाग्यमें लिख दी जाती हैं-
“आयुः कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च।
पञ्चैतानि हि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः॥”
अर्थात् उसकी आयु अल्प, मध्य, दीर्घ कैसी या कितनी होगी? यह जीव अच्छे या बुरे कैसे कर्म करेगा ? धन किस प्रकार, कितने परिमाणमें प्राप्त करेगा ? विद्या कौन-सी और कितनी पढ़ेगा तथा अन्तमें प्राणत्याग किस प्रकार करेगा ?
यहीं ज्योतिष कहता है-सबसे पहले आयुपर ही ध्यान देना चाहिये। आयुके बिना सभी पदार्थ बेकार हैं। वाल्मीकिरामायणके सुन्दरकाण्डमें आता है- जीवन्नरो भद्रशतानि पश्येत्। पर आयुकी वृद्धि हो कैसे – इसका समाधानात्मक उत्तर मनुस्मृति इस प्रकार देती है-
“अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्॥”
अर्थात् जो व्यक्ति सभीको प्रणाम करता है, नित्य वृद्धोंकी सेवामें तत्पर रहता है, उसकी चार चीजें बढ़ती हैं – आयु, विद्या, यश और बल। अभिवादन सभी प्राणियोंका क्यों ? इसका उत्तर श्रीमद्भागवत देता है-
“खं वायुमग्निं सलिलं महीं च ज्योतींषि सत्त्वानि दिशो द्रुमादीन्।
सरित्समुद्रांश्च हरे: शरीरं यत्किञ्च भूतं प्रणमेदनन्यः॥”
(श्रीमद्भा० ११ । २ । ४१ )
अर्थात् यह आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, ग्रह-नक्षत्र, प्राणी, दिशाएँ, वृक्ष-वनस्पति, नदी, समुद्र-सब-के-सब भगवान्के शरीर हैं। सभी रूपोंमें स्वयं भगवान् प्रकट हैं- ऐसा समझकर वह जो कोई भी उसके सामने आ जाता है— चाहे वह प्राणी हो या अप्राणी-उसे अनन्यभावसे- भगवद्भावसे प्रणाम करना चाहिये।
ज्योतिष आयु घटानेवाले कारणोंसे बचनेका परामर्श इस प्रकार देता है-
“षष्ठीषु तैलं पलमष्टमीषु क्षौरक्रिया नैव चतुर्दशीषु।
स्त्रीसेवनं नष्टकलासु पुंसाम् आयुः क्षयार्थं मुनयो वदन्ति॥”
अर्थात् षष्ठीके दिन तेलका भोजनमें प्रयोग करना अथवा लगाना, अष्टमीको माँस खाना, चतुर्दशीको क्षौर बनवाना तथा अमावास्याको स्त्रीप्रसंग करना आयुको घटा देता है।
समष्टिरूप में कहा जा सकता है कि विश्वास पूर्वक ज्योतिष के निर्देशों को आत्मसात्कर यदि व्यक्ति जीवन- यापन करे तो जीवन के वास्तविक सुख का आनन्द ले सकता है।





