अभय कुमार
बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने अपना कामकाज संभाल लिया है। पिछले गुरुवार को पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने नीतीश कुमार सहित दो दर्जन से अधिक मंत्रियों को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। नीतीश ने दसवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर एक नया रिकॉर्ड बनाया है। मई 2014 से फरवरी 2015 के लगभग नौ महीनों को छोड़ दें, तो वे अक्टूबर 2005 से लगातार मुख्यमंत्री पद पर बने हुए हैं।
इस बार भी कई राजनीतिक विश्लेषकों को आशंका थी कि नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर समाप्ति की ओर है, लेकिन उन्होंने अपने प्रदर्शन से यह साबित कर दिया कि आने वाले दिनों में भी वे बिहार की राजनीति के केंद्र में बने रहेंगे। एनडीए की 200 से अधिक सीटों पर मिली जीत में उनकी नेतृत्वकारी भूमिका निर्णायक रही।
हालांकि चुनाव प्रचार के दौरान एनडीए और महागठबंधन के बीच कड़ी टक्कर नज़र आ रही थी, लेकिन समय बीतने के साथ महागठबंधन की रणनीतिक गलतियों, सीट बंटवारे पर विवाद और आंतरिक असहमति ने एनडीए के लिए रास्ता आसान कर दिया। एनडीए ने बेहतर संसाधनों, मज़बूत संगठन और प्रभावी समन्वय के दम पर अपनी स्थिति और मजबूत की।
वहीं दूसरी तरफ़, राजद, कांग्रेस और वाम दलों के महागठबंधन की स्पष्ट हार ने उनके खेमे में गहरी निराशा भर दी है। बिहार विधानसभा चुनावों ने एक बार फिर ‘इंडिया’ गठबंधन की कमज़ोरियों को उजागर किया है और यह संदेश दिया है कि यदि उन्हें अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों का प्रभावी मुकाबला करना है, तो आंतरिक सुधार, ज़मीनी स्तर पर सक्रियता और नई रणनीति अपनाना अनिवार्य है।
जब तक ये दल अपनी राजनीतिक ज़मीन को मजबूत करने के लिए गंभीर और निरंतर प्रयास नहीं करेंगे, राष्ट्रीय या राज्य की राजनीति में उनके लिए किसी बड़े बदलाव की संभावना कम ही है। आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल सहित कई महत्वपूर्ण विधानसभा चुनाव और फिर संसदीय चुनाव होने वाले हैं और इन सब से पहले बिहार के नतीजों ने धर्मनिरपेक्ष दलों के लिए कई अहम सबक छोड़ दिए हैं, जिन्हें नज़रअंदाज़ करने से उनकी मुश्किलें और बढ़ सकती हैं।
अपमानजनक हार के बाद महागठबंधन के प्रमुख सहयोगी दल — कांग्रेस और राजद — ने “वोट चोरी” का मुद्दा उठाते हुए चुनाव आयोग पर सत्तारूढ़ दलों के पक्ष में पक्षपात करने का आरोप लगाया। महागठबंधन से जुड़े सोशल मीडिया ‘इन्फ़्लुएंसर्स’ ने भी ईवीएम पर सवाल खड़े किए और संकेत दिया कि उनमें छेड़छाड़ की गई हो सकती है। इस तरह उन्होंने यह धारणा बनाने की कोशिश की कि एनडीए की प्रचंड जीत दरअसल किसी बड़े स्तर की हेराफेरी का परिणाम थी।
हालाँकि, ऐसे आरोपों का जनता पर कोई विशेष असर नहीं दिख रहा है। अगर ऐसा होता, तो जनता उनके समर्थन में सामने आती। जनता ने कई बार देखा है कि हार के बाद विपक्ष ऐसे आरोपों का इस्तेमाल अपनी कमज़ोरियों पर पर्दा डालने के लिए करता है। मतदाता अच्छी तरह समझते हैं कि विपक्ष जब हारता है तो ईवीएम को दोष देता है, और जब जीतता है तो इन्हीं मशीनों पर उसका भरोसा अचानक लौट आता है।
याद रहे कि 2015 के विधानसभा चुनाव में जब राजद और जेडीयू ने भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए को हराया था, तब महागठबंधन को ईवीएम मशीनें बिल्कुल ठीक-ठाक काम करती हुई नज़र आई थीं! यह भी सच है कि कई पश्चिमी देशों में — जहाँ लोकतंत्र की परंपरा काफी पुरानी है — आज भी बैलेट पेपर से चुनाव कराए जाते हैं।
भारत में भी, जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी, तब भाजपा ने ईवीएम हटाकर बैलेट पेपर प्रणाली अपनाने की मांग की थी, जिसे उस समय की कांग्रेस सरकार ने खारिज कर दिया था। गौरतलब है कि 2012 में, जब भाजपा विपक्ष में थी, पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने ईवीएम पर सवाल उठाए थे, लेकिन सत्ता में बैठी कांग्रेस ने उनकी इस मांग को “अटकलबाजी की पराकाष्ठा” बताते हुए अस्वीकार कर दिया था।
आज स्थिति बिल्कुल उलट है। जो कल सत्ता में थे, वे आज विपक्ष में हैं, और जो कल विपक्ष में थे, वे आज ईवीएम का बचाव कर रहे हैं। कल का सत्ता वर्ग, जो आज विपक्ष है, अब चुनावी प्रक्रिया और ईवीएम में गड़बड़ी देखने का दावा कर रहा है। तो क्या वाक़ई कुछ गड़बड़ी हो रही है, या फिर विपक्ष अपनी हताशा और पराजित मानसिकता के कारण ईवीएम पर सवाल उठा रहा है?
मीडिया में कई तरह की खबरें आईं, जिनमें आशंका जताई गई कि ‘वोटर लिस्ट’ से कई लोगों के नाम हटाए गए और कई नए नाम जोड़े गए, वह भी चुनाव से ठीक पहले। विपक्ष लगातार इस प्रक्रिया पर सवाल उठाता रहा है। यह संभव है कि विपक्ष की कई बातों में सच्चाई हो और वोटर लिस्ट में की गई कटौती सत्ता पक्ष के हित में हुई हो। यदि ऐसा था, तो इसके खिलाफ अदालत से लेकर सड़कों तक व्यापक आंदोलन होना चाहिए था।
लेकिन विपक्ष ने इस मुद्दे को बिना पर्याप्त तैयारी के उठाया, और उसके शोर-शराबे को देखकर ऐसा लगा जैसे वह इसे केवल ‘पब्लिसिटी’ के लिए उपयोग कर रहा है। इधर-उधर कुछ रैलियाँ और प्रदर्शन हुए, शीर्ष नेताओं ने कुछ ‘रील’ बनाईं, और फिर बड़े नेता हवाई जहाज़ पकड़कर निकल पड़े। बिहार की जनता के रोज़मर्रा के मुद्दे ‘वोट चोरी’ अभियान के शोर में दब गए, जबकि दूसरी ओर एनडीए ने हर जाति और समूह के नेताओं को साथ लाने के लिए पूरा जोर लगाया।
सत्ता में बैठे एनडीए के पास अनेक तरह के फायदे थे और वह ज़मीनी स्तर पर अधिक सक्रिय दिखा, जबकि विपक्ष से उम्मीद थी कि वह इस चुनाव में जी-जान लगा देगा। इसके बजाय उनके नेता आख़िरी समय तक आपस में उलझे रहे—कभी किसी को टिकट दिया, तो अगले दिन उससे वापस लेकर किसी और को दे दिया। कई जगहों पर महागठबंधन के दल अपने ही साथियों के खिलाफ लड़ते हुए दिखाई दिए।
इतना ही नहीं, राजद और कांग्रेस ने अपनी विचारधारा से समझौता करते हुए सांप्रदायिक और जातिवादी छवि वाले नेताओं को टिकट भी दिया। पार्टी दफ़्तरों में ज़मीनी नेताओं को प्रवेश नहीं मिला और कुछ ही लोग सभी फैसले अपने हिसाब से लेते रहे। पार्टी के भीतर यह नाराज़गी भी थी कि सोशल मीडिया इन्फ़्लुएंसर्स को ज़मीनी और पुराने नेताओं के सिर पर बैठा दिया गया, और कल ही आए हुए नेता सभी पर रौब जमाने लगे।
सच तो यह है कि ईवीएम पर सवाल उठाने वाले राजनीतिक दलों ने न तो पर्याप्त तैयारी की है और न ही उनके आरोपों में वह गंभीरता झलकती है जो जनता का भरोसा जीत सके। लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह बात सही है कि चुनावी प्रक्रिया कभी-कभी भ्रष्टाचार और अनियमितताओं का शिकार होती रही है, लेकिन किसी भी दल को अपने राजनीतिक हितों के आधार पर चुनावी व्यवस्था को अच्छा या बुरा करार नहीं देना चाहिए।
लोकतंत्र की बुनियादी मांग है कि सभी उम्मीदवारों को समान अवसर मिले और चुनावों में सत्ता और धन का प्रभाव न्यूनतम हो, ताकि सबसे कमजोर और कमज़ोर वर्गों से आने वाला व्यक्ति भी विधानसभा और संसद तक पहुँच सके और अपने समाज की आवाज़ बने। लेकिन दुर्भाग्य से न तो सत्ताधारी दल और न ही विपक्ष इस आदर्श पर पूरी तरह खरे उतरते हैं। यही कारण है कि राजनीतिक दलों के गंभीर आरोपों का जनमानस पर सीमित असर पड़ता है।
यदि विपक्ष को सचमुच लगता है कि बिहार में उनके लिए ‘समान अवसर’ उपलब्ध नहीं थे या सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग हुआ है, तो उसे इन मुद्दों को लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से उठाने का पूरा अधिकार है — न कि इन्हें अपनी विफलताओं पर पर्दा डालने के साधन के रूप में इस्तेमाल करने का।
इसी तरह, यदि विपक्ष का मानना है कि चुनावी प्रक्रिया से समझौता किया गया है, तो उसे ठोस प्रमाण पेश करने चाहिए, लोगों को संगठित करना चाहिए और चुनावी सुधारों के लिए व्यापक आंदोलनों की शुरुआत करनी चाहिए।
लेकिन यदि वे बिना किसी सतत अभियान के, केवल हार के तुरंत बाद चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर औपचारिक और रस्मी बयान देकर फिर इस मुद्दे को भुला देते हैं, तो इसका कोई वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं होता। इससे केवल यह धारणा बनती है कि विपक्ष अपनी हार का बहाना तलाश रहा है।
नतीजों ने साफ़ कर दिया है कि कांग्रेस के भीतर जितनी गुटबाज़ी सामने आई, उतनी शायद ही किसी अन्य पार्टी में देखने को मिली हो। टिकट बंटवारे में पार्टी ने ज़मीनी और प्रतिबद्ध नेताओं की अनदेखी की, जबकि जिन लोगों के पास पैसा, प्रभाव और शीर्ष नेतृत्व तक पहुँच थी, उन्हें प्राथमिकता दी गई।
वैचारिक रूप से कांग्रेस से जुड़े और कमज़ोर तबकों के लिए ईमानदारी से काम करने वाले कार्यकर्ताओं को किनारे कर दिया गया। जहाँ कांग्रेस विचारधारा के स्तर पर सामाजिक न्याय की ताक़तों के साथ चुनाव लड़ रही थी, वहीं पार्टी के भीतर सवर्ण लॉबी मंडल पार्टियों की तुलना में ख़ुद को दक्षिणपंथी ताक़तों के अधिक क़रीब महसूस करती है। यह लॉबी लगातार कोशिश करती रही कि पार्टी के भीतर और बाहर दलित एवं पिछड़े वर्गों की राजनीति को कमज़ोर किया जाए।
एक अन्य समस्या यह है कि कांग्रेस के अधिकतर नेता सोशल मीडिया की बैसाखी पर चलने वाले ‘डिजिटल नेता’ बनकर रह गए हैं, यही कारण है कि बिहार में पार्टी का सामाजिक आधार आज तक मज़बूत नहीं हो पाया है। वैचारिक स्तर पर भी कांग्रेस भारी भ्रम और असमंजस में दिखाई देती है।
राहुल गांधी ने बिहार में केवल औपचारिक दौरा कर और उसका सोशल मीडिया पर प्रचार करके यह मान लिया कि राज्य की राजनीतिक ज़मीन उनके पक्ष में है, जबकि ज़मीनी हक़ीक़त इससे बिल्कुल अलग थी।
यह एक गंभीर विषय है कि सत्ता वर्ग की देखादेखी कांग्रेस पार्टी के भीतर भी व्यक्तिपूजा तेज़ी से बढ़ रही है—एक विशेष नेता को ‘हीरो’ बनाने के लिए अन्य नेताओं को पीछे धकेल दिया गया है, जो लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। ‘भक्ति’ सिर्फ़ सत्ता पक्ष में ही नहीं, बल्कि विपक्ष में भी बढ़ती जा रही है, जिसके कारण पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक मूल्यों और विचारधारा को गंभीर क्षति पहुँच रही है।
मीडिया का हाल भी अलग नहीं है। चाहे वह ‘गोदी मीडिया’ हो या तथाकथित ‘सेक्युलर मीडिया’, दोनों अपने-अपने तरीके और क्षमता के अनुसार एक ख़ास ‘नैरेटिव’ को आगे बढ़ाने और दूसरों को दबाने में लगे हुए हैं। इसी वजह से आम जनता तक असली बात नहीं पहुँच पाती। बिहार में भी सेक्युलर मीडिया महागठबंधन की कमियों को छिपाता रहा। आख़िरी समय तक वह महागठबंधन को प्रचंड बहुमत से जीतता दिखाता रहा।
मगर जब चुनाव परिणाम उसके आकलन के बिल्कुल विपरीत आए, तब भी उसने अपना रुख़ नहीं बदला। सेक्युलर पार्टियों के प्रदर्शन का निष्पक्ष मूल्यांकन करने के बजाय वह अपनी ऊर्जा चुनावी धांधली के आरोपों पर खर्च कर रहा है और भाजपा व जदयू के नेताओं को व्यक्तिगत तौर पर निशाना बना रहा है।
सेक्युलर पत्रकारों को यह समझने की ज़रूरत है कि सत्ता में बैठे किसी नेता के प्रति व्यक्तिगत विरोध उसकी राजनीति को कमज़ोर नहीं करता। सच्ची पत्रकारिता का उद्देश्य व्यवस्था की आलोचना करना है, न कि किसी व्यक्ति-विशेष से अदावत निभाना।
कांग्रेस की तरह राजद भी एक के बाद एक गलतियाँ करती रही और आंतरिक विरोधाभासों में उलझी हुई है। तेजस्वी यादव के नेतृत्व को लेकर परिवार और वरिष्ठ नेताओं के बीच असहमति बढ़ रही है, क्योंकि वे कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित रहते हैं और पुराने नेताओं की भूमिका लगातार कम होती जा रही है।
लालू प्रसाद यादव को बिहार में सामाजिक न्याय की लड़ाई को मज़बूती देने और पिछड़े वर्गों को आवाज़ देने का श्रेय जरूर है, लेकिन उनकी यह आलोचना भी वाजिब है कि उन्होंने पार्टी को विचारधारा और संगठनात्मक संस्थाओं के आधार पर खड़ा करने के बजाय इसे एक हद तक परिवार- केन्द्रित बना दिया।
समाजवाद की किसी भी किताब में यह नहीं लिखा कि किसी नेता के परिवार के सभी सदस्यों को टिकट दिया जाना चाहिए और वर्षों से काम कर रहे नेताओं को नज़रअंदाज़ कर दिया जाए। राजद आजकल एनडीए में बढ़ते परिवारवाद की आलोचना करता है — जो बिल्कुल सही है—लेकिन दूसरे दलों के परिवारवाद को निशाना बनाकर अपने दल के परिवारवाद को सही ठहराना सामाजिक न्याय की राजनीति नहीं, बल्कि एक तरह का ब्राह्मणवाद है।
यही ब्राह्मणवादी सोच कई पिछड़ी और अत्यंत पिछड़ी जातियों के नेताओं में दिखती है — वे सामाजिक न्याय की बात तो करते हैं, पर नेतृत्व देने की बारी आने पर दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों को खुद ही दबा देते हैं। जनता की नाराज़गी की एक बड़ी वजह यह भी है कि राजद ने एक खास जाति को उसकी आबादी से कहीं अधिक टिकट दिए, जबकि मुसलमानों को टिकट देने में अत्यधिक कंजूसी बरती गई। इससे मुस्लिम नेतृत्व और मुद्दों की उपेक्षा हुई।
राजद के शीर्ष नेताओं को लगता रहा कि ‘मुसलमान उनके अलावा और कहाँ जाएंगे’, लेकिन इस बार मुसलमानों ने अपने विकल्प खोजने की स्पष्ट इच्छा दिखाई। राजद में मुस्लिम नेताओं को पीछे धकेले जाने का सीधा लाभ असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी को मिला, जिससे मुस्लिम वोटों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा राजद से दूर हुआ। इसी तरह का रवैया दलित और अत्यंत पिछड़ा नेताओं के साथ भी अपनाया गया।
जहाँ एनडीए ने जीतन राम मांझी और चिराग़ पासवान जैसे दलित नेताओं को प्रमुख मंच दिया, वहीं राजद में दलित नेतृत्व को वह स्थान नहीं मिला जिसकी उन्हें हक़दारी थी।
महागठबंधन की एक अन्य सहयोगी पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (एमएल–लिबरेशन), का भी इस चुनाव में बेहद कमजोर प्रदर्शन रहा। पिछली बार जहाँ उसके एक दर्जन विधायक चुने गए थे, इस बार वह केवल दो सीटें ही जीत सकी। लिबरेशन की हार की एक बड़ी वजह यह है कि जिन ‘बुर्जुआ’ पार्टियों का वह लंबे समय से विरोध करती आई थी, आज उन्हीं का अनुकरण करने के लिए सबसे अधिक आतुर दिखाई देती है।
पार्टी के भीतर भी पैसा, रसूख़ और बड़ी जातीय संख्या वाले नेताओं को तुरंत टिकट मिल जाता है, जबकि वर्षों से निष्ठा से काम कर रहे कार्यकर्ताओं की भूमिका सिर्फ़ झंडा धोने और दरी बिछाने तक सीमित होकर रह गई है। जहाँ लिबरेशन के शीर्ष नेतृत्व पर अब भी ऊँची जातियों का प्रभाव है, वहीं बिहार इकाई के अंदर पिछड़ी जातियों की उच्च सामाजिक स्थिति वाली जातियों का दबदबा बढ़ता जा रहा है।
इससे सबसे ज़्यादा नाराज़गी लिबरेशन के दलित कार्यकर्ताओं में है, जिन्होंने वर्षों से अपनी मेहनत और प्रतिबद्धता से पार्टी को संभाला है।
इस पूरे चुनाव में प्रशांत किशोर के नेतृत्व वाली ‘जन सुराज’ भी मैदान में थी। एक तरह से उसे भी विपक्षी राजनीति का हिस्सा माना जा सकता है, क्योंकि वह सत्ता परिवर्तन चाहती थी, हालांकि वह महागठबंधन की राजनीति की भी विरोधी रही। इस चुनाव में जन सुराज को भी करारी हार का सामना करना पड़ा और उसके कोई भी उम्मीदवार जीत नहीं पाए।
विरोधियों का आरोप है कि जन सुराज ने महागठबंधन को कमज़ोर करने और कई सीटों पर उसके उम्मीदवारों को हराने में भूमिका निभाई, क्योंकि प्रशांत किशोर ‘सवर्ण मीडिया’ के बड़े प्रिय रहे हैं। उन्होंने लगातार तेजस्वी यादव पर व्यक्तिगत हमले किए और सामाजिक न्याय की राजनीति को ख़ारिज करने वाला विमर्श खड़ा किया, जिससे अप्रत्यक्ष रूप से एनडीए को लाभ पहुँचा।
बिहार के नतीजों ने यह साफ़ कर दिया है कि चुनावी रणनीतिकार होना एक बात है और जन–नेता होना बिल्कुल दूसरी बात। बिहार में अपनी ज़मीन मजबूत करने के लिए प्रशांत किशोर को अभी और मेहनत करनी होगी — उन्हें दावे कम और काम ज़्यादा करने होंगे।
सच यह है कि जहाँ धर्मनिरपेक्ष दलों का सामाजिक आधार लगातार कमज़ोर हो रहा है, वहीं हिंदुत्व की राजनीति पिछड़े वर्गों के नेताओं को आगे कर मंडल और सामाजिक न्याय की राजनीति को कमजोर करने में सफल होती जा रही है। ऐसे समय में धर्मनिरपेक्ष दलों के लिए एकमात्र रास्ता यही है कि वे ज़मीन से सीधे जुड़ें, जनता के बीच जाएँ और अपनी पार्टियों को किसी व्यक्ति या परिवार की जागीर बनाने के बजाय सबसे अधिक हाशिये पर बसे और उत्पीड़ित वर्गों के लिए पूरी तरह खुला करें।
लेकिन असल सवाल यह है — क्या इंडिया गठबंधन वास्तव में बिहार के इन सबक़ों से कुछ सीखने को तैयार है? या फिर शुतुरमुर्ग की तरह, क्या विपक्ष एक बार फिर विकट परिस्थिति का सामना करने के बजाय अपना सिर रेत में धँसा लेगा?
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और उनका सरोकार अल्पसंख्यक अधिकारों तथा सामाजिक न्याय से जुड़े प्रश्नों से है।)





