युद्ध के मैदान में सिकंदर खड़ा है। सामने एक रथ पड़ी है और उस पर एक लाश पड़ी है। ये लाश उस राजा की होती है जो धरती पर सबसे बड़े साम्राज्य का अधिनायक था। सिकंदर अपने दुश्मन की मौत से दुखी था। उसे जिंदा पकड़ना चाहता था। निराशा से भरा सिकंदर राजा के मृत शरीर के पास जाता है। उसकी ऊंगली में से अंगूठी उतारकर खुद पहन लेता है। इसी के साथ मिसिडोनिया का सिकंदर पर्शिया का सुल्तान बन जाता है। सिकंदर ने जब पर्शिया पर आक्रमण किया तो वहां डेरियस III का शासन था। सिकंदर की जीत के बाद, फारसी साम्राज्य का पतन हो गया, और सिकंदर ने एक विशाल साम्राज्य पर शासन करना शुरू कर दिया। सिकंदर की मौत के बाद 200 सालों तक फारस सामंतों के कब्जे में रहा। सातवीं सदी में ईरान में इस्लाम आया। इससे पहले ईरान में जरदोश्त के धर्म के अनुयायी रहते थे। ईरान शिया इस्लाम का केन्द्र माना जाता है। कुछ लोगों ने इस्लाम कबूल करने से मना कर दिया तो उन्हें यातनाएँ दी गई। इनमें से कुछ लोग भाग कर भारत के गुजरात तट पर आ गये। ये आज भी भारत में रहते हैं और इन्हें पारसी कहा जाता है। ईरान और भारत का कनेक्शन काफी पुराना है। लेकिन इतना ही नहीं जिस ईरान के साथ इजरायल खतरनाक जंग लड़ रहा है। उस ईरान के सबसे बड़े नेता का यूपी से भी एक खास कनेक्शन है।
यहूदी देश इजरायल और मुस्लिम देश ईरान के बीच जंग कोई नई बात नहीं है। बात जब जब फिलिस्तीन और परमाणु मुद्दे की आती है। इजरायल और ईरान के बीच जंग छिड़ जाती है। इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ जब इजरायल ने ऑपरेशन राइजिंग लायन का आगाज किया और तेहरान में ईरान के परमाणु और सैन्य ठिकानों पर ताबड़तोड़ हमला बोल दिया। जिससे बौखलाए ईरान ने भी पूरी ताकत के साथ इजरायल पर पलटवार किया और इसी के साथ ईरान और इजरायल के बीच एक जबरदस्त जंग छिड़ गई। जिसका अंत फिलहाल अभी नजर नहीं आ रहा है। इजरायल और ईरान के बीच छिड़ी जंग के बीच सबसे ज्यादा चर्चा किसी नेता की हो रही है, तो वो ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामनेई हैं। एक तरफ अयातुल्ला अली खामनेई अकेले ही इजरायल और अमेरिका के खिलाफ मोर्चा संभाले हुए हैं, तो वहीं भारत से भी उन्हें एक वर्ग का बड़ा समर्थन मिल रहा है। लेकिन ईरान के खामनेई के गुरु का भारत से भी गहरा रिश्ता रहा है और वो भी उत्तर प्रदेश से।
अवध का हिंदी परिवार
अयातुल्लाह रुहुल्लाह खुमैनी एक ऐसा नाम जिससे 20वीं सदी की सबसे बड़ी क्रांतियों में से एक की तस्वीर जेहन में उभर जाती है। ईरान के सबसे बड़े धार्मिक और राजनीति नेता एक ऐसी शख्सियसत जिसने केवल ईरान का नक्शा ही नहीं बदला बल्कि पूरी दुनिया की सियासत को हमेशा के लिए बदल दिया। एक ऐसा शख्स जिसकी पहचान ईरान के साथ इस कदम जुड़ी है कि दोनों को अलग नहीं किया जा सकता। लेकिन क्या हो अगर हम आपसे कहें कि इसी ईरानी क्रांति के जनक की जड़ें हिंदुस्तान में थी। ये कहानी 18वीं सदी के हिंदुस्तान से शुरू होती है। मुगल सलत्नत की चमक फींकी पड़ रही थी और अवध एक खुदमुख्तार रियासत के तौर पर अपनी पहचान बना रहा था। इसी दौर में ईरान के निशापुर शहर से एक शिया परिवार ने हिंदुस्तान का रुख किया। ये खुमैनी के पूर्वज थे। वो आकर अवध के दिल यानी लखनऊ से कुछ ही दूरी पर एक छोटे से कस्बे किंटूर में बस गए। सईद नकवी की किताब बीइंग द अदर में लिखते हैं कि ये एक ऐसा हिंदुस्तान था जहां पर हिंदू मुसलमान के बीच की लकीरें तब बहुत धुंधली हुआ करती थी। अवध के नवाब शिया थे।
‘हिंदुस्तानी मुल्ला’ के नाम चर्चित
इसी दौर में बाराबंकी जिले के किंटूर गांव में एक शिया मौलवी जन्म लेते हैं। सैयद अहमद मुसकी। उनका जन्म ऐसे मुल्क में हुआ जहां धर्म ही पहचान का सबसे बड़ा जरिया नहीं था। बल्कि तहजीब और अदब इंसान का कद तय करते थे। सैयद अहमद के नाम के साथ इसी लिए हिंदी का शब्द जुड़ा। ये एक शब्द नहीं था बल्कि उनकी पहचान थी। इस बात का सबूत कि उनका अब वतन हिंदुस्तान है। सैयद अहमद मुसकी हिंदी के नाम से जाने गए। वे एक प्रतिष्ठित शिया इस्लामी विद्वान थे, जिन्हें स्थानीय लोग ‘हिंदुस्तानी मुल्ला’ के नाम से जानते थे। उनका परिवार अवध के अशरफ यानी कुलीन वर्ग का हिस्सा थे।
रुहुल्लाह ने छह साल की उम्र से ही कुरान पढ़ना शुरू किया
जिसने कभी नहीं सोचा होगा कि उसकी मिट्टी में जन्मा एक इंसान कभी दुनिया की सबसे सख्त धार्मिक सत्ता की नींव रखेगा। खुद वापस अपने रूहानी सफर पर निकलते हैं। 1830 में वह इराक के नजफ शहर में हजरत अली के रौजे की जियारत के लिए जाते हैं। और फिर कभी लौटते नहीं। वो ईरान के खुमैन शहर में बस जाते हैं, वहीं शादी करते हैं और एक नई नस्ल को जन्म देते हैं। अहमद मुसवी की 1869 में मृत्यु हो गई, उन्हें इराक के शहर कर्बला में दफनाया गया, लेकिन उनकी धार्मिक विरासत, उनकी शिक्षाएं, आस्था का उनका नजरिया जिंदा रहा। इसने न सिर्फ उनके वंशजों को, बल्कि ईरान के राज्य की संरचना को भी आकार दिया। मुसवी के पोतों में एक का नाम रुहुल्लाह खुमैनी, वो मुस्तफा मुसबी के बेटे थे। खुमैनी काजन्म 24 सितंबर, 1902 को ईरान के कस्ते खुमैन में हुआ। खुमैनी ने छह साल की उम्र से ही कुरान पढ़ना शुरू कर दिया था। बाद में उन्होंने कुम शहर में वसने का फैसला कर लिया था
पलट दिया ईरान का शासन
1979 में ईरान में अयातुल्ला रुहोल्लाह खुमैनी ने इस्लामिक कांति की अगुवाई की। उनके इंकलाबी खुत्बों ने अमेरिका समर्थित शाह रजा पहलवी की सत्ता को जड़ से उखाड़ दिया। और तब ईरान एक आधुनिक राजा का मुल्क नहीं रहा। वो एक धर्म-राज्य बन गया, जहां संविधान से लेकर सड़को तक, सब कुछ इस्लामी कानून के मुताबिक चलने लगा। 1989 में जब खुमेनी का निधन हुआ तो अयातुल्ला खामेनेई ने उनकी जगह ली और तब से राष्ट्रपति कोई और बनता है। फिलहाल देश के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान है। खामेनेई 1989 से आजतक ईरान की बागडोर मजबूती से थामे हुए है।





