मैंने बम नहीं बांटा था
न ही विचार
तुमने ही रौंदा था
चींटियों के बिल को
नाल जड़े जूतों से।
रौंदी गई धरती से
तब फूटी थी प्रतिहिंसा की धारा
मधुमक्खियों के छत्तों पर
तुमने मारी थी लाठी
अब अपना पीछा करती मधुमक्खियों की गूंज से
कांप रहा है तुम्हारा दिल!
आंखों के आगे अंधेरा है
उग आए हैं तुम्हारे चेहरे पर भय के चकत्ते
जनता के दिलों में बजते हुए
विजय – नगाड़ों को
तुमने समझा था मात्र एक ललकार
और तान दी थी उस तरफ अपनी बंदूकें…
अब दसों दिशाओं से आ रही है
क्रांति की पुकार।
– वरवरा राव
हत्यारे फ़ासिस्ट गीदड़ों से भी गये-बीते कायर होते हैं। निर्भीकता से अवाम के पक्ष में बोलने वाले एक चौरासी साल के बीमार-बूढ़े शख़्स से भी ये नरभक्षी इतना डरते हैं कि उसे अस्पताल के बेड पर भी कड़े पहरे में जकड़ कर रखते हैं!
हम थूकते हैं पूँजी की सत्ता के लिए टॉयलेट पेपर का काम करने वाली इस न्याय व्यवस्था पर ! हम हज़ार लानतें भेजते हैं इस बुर्जुआ जनवाद को जो आम लोगों और उनके पक्ष में बोलने वालों के लिए पूँजीपति वर्ग की नग्न-निरंकुश तानाशाही है।
देख लो, इस देश के आम नौजवानो! देख लो इंसाफ़पसंद नागरिको! जिनका ईमान सलामत है और कलेजा सिकुड़ कर सुपारी बराबर नहीं हो गया है, वे बुद्धिजीवी-कवि-लेखक-कलाकार भी देख लें! इस तस्वीर को देख लो और हमेशा के लिए दिल में रख लो!
अगर ऐसी तस्वीरें हमारे ज़ेहन में बसी रहें तो चंद सिक्कों, सुविधाओं और सुरक्षा की ज़िन्दगी, और ऐशो-आराम के लिए बर्बरों-हत्यारों-लुटेरों के सामने झुकने को मन नहीं करेगा, कुर्सी पर बैठकर झूठी लफ्फाजी करने और प्रतीकवादी अनुष्ठानिक आन्दोलनों के खण्ड-खण्ड-पाखण्ड में भागीदारी का मन नहीं करेगा, केंचुआ, तिलचट्टा और कनखजूरा बनने का मन नहीं करेगा, कमीनगी और हरामीपन करने और अवाम को छोड़कर जंग के मैदान से भाग आने का ख़याल भी दिल में नहीं आयेगा!
ऐसी और भी सैकड़ों तस्वीरें हैं जो इतिहास की अदालत में बतौर गवाह अपना बयान दर्ज़ कराने के लिए इंतजा़र कर रही हैं।
अलविदा फ़ादर स्टेन स्वामी! हम आपको तनी मुट्ठी के साथ आखिरी इंक़लाबी सलामी पेश करते हैं। हम आपको यक़ीन दिलाते हैं फ़ादर! हम आपको, आपकी प्रतिबद्धता और वीरता को, आपकी क़ुर्बानी को और आपके साथ ज़ालिम हुक्मरानों के बर्बर सुलूक को कभी नहीं भूलेंगे! हम वायदा करते हैं फ़ादर, इंसाफ़ की लड़ाई चाहे जितनी लम्बी और कठिन हो, चाहे हमें जितनी भी दुश्वारियाँ और शिकस्तें झेलनी पड़ें, हम अपना मोर्चा नहीं छोड़ेंगे! अगर इस ज़िन्दगी में कामयाबी नहीं हासिल हो सकी तो हम आपकी तरह शान से मरना पसंद करेंगे और लड़ते रहने की विरासत अपने बाद वाली पीढ़ी को सौंपकर मरना पसंद करेंगे! फ़ादर! आपकी मौत जैसी मौतें हुक्मरानों की रातों की नींद हराम करती रहती हैं। वे आपके जीने से डरते थे और अब वे आपके मरने से भी डरेंगे।
सब याद रखा जायेगा! ठीक से याद रखा जायेगा ताकि वक़्त आने पर पाई-पाई का हिसाब चुकता किया जा सके!
*-कविता कृष्णपल्लवी*





