अग्नि आलोक
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यदि हम स्वयं को देख सकते तो……

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यदि हम स्वयं को देख सकते तो आईने की जरूरत क्या थी

 कब देख पाया है मृग भी स्वयं मैं छुपी कस्तूरी को

अगर देख ही पाता तो भ्रम बस भटकने की जरूरत क्या थी

ज्यादा नहीं सिर्फ आईने और भटकने पर विचार कर लिया जाए

 तो जन्नत और जहन्नुम की जरूरत क्या थी

 सूर्य भी जब स्वयं से निकली किरण को पकड़ नहीं पाया

तब दीपक और जुगनू को लाने की जरूरत क्या थी

:अगर सूर्य और चंद्र से ही सब संभल जाता

तो इसअनंत आकाश में तारों को टिमटिमाने की जरूरत क्या थी

उल्लू ही बन गए होते अंधकार से निपटने के लिए

सूरज चांद सितारे जुगनू और दीपक को लाने की जरूरत क्या थी

 यदि सीधे रास्ते से ही काम हो जाता तो दुनिया को गोल बनाने की जरूरत क्या थी

और हम अगर स्वयं को देख सकते तो गोल मटोल दुनिया में आने की जरूरत क्या थी

पूजा अग्निहोत्री दुबे

Ramswaroop Mantri

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