शशिकांत गुप्ते
आज सीतारामजी ने मिलते ही कहा, उन्हें एक कहावत का स्मरण हुआ। कौवा चला हंस की चाल,अपनी चाल को भूल गया
नकल करने में जो अपनी अक्ल का उपयोग नहीं करता है,उसका जो हश्र होता है,वह उक्त कहावत में प्रकट होता है।
मैने भी अपनी अक्ल का प्रदर्शन करते हुए कहा, मुझे भी प्रख्यात कवि गिरधरजी रचित एक कुंडली का स्मरण हुआ है।
गुन के गाहक सहस नर, बिन गुन लहै न कोय।
जैसे कागा-कोकिला, शब्द सुनै सब कोय।।
शब्द सुनै सब कोय, कोकिला सबे सुहावन।
दोऊ को इक रंग, काग सब भये अपावन।।
सीतारामजी ने कहा आपकी बात बहुत गम्भीर है। साधारण जन ये गूढ़ बात समझ नहीं पाएंगे।
सच में कोयल की आवाज कर्णप्रिय होती है।
कौवे की आवाज कर्कश होती है।
इतना कहकर सीतारामजी ने कहा, उन्हें यकायक सन 1967 में प्रदर्शित फ़िल्म एराउंड द वर्ल्ड का यह गीत याद आ गया। इस फ़िल्म में मुख्य भूमिका थी शोमेन का खिताब प्राप्त अभिनेता राजकपूर और अभिनेत्री राजश्री।
इस फ़िल्म यह गीत हास्य कलाकार महमूद पर फ़िल्मया है।
इस गीत को लिखा है गीतकार हसरत जयपुरीजी ने और गाया है,गायक मोहम्मद रफी ने।
कौवा चला हंस की चाल
आखिर भुला अपनी चाल
अपनी चाल को भुला लोगों
अपनी चाल को भुला
कौवा चला हंस की चाल
दुनिया भर की सैर को देखो
निकला है ये कौवा
उड़ते उड़ते इस नगरी में आ पंहुचा है कौवा
बुलबुल का हर गीत
गाता है ये कौवा
औरो की नकल पर ये जीता है ये कौवा
मैने सीतारामजी से पूछा आज आपको कौवे का स्मरण क्यों हुआ। कोई विशेष कारण है।
सीतारामजी ने मेरे प्रश्न का जवाब यह स्पष्टीकरण देते हुए दिया।
कौवे का स्मरण सहज ही हुआ है। उक्त गीत का किसी व्यक्ति या किसी समूह से कोई सम्बंध नहीं है। यह स्पष्टीकरण मै भगवान रामजी की शपथ लेकर दे रहा हूँ।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





