इंदौर
इसे विडंबना ही कहेंगे कि संविधान निर्माता बाबा साहब अंबेडकर का नाम देश में महज SC-ST वर्ग का प्रतिनिधि बनकर रह गया है। सभी राजनीतिक दल वोट बैंक की खातिर बाबा साहब को अपना बताने का प्रयास करते नजर आते हैं, लेकिन उनके नाम से चल रही यूनिवर्सिटी घोर उपेक्षा और बदहाली की शिकार है। हम बात कर रहे हैं इंदौर के पास अंबेडकर की जन्मस्थली महू में स्थित डॉ. बीआर अंबेडकर यूनिवर्सिटी ऑफ सोशल साइंसेस की। अंबेडकर जयंती पर जब इस यूनिवर्सिटी में चल रहे कोर्सेस और इंतजामो का जायजा लिया, तो इस अलग ही कहानी सामने आई।
टीचिंग और नॉन टीचिंग के 114 पद खाली, लेकिन शासन के पास बजट ही नहीं
संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर की जयंती पर महू में भाजपा और कांग्रेस ने कई बड़ी घोषणाएं तो की, लेकिन सोशल साइंस की प्रदेश की सबसे बड़ी और देश की दूसरी सबसे बड़ी डॉ. बीआर अंबेडकर यूनिवर्सिटी ऑफ सोशल साइंसेस इन दिनों बहुत ही खराब दौर से गुजर रही है। यहां कि वित्तीय स्थिति इतनी खराब कि वर्तमान में टीचिंग और नॉन टीचिंग स्टाफ की 114 पोस्ट खाली हैं, लेकिन शासन के पास इनके लिए बजट ही नहीं है।
एससी-एसटी वालों की यूनिवर्सिटी समझते हैं लोग
विवि में कई तरह के डिग्री व डिप्लोमा कोर्सेस हैं, इसके बावजूद स्टूडेंट्स का रुख दूसरे महंगे कॉलेज की ओर है। वे इस यूनिवर्सिटी को एससी-एसटी वालों की समझते हैं, जबकि यह सभी के लिए है। इसके चलते सामान्य वर्ग के स्टूडेंट यहां एडमिशन लेने से कतराते हैं। स्थिति यह है कि पास के महंगे कॉलेज में 10 हजार और यहां 1 हजार स्टूडेंट्स हैं।
वित्तीय स्थिति खराब, दो बार लग चुकी धारा 44
यूनिवर्सिटी की स्थापना 2015 में हुई थी। सात साल के कार्यकाल में दो बार धारा 44 लग चुकी है। इसका सीधा मतलब यह है कि यहां की प्रशासकीय व वित्तीय स्थिति बहुत खराब है। शासन को मजबूर होकर कुलपति को बर्खास्त करना पड़ता है। किसी नए व्यक्ति को जिम्मेदारी देनी पड़ती है। कुलपति प्रो. डीके शर्मा का कहना है कि मेरी कोशिश है कि यूनिवर्सिटी पटरी पर आए। सबसे बड़ी समस्या फंड को लेकर है। यूनिवर्सिटी को राशि एससी-एसटी फंड से मिलती है। सालभर में 8 करोड़ रुपए मिलते हैं। उसमें कर्मचारियों की सैलेरी, बिजली, पानी, पेट्रोल-डीजल का खर्चा आदि है जिसके बाद कुछ नहीं बचता।
पास के महंगे कॉलेज में 10 हजार और यहां 1 हजार स्टूडेंट्स
यूनिवर्सिटी की स्थिति यह है कि पास में एक कॉलेज है जहां 10 हजार स्टूडेंट्स हैं। जबकि यूनिवर्सिटी में ज्यादा बेहतर कोर्सेस हैं। इनमें से कुछ तो ऐसे हैं, जो देश की अन्य यूनिवर्सिटी में नहीं है। 17 स्कूल यूनिवर्सिटी के अधीन चल रहे हैं। यहां एम.फिल, पीएचडी, बी.लिब, एम.लिब कोर्सेस हैं। इसके बाद भी यह यूनिवर्सिटी मिथक नहीं तोड़ पा रही है। लोगों में धारणा है कि यह एससी-एसटी की है, जबकि यहां सभी के लिए शिक्षा के द्वार खुले हैं। बकौल प्रो. शर्मा यूनिवर्सिटी का फीस स्ट्रक्चर भी दूसरों की तुलना में कम है। यानी जो होना चाहिए उससे भी कम है, लेकिन एडमिशन की स्थिति बेहद खराब है। काफी समय से शासन व केंद्र सरकार से सहयोग मांग जा रहा है। इसे लेकर शुक्रवार को कुलपति प्रो. डीके शर्मा भोपाल में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान से मिलेंगे और उन्हें यूनिवर्सिटी का दर्द साझा करेंगे। कुलपति को उम्मीद है मुख्यमंत्री काफी संवेदनशील है और यूनिवर्सिटी को गति देंगे।
7 सालों में केवल 6 पदों पर नियुक्ति
कुलपति डॉ. डीके शर्मा ने बताया कि 2015 में जब यूनिवर्सिटी शुरू हुई थी, तब प्रोफेसर व असिस्टेंट प्रोफेसर के 6 पद भरे गए। जबकि 114 स्वीकृत पदों पर बजट नहीं होने के कारण नियुक्तियां ही नहीं हुई। जहां तक प्लेसमेंट की बात है, तो एडमिशन ही बहुत कम है। एग्रीकल्चर स्ट्रीम के कुछ स्टूडेंट्स के प्लेसमेंट हुए हैं। लेकिन प्लेसमेंट ड्राइव जैसा कुछ नहीं हुआ है।
ये कोर्सेस हैं यूनिवर्सिटी में
ग्रेजुएट : बीए, बीकॉम, बीबीए, बीएससी, बीएससी (एग्रीकल्चर)।
पोस्ट ग्रेजुएट : एमबीए – एचआर, फाइनेंस, मार्केटिंग, रूरल डेवलपमेंट, रिटेल मार्केटिंग, बैंकिंग एण्ड फाइनेंस सर्विसेस।
एमए : समाज शास्त्र, दर्शन शास्त्र, राजनीति विज्ञान, मनोविज्ञान, भूगोल, अर्थ शास्त्र, इतिहास, मानव विकास, मानव विकास व परिवार अध्ययन, प्रसार शिक्षा व प्रबंध संचार, ग्रामीण विकास व विस्तार, सैन्य विज्ञान, अपराध शास्त्र, पाली, बुद्धिस्ट स्टडी, महिला अध्ययन, योगा, पुलिस प्रशासन, हिन्दी, इंग्लिश।
एमएसडब्ल्यू – समाज कार्य, सामुदायिक नेतृत्व व सतत विकास।
एमएससी. : कृषि विस्तार शिक्षा, कृषि, अर्थ शास्त्र, हॉर्टिकल्चर विद वेजिटेबल साइंस, हॉर्टिकल्चर फ्रूट साइंस, गृह विज्ञान।
पीजी डिप्लोमा : महिला सशक्तिकरण, कम्प्यूटर एप्लिकेशन, टैक्सटाइल्स एंड फैशन।
इसके अलावा 25 से ज्यादा सर्टिफिकेट कोर्सेस संचालित किए जाते हैं।





