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प्रसंगवश : आतंकी  सत्ता के खिलाफ उठी बंद मुट्ठियाँ 

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पुष्पा गुप्ता (शिक्षिका)

 _यूरोप में युद्ध चित्रों की लम्बी परम्परा रही है। इन युद्ध चित्रों द्वारा उस शासक को इतिहास में महान, साहसी और विजेता के रूप में अमर करने का प्रयास होता था, जो उन्हीं शासकों के दरबारी चित्रकारों द्वारा बनवाये जाते थे। सदियों से न केवल इतिहास-लेखन बल्कि इतिहास-चित्रण दोनों ही राज सत्ता द्वारा प्रायोजित रहे।_
  युद्ध की विनाशलीला के बीच खड़े होकर तमाम चित्रकारों ने आमजन की त्रासदी के चित्र बनाए हैं।

द्वितीय विश्वयुद्ध के ठीक पहले स्पेन की अंदरूनी राजनीतिक परिस्थितियाँ बेहद गंभीर हो चली थीं। ऐसे में जर्मनी और इटली के राष्ट्रवादी शासकों ने स्पेन के दक्षिणपंथी तानाशाह फ्रैंको को अपना सैन्य समर्थन दिया और 1937 के स्पेन के गृहयुद्ध के बीच फ्रेंको ने उसके विरोध में खड़ी जनता पर जर्मनी और इटली के बमवर्षक विमानों से बमबारी करवा दी।
आम नागरिकों पर सैन्य विमानों द्वारा बमबारी जैसी इस अमानवीय घटना के प्रतिपक्ष में स्पेन में कई महत्त्वपूर्ण चित्र बने जिसमें पिकासो द्वारा निर्मित ‘गुएर्निका’ के साथ-साथ होरासिओ फेरर (1894 -1978) का ‘मैड्रिड-1937’ या ‘काले विमान’ भी उल्लेखनीय है।
इसी वर्ष पेरिस में आयोजित विश्व मेले में स्पेन के प्रगतिशील राजनैतिक दल द्वारा आयोजित चित्र प्रदर्शनी में दोनों चित्र प्रदर्शित हुए थे।

‘मैड्रिड -1937’ या ‘काले विमान’ शीर्षक होरासिओ फेरर का चित्र युद्ध के दौरान सबसे ज्यादा प्रभावित महिलाओं और बच्चों को केंद्र में रखकर बनाया गया। चित्र में कुल चार महिलाओं और अलग अलग उम्र के तीन बच्चों को देखा जा सकता है। चित्रकार ने इन सबको आतंक के क्षण में एक दूसरे से जुड़े हुए दिखाया है।
इस समूह की संरचना एक पिरामिड जैसी है जहाँ सबसे ऊपर तानाशाही के विरोध में उठी एक औरत की बंद मुट्ठी है। इस संरचना के साथ-साथ चित्र में इस समूह के चारों तरफ़ कोई स्पेस नहीं छोड़ा गया है जिससे दर्शक स्वयं को चित्र में उपस्थित लोगों के इतना करीब पाता है मानो वह स्वयं इस आतंक से प्रभावित हो।
पृष्ठभूमि में दीवार पर हुई बमबारी के निशान के द्वारा चित्रकार ने उस माहौल को दिखाया है, जहाँ महिलाएँ बमबारी से बचने के लिए अपने अपने बच्चों को लेकर सुरक्षित स्थान की तरफ़ भागती हुई दिखाई देती हैं। चित्र में सत्ता के आतंक के खिलाफ निहत्थे लोगों की प्रतिरोधी चेतना को रेखांकित करते हुए ऐसे आतंक के बीच खड़ी एक औरत के दर्शाया गया है, साथ ही इस चित्र में एक बच्चे को भी अपनी बंद मुट्ठी ऊपर उठाए हुए देखा जा सकता है।

यहाँ गौरतलब है कि 1937 के समय तक यूरोप आधुनिक चित्रकला के कई आन्दोलनों से गुजरते हुए ‘यथार्थ चित्रण’ से बहुत दूर चला आया था। इस चित्र के माध्यम से आम जनता तक पहुँचने के लिए पारम्परिक चित्रकला की तरफ़ ‘वापस लौटने’ का प्रयास दिखाई देता है।
यह सच है कि यह चित्र युद्ध की एक विशेष घटना पर आधारित है लेकिन चित्र के सन्दर्भ से अपरिचित दर्शक इस चित्र में सत्ता के आतंक से प्रभावित निरीह जनता की त्रासदी को अनुभव कर सकते हैं। व्याख्या और सन्दर्भ से परे जिन चित्रों को हम गहराई से अनुभव कर पाते हैं वही अंततः सार्थक और कालजयी चित्र होते हैं।
यह चित्र कैनवास पर तेल रंग से (148 X 129 से मी ) बनाया गया है जो स्पेन की राजधानी मैड्रिड के रेने सोफिया संग्रहालय में पिकासो के ‘गुएर्निका’ के साथ प्रदर्शित है।
(चेतना विकास मिशन)

Ramswaroop Mantri

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