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*भारत, खेल और फैंस — जब जुनून एकतरफा हो जाए*  

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-प्रियांशु कुमार

2024 के पेरिस ओलंपिक में भारत ने कुल 6 पदक जीते — 1 रजत और 5 कांस्य। एक भी स्वर्ण पदक देश की झोली में नहीं आया। वहीं, एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में कुल खेल बजट और प्रायोजन का 90% हिस्सा केवल क्रिकेट को मिलता है। KPMG India की रिपोर्ट बताती है कि देश में 75% से अधिक स्पॉन्सरशिप और विज्ञापन केवल क्रिकेटरों को ही मिलते हैं। 

 क्रिकेट को जन्म देने वाला देश इंग्लैंड भले ही अब इस खेल को एक सामान्य खेल की तरह देखता हो, क्योंकि इंग्लैंड क्रिकेट के अलावा हर खेलों में आगे है । लेकिन भारत में यह किसी आस्था से कम नहीं है। यहां क्रिकेट सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि एक जुनून है, एक उत्सव है। चाहे डिजिटल प्लेटफॉर्म हो या स्टेडियम दर्शकों की संख्या हर जगह करोड़ों में पहुँच जाती है। हाल ही में हुए आईपीएल फाइनल के बाद एक बार फिर यह साबित हो गया कि क्रिकेट को लेकर लोगों में कैसी दीवानगी है – कुछ मामलों में तो यह दीवानगी जानलेवा तक बन जाती है। 

लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी एक खेल को ही इतनी प्राथमिकता देना उचित है? भारत में क्रिकेट को मिलने वाली सुविधाएं, पैसों की बौछार और प्रायोजन की भरमार दूसरे खेलों के खिलाड़ियों के लिए एक सपना बनकर रह जाती है।  किसी भी शहर चले जाएं हर जगह छोटे-छोटे क्रिकेट अकादमियां खुल रही हैं, जहां बच्चों को प्रशिक्षित किया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर हॉकी, कुश्ती, एथलेटिक्स, बैडमिंटन , टेनिस , फुटबॉल जैसे खेलों की अकादमियां ढूंढे नहीं मिलतीं। नतीजतन इन खेलों को ना ही उतनी सम्मान  मिल पाती है और ना ही प्रतिभाओं को आगे बढ़ने का मंच।   

इसी जुनून के बीच बाकी खेल गुमनामी की धूल में खोते जा रहे हैं। हॉकी, जिसे भारत का राष्ट्रीय खेल माना जाता है, के बारे में अब शायद ही कोई मेजर ध्यानचंद के अलावा किसी खिलाड़ी को याद रखता हो। फुटबॉल में रोनाल्डो और मेसी के फैंस भारत में करोड़ों में हैं, लेकिन अपने देश के सुनील छेत्री को पहचानने वाले लोग बहुत कम हैं। बैडमिंटन, कबड्डी, एथलेटिक्स और शतरंज जैसे खेलों में भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहनीय प्रदर्शन किया है, फिर भी उन्हें क्रिकेट जैसा सम्मान नहीं मिला।

140 करोड़ की आबादी वाला भारत आज भी ओलंपिक पदक तालिका में शीर्ष 10 देशों से काफी पीछे है। 2020 के टोक्यो ओलंपिक में भारत ने 7 पदक जीते, जिनमें नीरज चोपड़ा का गोल्ड मेडल भी शामिल था। लेकिन 2024 के पेरिस ओलंपिक में भारत को एक भी स्वर्ण पदक नहीं मिला , यह स्थिति चिंताजनक है। क्या इसका दोष केवल खिलाड़ियों का है? शायद नहीं। 

यह असंतुलन सिर्फ खेलों के क्षेत्र में नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना में भी एक पक्षपात को दर्शाता है। आज जरूरी है कि भारत के खेल दर्शक   जनता को चाहिए कि वे हर खिलाड़ी को वही प्यार और सम्मान दें जो वे एक क्रिकेटर को देते हैं। क्योंकि हर बच्चा जो फुटबॉल या हॉकी लेकर मैदान में उतरता है, वह भी उतना ही सपना और संघर्ष लेकर आता है जितना कोई क्रिकेटर। तभी भारत एक खेल महाशक्ति बनने की दिशा में सही कदम बढ़ा पाएगा।

लेखक परिचय

प्रियांशु कुमार, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के स्नातक के छात्र हैं।

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