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भारत के असली हीरो बहादुर शाह जफर

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मुनेश त्यागी
   असली वीर और हिंदू हिंदू मुस्लिम एकता के प्रहरी, रक्षक और हिफाजतकर्ता तो भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 के हीरो, बहादुर शाह जफर थे जिन्होंने  अंग्रेजों द्वारा उनके बेटों और पोते के कत्ल के बाद भी जब अंग्रेजों ने उनके सर तश्तरी में रखकर बहादुर शाह के सामने पेश किए थे, तब भी अंग्रेजों से माफी नहीं मांगी, वे खौफजदा नही हुए, डरे नही और जेल जाना पसंद किया और वे रंगून की जेल में कैद कर दिए गए। 

   भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम अट्ठारह सौ सत्तावन की लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए एक संचालन समिति का गठन किया गया था जिसमें आधे मुसलमान थे और आधे हिंदू थे। इस संचालन समिति के सर्व प्रमुख बहादुर शाह जफर थे और उनके सचिव मुकुंद थे।     इस पूरे संग्राम को एक तार में पिरोने के लिए नाना साहेब का चयन किया गया और उनके प्रमुख सचिव अजीमुल्ला खान थे जिन्होंने क्रांति को सफल बनाने के लिए इंग्लैंड, वजीरिस्तान, रूस आदि देशों का दौरा किया और एक क्रांति की रूपरेखा तैयार की। इस क्रांति के लिए 30 मई अट्ठारह सौ सत्तावन का दिन तय किया गया था क्योंकि यह दिन इतवार था और इतवार के दिन अंग्रेज चर्चों में इकट्ठा होते थे, इसलिए उन पर आक्रमण करने का दिन चुना गया था, मगर मेरठ के सिपाहियों के उतावलापन के कारण  1857 का भारत की आजादी का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम, 10 मई 1857 को शुरू हो गया।      इस क्रांति से लोगों को जोड़ने के लिए जमींदार और राजाओं किसानों मजदूरों, दूसरे तमाम मेहनतकशों, महिलाओं आदि से संपर्क करने का काम नानासाहेब और अजीमुल्ला खान का था। इस संग्राम में मुख्य रूप से “कमल के फूल” और “रोटियों” का इस्तेमाल किया गया। कमल के फूल का इस्तेमाल शहरों में प्रचार के लिए और रोटियों का देहाती क्षेत्रों में प्रचार करने के लिए इस्तेमाल किया गया।     इस संग्राम के दूसरे महत्वपूर्ण स्वतंत्रता सेनानी झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, अजीजन बाई, बेगम हजरत महल, वीर कुंवर सिंह, पीर अली, तात्या टोपे, मंगल पांडे, मौलाना अहमद शाह आदि थे जिन्होंने क्रांति के संदेश को गांव गांव और शहर शहर फैलाया। 

     बहादुर शाह के नेतृत्व में अट्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति का आगाज मेरठ से हुआ। मेरठ में 85 क्रांतिकारी सैनिकों और स्वतंत्रता सेनानियों पर मुकदमा चला जिसमें 52 मुसलमान थे और 33 हिंदू थे। हमारे स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन का हिंदू मुस्लिम एकता का यह सबसे अद्भुत नजारा था, आज जो लोग हिंदू मुस्लिम एकता की नही, उनके झगड़े की बात करते हैं। मेरठ के हिंदू मुस्लिम सैनिकों की यह अद्भुत एकता उनके मुंह पर यह करारा तमाचा है। हमें इससे सबक लेना चाहिए और आज किसानों मजदूरों की दूसरी स्वतंत्रता की लड़ाई को आगे बढ़ाना चाहिए जो किसानों मजदूरों हिंदू मुसलमानों की एकता की बिनाह पर ही कामयाब हो सकती है।    जब क्रांतिवीर बहादुर शाह जफर को अंग्रेजों द्वारा बर्मा में कैद किया गया तब उन्होंने यह मशहूर शेर कहा था और राजा और देश की जनता की शेरदिली की बात की थी,,

,, गाजियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की, तख्त लंदन तक चलेगी तेग हिंदुस्तान की।    और वहीं यह भी कि बहादुर शाह जफर भारत भूमि से, हिंदुस्तान की धरती से कितना प्यार करते थे, यह उनके इस शेर में देखा जा सकता है। देखिए वह शेर में क्या कहते हैं,,,,,

 कितना बदनसीब है जफर,दफ्न के लिए, दोगज जमीन भी ना  मिली कुऐ यार  में। 

   आज माफी वीर सावरकर की बात हो रही है जिन्हें आजादी का सेनानी, राष्ट्रभक्त देशभक्त आदि क्या क्या बताया जा रहा है मगर 1920 के बाद यह सावरकर लगातार माफी मांगता रहा। पहले अंग्रेजों से 6 बार माफी मांगी और फिर गांधी हत्या के बाद भारतीय सरकार से माफी मांगता रहा। 1920 से लेकर 1947 तक यह आदमी भारत की एकता को तोड़ने के काम करता रहा, हिंदू मुस्लिम एकता को तोड़ने के काम करता रहा। झगड़े, फसाद, दंगे, हिंसा, हत्या और नफरत की बात करता रहा। इनके इतने लंबे कामों की फेहरिस्त के बाद इनको किसी भी दशा में भारत का स्वतंत्रता सेनानी या वीर की उपाधि नहीं दी जा सकती। 

   वीर तो बहादुर शाह जफर ही थे जिन्होंने अपना राज छिन जाने के बाद भी अंग्रेजों से माफी नहीं मांगी, अपने लड़कों और पोते की कत्ल के बाद भी माफी नहीं मांगी और जीवन के अंतिम दिन तक स्वतंत्रता संग्राम और आजाद भारत को आजाद कराने की मांग करते रहे।बहादुर शाह ज़फ़र जिंदाबाद।

Ramswaroop Mantri

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