शशिकांत गुप्ते
सर्वोदय आंदोलन के प्रणेता,भुदान नेता,गांधीजी के अनुयायी स्व. आचार्य विनोबा भावेजी के एक स्लोगन का स्मरण हुआ। साबुन को कीचड़ से क्या डरना
स्वच्छता करने वाले रसायनो से निर्मित साबुन को कीचड़ मतलब गंदगी से डरने की आवश्यकता ही नहीं है।
शारीरिक स्वच्छता,कपड़ों की स्वच्छ धुलाई और फर्श आदि को स्वच्छ करने के लिए भिन्न स्वरूप में साबुन उपलब्ध है।
इनदिनों स्वच्छता के लिए निर्मित साबुन,सर्वत्र फैलने वाले कीचड़ की मात्रा में बहुत कम पड़ रहा है?
एक ओर स्वच्छता के प्रतीक साबुन की मात्रा कम होना और दूसरी ओर कीचड़ को फैलाने के अभियान पर अभिमान किया जाना,बहुत ही गम्भीर प्रश्न है?
सर्वत्र कीचड़ फैलने के कारण समूची व्यवस्था दूषित हो गई है।मराठी भाषा में एक कहावत है, उभा इंद्र नागवा अर्थात कोई व्यक्ति सम्पूर्ण रूप से नग्न हो जाए तो कहाँ कहाँ से ढाकोगे?
सुनहरे दिन लाए जाएंगे ऐसे लोकलुभावन आश्वासनों के पर यकीन कर लोगों ने भी तादाद में कीचड़ फैलाने में सहयोग किया?
आमजन स्वयं के द्वारा ही फैलाएं गए कीचड़ के कारण, हरक्षेत्र में फैले दलदल से निकलने के लिए छटपटा रहा है।
हम बाह्य सफाई में तो अव्वल नंबर पा रहें हैं।
आंतरिक सफाई बहुत बड़ी चुनौती है?आंतरिक सफाई के लिए किसी साबुन की आवश्यकता नहीं है?
आंतरिक सफाई के लिए विवेक का जागृत होना चाहिए?
इस प्रक्रिया के अपनाने के लिए प्रत्येक जन को स्वयं के जहन में यह विश्वास जागृत करना पड़ेगा कि उसके पास बुद्धि है?प्रत्येक जन को यह एहसास भी होना चाहिए कि,वह दूसरों की बुद्धि पर अवलंबित नहीं है।
विवेक जागृत होने पर, किसी के भी द्वारा कोई भी आश्वासन दिया जाए,तब सर्वप्रथम आश्वासन कर्ता की नीयत को भांपना की क्षमता आ जाती है।
यह तब ही सम्भव है,जब कचरें की सफाई से ज्यादा तवज्जों आंतरिक सफाई पर दी जाएगी?
आंतरिक सफाई के कारण हरएक व्यक्ति पूर्ण रूप से यह जान जाएगा कि कीचड़ ज्यादा देर तक जमा रहने से उसमें शैवाल पैदा होता है, और दुर्गंध भी फैलती है।यह प्रदूषण प्राणी मात्र के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है?
जागृत होकर गुलशन में गुलों की खुशबू फैलाना है।गुल मतलब फूल, अंग्रेजी में Flower कहतें हैं।अंग्रेजी का Fool (मूर्ख) नहीं बनाना है।
जब विवेक जागृत हो जाएगा तब हम सब यह गीत इस तरह गाएंगे।
वो सुबह तो हम लाएंगे
दौलत के लिए जब औरत की इस्मत को न बेचा जाएगा।
चाहत को न कुचला जाएगा
इज्जत को न बेचा जाएगा
बीतेंगे सभी यह दिन आखिर ये भूखे और गरीब के
टूटेंगे कभी तो बूत आखिर दौलत की इजारेदारी के
और यह भी जोर शोर से गाएंगे।
पांसे सभी पलट देंगे दुश्मन की चाल के
आसमाँ में बादल उड़ाएंगे हम खुशी के गुलाल के
शशिकांत गुप्ते इंदौर





