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क्या भारत आर्थिक मंदी का शिकार होने वाला है?

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हमारे पड़ोसी देशों से लेकर दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में इन दिनों उथल-पुथल मची हुई है। मंदी (Recession) की आशंका गहराती जा रही है। अमेरिका 4 दशकों की सबसे अधिक महंगाईसे जूझ रहा है। चीनी अर्थव्यवस्था में आंकड़े सुस्ती के संकेत दे रहे हैं। यूरोप (Europe) के देशों में महंगाई चरम पर है। पड़ोसी देश श्रीलंका की अर्थव्यवस्था तबाह हो चुकी है। पाकिस्तान आईएमएफ से कर्ज के लिए मिन्नतें कर रहा है। वैश्विक मंदी को लेकर रोज नई-नई बातें कही जा रही हैं। ऐसे में भारत में भी कई लोग अगले दो-तीन साल में आर्थिक मंदी आने के दावे करने लगे हैं। खासतौर से विपक्ष के कई नेता आने वाले समय में मंदी की आशंका जाहिर करने लगे हैं। तो क्या वास्तव में साल 2008 जैसी मंदी फिर से देखने को मिलेगी? क्या यह भारत के लिए भी खतरे की घंटी है? आइए जानते हैं।

वैश्विक परिस्थितियां सही नहीं

पिछले कुछ वर्षों में दुनिया में कई ऐसी परिस्थितियां रहीं, जिनके चलते आज दुनिया के कई देश मंदी के कगार पर खड़े हैं। पहले यूएस-चीन ट्रेड वॉर के चलते वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हुई। उसके बाद कोरोना महामारी ने आर्थिक गतिविधियां को पूरी तरह जकड़ लिया। लॉकडाउन लगाए जाने से दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाएं बुरी तरह प्रभावित हुईं। आर्थिक पैकेज के नाम पर देशों को भारी पैसा खर्च करना पड़ा। फिर अर्थव्यवस्थाओं में रिकवरी आने ही लगी थीं, कि रूस ने यूक्रेन पर हमला कर दिया। इस भारी भू-राजनीतिक तनाव के चलते वैश्विक सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई। कमोडिटीज की महंगाई चरम पर पहुंच गई और शेयर बाजार धड़ाधड़ गिरने लगे। अब महंगाई पर काबू पाने के लिए दुनिया भर के केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में लगातार इजाफा कर रहे हैं, जिससे कर्ज काफी महंगा हो गया है। इन सब परिस्थितियों का परिणाम है कि अब दुनिया मंदी की कगार पर खड़ी है।

कब आती है मंदी

मंदी अर्थव्यवस्था में गिरावट की एक लंबी अवधि होती है। जब अर्थव्यवस्था चरम पर होती है, तो यह शुरू होती है और जब अर्थव्यवस्था बॉटम लेवल पर आ जाती है, तो यह बंद हो जाती है। जब लगातार कई तिमाहियों में इकोनॉमी में सिकुड़न देखाई देने लगती है, तो मंदी आने की बात कही जाती है। मंदी दिखाने के लिए महत्वपूर्म डेटा जीडीपी रेट (GDP Growth Rate) होता है। मंदी आने पर बेरोजगारी बढ़ जाती है, शेयर बाजारों में गिरावट रहती है, और वेतन-भत्ते घट जाते हैं। आमतौर पर माना जाता है कि जब किसी इकोनॉमी में लगातार दो तिमाहियों में जीडीपी ग्रोथ घटने लगे, तो उस इकोनॉमी में टेक्निकल रूप से मंदी की बात कही जाती है। कई एक्सपर्ट्स कह रहे हैं कि अमेरिका इस साल की चौथी तिमाही से मंदी में प्रवेश कर सकता है। उसके बाद यूरोपीय यूनियन, जापान और साउथ कोरिया जैसे देश भी मंदी की चपेट में होंगे।

भारत के लिए परेशानी कम
भारत की अर्थव्यवस्था लंबे समय से दुनिया में सबसे तेज गति से बढ़ रही है। यहां कि युवा आबादी भारत के लिए वरदान है। कोरोना महामारी के प्रभाव से धीरे-धीरे भारतीय अर्थव्यवस्था बाहर आई है। वहीं, कई एक्सपर्ट्स का कहना है कि विकसित देशों में मंदी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद हो सकती है। सिटीग्रुप में भारत के इकोनॉमिक्स हेड समिरन चक्रवर्ती के अनुसार, दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में मंदी आने पर वैश्विक स्तर पर कमोडिटीज (वस्तुओं) की कीमतों में नरमी आएगी। कमोडिटीज की कीमतें गिरने का सीधा असर यह होगा कि भारत में महंगाई में कमी आएगी। इस तरह अमेरिका जैसे दुनिया के बड़े देशों में आने वाली मंदी भारतीयों को महंगाई से निजात दिला सकती है।

आने वाले समय में कम होगी महंगाई
भारत के लिए इस समय बड़ा मुद्दा महंगाई है। लेकिन बीते कुछ समय में धातुओं, खाने के तेल और क्रूड ऑयल की कीमतों में वैश्विक स्तर पर काफी गिरावट आई है। इसका असर देश में भी देखने को मिल रहा है। धातुओं की कीमतों में गिरावट आई है। खाने के तेल के खुदरा भाव घटे हैं। सरकार द्वारा पेट्रोल-डीजल पर टैक्स घटाने का भी असर देखने को मिला है। भारत के नजरिए से सबसे अच्छी बात यह है कि वैश्विक स्तर पर क्रूड ऑयल की कीमतों में भारी कमी आई है। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश तेल आयात करता है। क्रूड ऑयल के वैश्विक दाम 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब आ गए हैं। इससे आने वाले समय में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कमी आने की संभावना है। इससे अन्य वस्तुओं की कीमतें भी कम होंगी। आंकड़ों के अनुसार, जून में थोक महंगाई तीन महीने के निचले स्तर पर रही थी। यह 15.18 फीसदी पर आ गई। वहीं, जून में खुदरा महंगाई भी घटकर 7.01 फीसदी पर रही थी।

जीडीपी ग्रोथ में अच्छी तेजी का अनुमान
कई अर्थशास्त्रियों का कहना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 14-15 फीसदी की दर से ग्रोथ करने का अनुमान है। पहली तिमाही के लिए जीडीपी के आंकड़े 31 अगस्त को आने हैं। 10 अर्थशास्त्रियों के एक सर्वे में पहली तिमाही के लिए जीडीपी का औसत अनुमान 14.43 फीदसी रहा। साथ ही वित्त वर्ष 2023 के लिए जीडीपी ग्रोथ का अनुमान 7.2 से 7.6 फीसदी लगाया गया। बता दें कि आरबीआई ने पहली तिमाही के लिए 16.2 फीसदी और पूरे वित्त वर्ष के लिए 7.2 फीसदी ग्रोथ रेट रहने का अनुमान दिया है। देश के औद्योगिक उत्पादन में भी अच्छी ग्रोथ देखने को मिल रही है। आंकड़ों के अनुसार, मई में देश के औद्योगिक उत्पादन (IIP) में 19.6 फीसदी की वृद्धि हुई है। ये सब आंकड़े बताते हैं कि भले ही दुनिया के बड़े देश अपने आप को मंदी के कगार पर पाते हों, लेकिन भारत के लिए कोई बड़ी परेशानी के संकेत नहीं हैं।

Ramswaroop Mantri

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