सुधांशु चतुर्वेदी
इजाडोरा डंकन की आत्मकथा पढ़ रहा था, यूरोप की महान नृत्यांगना लेकिन त्रासदीपूर्ण जीवन।
कठोर और भावशून्य छवि के बावजूद लोगों की मदद करना आदत में शुमार और वो भी इस तरह की एक हाथ से मदद किया तो दूसरे हाथ को भी पता न चले। बिल्कुल किसी Feudal Lord की तरह ख़ज़ाने में हाथ डाला और भिक्षुक के तरफ बिना नज़र डालें उछाल दिया इस भाव के साथ कि-
‘ले, न मैं देने वाला, न तू लेने वाला’

लाइमलाइट वाली ज़िंदगी से एक अजीब चिढ़ जैसे बहुत ओछी चीज हो फिर भी ताउम्र लाइमलाइट में रही, भाग्य।
असीम खूबसूरती और कला के सामने बड़े बड़े लार्ड और प्रिंस नतमस्तक रहे लेकिन उनके प्रति ऐसी उदासीनता जैसे सन्यासी को सोने से, यूँ दुत्कार दिया जैसे बिल्कुल छि छि… माया…
दिल भी आया तो ऐसे साधारण व्यक्तित्वों पर जिनके तरफ दुनिया की कोई मामूली लड़की भी शायद आकर्षित न हो और उन मूर्खों ने भी ऐसी बेक़दरी दिखाई कि …दुर्भाग्य
‘हुश्न अगर दस्तरस (काबू) में आ जाये तो फिर वो अपनी कशिश (आकर्षण) खो देता है टाइप’
जीवन मे एक समय मे घोर गरीबी देखा तो एक समय पर वैभव का चरम लेकिन स्वभाव में एक गंभीर स्वाभिमान मिश्रित स्थिरप्रज्ञता, पैसा मतलब हाथ का मैल, आया गया कोई लेना देना आकर्षण नही।
लेखक लिखता है कि-
“ऐसी महान अदाकारा अपने जीवन में इस बात का जरा भी ख़्याल नही रखती थी कि लोग उसे पसंद कर सकें। वो बहुत गर्वीली और आत्मकेंद्रित थी और लोगों के अभिवादन का जवाब तक देना भी उसे भारी जान पड़ता था”
फिर भी वो लोगों के पसंद का केंद्रबिंदु रही…भाग्य
जो भी किया डूबकर किया, कभी market analysis नही, हर बार एक नया कीर्तिमान स्थापित करना और फिर किसी वैरागी के तरह छोड़ देना… हटाओ इसको नही चाहिये।
सामने दुनिया बाँहे फैलाये खड़ी है, सम्मान और आकर्षण में कमर तक झुके हुए लोग… इजाडोरा…इजाडोरा… इजाडोरा… चाह ले तो मल्लिका बन जा, चाह ले तो मज़हब… लेकिन इजाडोरा चुनती है मोहब्बत में कनीज़ और फिर फ़ना हो जाना… लेकिन कोई ग्लानि नही, कोई चाह नही, बस जो चाहा वो किया। प्रतिभा, कुशाग्रता, सौंदर्य के साथ अक्खड़पन और Emotional Intelligence का असंयत मिश्रण।
और अंत में कम उम्र में एकाकीपन के साथ ही मृत्यु। एकाकीपन जो उसको हमेशा से पसंद रहा…दुर्भाग्य या फिर इजाडोरा के नज़रों में भाग्य।
या फिर प्रतिभा के साथ एकाकीपन का अभिशाप ![]()





