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हमारी जिम्मेदारी है कि हम अपने बच्चों में सही एटीट्यूड का करें निर्माण

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एन. रघुरामन

गणतंत्र दिवस वाला सप्ताह होने के कारण इस सोमवार को एयरपोर्ट पर सुरक्षा कड़ी थी, जहां लोगों को ना सिर्फ जैकेट बल्कि जूते और यहां तक कि संदेह पैदा करने वाली हर छोटी से छोटी चीज भी निकालकर स्क्रीनिंग मशीन में डालने के लिए कहा गया। मुझसे आगे खड़े दो युवाओं के पास कई इलेक्ट्रॉनिक आइटम थे जैसे आइपॉड्स, इलेक्ट्रिक शेवर्स, स्पीकर्स, बैटरी बैंक, लैपटॉप, दोनों के पास दो-दो फोन और जाहिर है इन सारी चीजों के ढेर सारे तार भी थे।

बल्कि उनका बैग तो किसी इलेक्ट्रिशियन के झोले जैसा लग रहा था, जो घर पर कुछ सुधारने आया हो और पेंचकस खोजने के लिए पूरे बैग को जमीन पर खाली कर दिया हो। लड़के ने सुरक्षाकर्मी को समझाने की कोशिश की, उनसे पूछा, ‘क्या आपने इलेक्ट्रिक शेवर नहीं देखा?’ सुरक्षा दल ने नियंत्रित पर कड़े लहजे में कहा, ‘हर चीज़ निकालो’ कड़ी सुरक्षा से खीझ गए उनमें से एक ने गुस्से में अपने बैकपैक से हर चीज निकाल दी और इस दौरान उसका महंगा फोन उसके हाथ से छूट गया और स्क्रीन बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई, हालांकि फोन काम कर रहा था।

उस लड़के ने सुरक्षा कर्मी को ऐसे देखा, मानो उस नुकसान के लिए वही जिम्मेदार हो। उन्होंने सुरक्षा कर्मी को ग्लानि में डालने की कोशिश की और यहां तक कहा कि ‘उनके कारण उसका फोन टूट गया।’ सुरक्षा कर्मी अनसुना करते हुए अपने काम में लग गए और जवाब देने की जहमत नहीं उठाई। कुंठित होकर लड़के वहां से चले गए। विमान प्रस्थान के इंतजार में अगले 45 मिनट तक दोनों अपने लैपटॉप पर ये खोजते रहे कि डैमेज फोन कैसे बदलें, किस कीमत पर, ईएमआई की क्या सुविधा है, कौन-सा क्रेडिट कार्ड कितनी छूट दे रहा है।

पर दोनों में से किसी ने एक लाइन भी नहीं कही कि जितने में फोन आएगा, उससे बहुत कम में सिर्फ तीन घंटे में डैमेज स्क्रीन बदल सकते हैं। चीजों पर बारीकी से नजर रखने के कारण मुझे पता है कि यहां असल में क्या गलत हुआ। मेरा मत है कि युवाओं की किसी बाहरी से ‘ना’ सुनने की अक्षमता के कारण यह रोके जा सकने वाला नुकसान हुआ। अपना विचार पुख्ता करने के लिए मैं उनके पास गया और कहा, ‘तुम भाग्यशाली हो कि ऐसे माता-पिता मिले हैं, जिन्होंने किसी भी चीज के लिए कभी ‘ना’ नहीं कहा।

बहरहाल, यात्रा सुरक्षित हो।’ वे दोनों जानने को उत्सुक थे कि मैंने कैसे अनुमान लगाया, जबकि मैं तो उन्हें जानता भी नहीं था, उन्होंने ये माना कि वाकई वे सौभाग्यशाली हैं कि ऐसे माता-पिता मिले, जिन्होंने कभी ‘ना’ नहीं कहा। मैंने बस कहा, ‘सुरक्षा जांच पर तुम्हारा व्यवहार देखकर’ और वहां से चला गया। अगर आप बढ़ती उम्र में ‘ना’ स्वीकारना नहीं सीखते हैं, तो बाद के साल में ये त्रासद साबित हो सकता है। बिल्कुल यही इन दोनों किशोरों के साथ हुआ।

हर समय ‘हां’ के साथ दुलार पाने वाला बच्चा जब बड़ा हो जाता है, तो ‘ना’ सुनने से डरता है क्योंकि उसकी परवरिश ‘ना’ स्वीकारने वाले एटीट्यूड के साथ हुई ही नहीं। एटीट्यूड को मतलब नहीं कि आप उसे कैसे ढाल रहे हैं, पर जब एक बार ढल गया तो फिर अपने आकार के मुताबिक अभिव्यक्त होता है।

इसलिए बाद के सालों में ऐसे लोगों को दुनिया जब ‘नहीं’ शब्द के साथ खारिज करती है, तो ये लोग इसे दिल पर ले लेते हैं। और वे खुद को खारिज करना शुरू कर देते हैं और बाहरी लोगों की हर एक अस्वीकृति पर गुस्सा दिखाते हैं जैसे उस लड़के ने एयरपोर्ट पर किया। बच्चे की कोई गैरवाजिब मांग पर कभी-कभार ‘ना’ कह देना हकीकत में उन्हें भविष्य से निपटने में मदद करेगा।

फंडा यह है कि यह देश हम सबका है और यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम अपने बच्चों में सही एटीट्यूड का निर्माण करें।

Ramswaroop Mantri

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