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*जयंत विष्णु नारळीकर:जिन्हें यूनेस्को ने  #भारतीय_आइंस्टीन बताया था*

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◾ विद्या सिन्हा 

🔴 आधुनिक भारत के विज्ञान को नई ऊंचाई और जनता के बीच लोकप्रिय बनाने वाले डॉ नार्लीकर नहीं रहे व् 26 मई 2025 को 86 साल की उम्र में उनका निधन हो गया। डॉ जयंत विष्णु नारलीकर देश ही नहीं दुनिया के महान खगोल विज्ञानी थे ।  रैंगलर डॉ वी वी नारळीकर और संस्कृत विद्वान सुमती नारळीकर के बेटे जयंत विष्णु नारळीकर का जन्म कोल्हापुर में 19 जुलाई 1938 को हुआ था। उनके पिता बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में गणित के विभागाध्यक्ष थे। बनारस के बाद डॉ नारळीकर आगे की पढाई के लिये केंब्रिज चले गये । 25 साल की उम्र में पी एच डी करने के बाद वे भारत वापस आ गये थे। 

🔴 सी एस आई आर के पूर्व निदेशक और डॉ. नारलीकर के मित्र डॉ. रघुनाथ अनंत माशेलकर ने अपने दोस्त को  श्रद्धांजलि देते हुये कहा है कि “उनके जैसा वैज्ञानिक जो विज्ञान को प्रयोगशालाओं और संस्थानों से निकाल कर जनता के बीच ले जाने का हिमायती हो, ऐसा वैज्ञानिक जो राजनेताओं के अवैज्ञानिक बोलों का खुले तौर पर विरोध करता हो इस देश के लिये अनमोल था।“   

🔴 दुनियां मे पढ़े लिखे होने और विज्ञान की डिग्री हासिल कर लेने भर से कोई वैज्ञानिक सोच से संपन्न नहीं हो जाता, यह बार बार दिखाई देता है। हमारे देश में यह कुछ ज्यादा ही है। स्कूलों और कालेजों में भौतिक विज्ञान और गणित जैसे ठेठ तर्क और सबूतों के आधार पर पढ़ाने वाले शिक्षक सत्यनारायण की कथा में मंजीरे बजाते  हुये दिखते हैं और इसरो जैसे संस्थानों के प्रमुख अपनी सफलता का श्रेय भगवान को देते हुये दिखते हैं। धर्म में आस्था अपनी अपनी व्यक्तिगत पसंद नापसंद का प्रश्न है। लेकिन जब वैज्ञानिक प्रगति का दावा करने वाली देश की संस्थाओं के प्रमुख पद पर बैठे लोग अपनी आस्थाओं को देश की सत्ता के साथ गलबाहियां करने के लिये इस्तेमाल करने लगें तो विज्ञान और तर्क आम जनता के बीच अपना अर्थ और उद्देश्य खो बैठते हैं।

🔴 डॉ. जयंत विष्णु नारलीकर आज की इस तस्वीर से अलग दिखने वाले और वैज्ञानिक सोच को सर्वोच्च मानने वाले सच्चे वैज्ञानिक थे । वे समाज में वैज्ञानिक चेतना और तार्किक क्षमता को बढाने के पक्षधर थे।  संघ परिवार के सत्ताधीशों के शुरूआती दिनों में जब मुरली मनोहर जोशी ने ज्योतिष को विज्ञान बताते हुये उसे पढाई का एक विषय बनाने की कोशिश की तब डॉ नारलीकर थे जिन्होने जोरदार शब्दों में इसका विरोध करते हुये कहा था कि ज्योतिष कोई विज्ञान नहीं है। 

🔴 डॉ. नारलीकर संघ परिवार के अवैज्ञानिक और अंधविश्वास बढाने वाले तमाम प्रचारों का पुरजोर विरोध करते थे। उन्होने कई साल पहले शेखर गुप्ता को दिये गये एक इंटरव्यू में स्पष्ट किया था कि वेदों में सब कुछ नहीं है। खगोल विज्ञान भी हमने ग्रीक खगोल विज्ञानियों से सीखा है। पुणे के सावित्रीबाई फुले विश्वविद्यालय के परिसर में देश के प्लानिंग कमिशन के चेयरमन प्रोफेसर यशपाल की पहल पर 1988 में स्थापित इंटर युनिवर्सिटी सेटर फॉर  एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स संस्थान के वे संस्थापक निदेशक थे। इस संस्थान को किस खूबी से उन्होने चलाया इसका जिक्र उनके मित्र और सहयोगी डॉ माशेलकर ने किया है। यह भी दिलचस्प है कि संस्थान की इमारत का डिजाइन प्रसिद्ध आर्किटेक्ट चाल्र्स कोरिया ने बनाया था । 

🔴  लेकिन डॉ. जयंत नारलीकर ने इसमें जनता और बच्चों के विज्ञान के प्रति प्यार और समर्थन पैदा करने के उद्देश्य से परिवर्तन कराये। इस संस्थान के एक भाग में उनकी पहल पर विज्ञान की लोकप्रियता का काम शुरू किया गया है ।  जहां पर आम लोगों के बीच विज्ञान को लोकप्रिय और समझ में लाने लायक  बनाने के लिये कार्यक्रम किये जाते हैं। डॉ. माशेलकर बताते हैं कि नारलीकर के अनुसार विज्ञान को पढ़ना हमारा कर्तव्य है लेकिन उसे जनता के बीच ले जाना उससे भी बडा कर्तव्य है। वे कहते थे कि विज्ञान का काम करके हम समाज पर कोई उपकार नहीं कर रहे हैं। 

🔴 युनेस्को ने उन्हे कलिंग पुरस्कार से नवाज़ते हुये भारतीय आईस्टीन की उपाघि दी थी।  डॉ . नारळीकर ने अपनी कई विज्ञान कहानियों और उपन्यास के माध्यम से अंधविश्वास और विज्ञान को अलग अलग करके दिखाया है। वे देश में फैलती जा रही अंधविश्वासी विचारधारा से बेहद चिंतित थे। उनके एक इंटरव्यू में जो उनकी पत्नि डा मंगला नारळीकर ने लिया था वे कहते हैं कि “इस देश के बच्चों के बीच वैज्ञानिक विचारधारा को मजबूत करना बेहद आवश्यक है वरना यहां की वैज्ञानिक परंपरा जो चार्वाक से होते हुये रामानुजन,सी वी रमन जैसे वैज्ञानिकों तक आई थी खत्म हो जायेगी।“ 

🔴 एक कार्यक्रम उन्होने प्रसि़द्ध तर्कशास़्त्री डॉ नरेंद्र दाभोळकर के साथ मिल कर किया था और फलित ज्योतिष को गलत साबित किया था। डॉ. नारळीकर देश के उन कुछ गिने चुने वैज्ञानिको में से थे जो खुलकर और निडरता के साथ फलित जोतिष को अवैज्ञानिक और अतार्किक बताते थे। डॉ  नारळीकर ही थे जिन्होने डॉ. दाभोळकर की पुण्यतिथि 20 अगस्त को हर साल वैज्ञानिक चेतना दिवस के तौर पर मनाने का समर्थन किया था और उसके पहले कार्यक्रम में भागीदारी की थी। 

🔴  मानवजाति का विकास नारळीकर जैसे वैज्ञानिकों के कामों और खोजों से ही होता है जो आइंस्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत और बिग बैंग थ्योंरी पर ही अपने शिक्षक डॉ. हावेल के साथ मिलकर सवाल उठा देते हैं और इस तरह विश्व प्रसिद्ध हावेल- नारळीकर गुरूत्वाकर्षण का सिद्धात जन्म लेता है। 

🔴 यह दुनियां विज्ञान और वैज्ञानिक सोच के आधार पर विकसित होती हुई यहाँ तक पहंची  है तभी तो गैलिलियो को गलत ठहरा कर उसे चुप कर देने वाले और ब्रूनो को जिंदा जला देने वाले चर्च को सदियों के बाद उनसे माफी मांगनी पडती है। मगर हमारे यहां अभी बहुत लंबा रास्ता तय करना है । वह समय आयेगा जब डॉ. दाभोळकर, कलबुर्गी, पानसारे और गौरी लंकेश जैसे तर्कवादियों और वैज्ञानिक सोच को विकसित करने की कोशिश करने वालों के हत्यारें और उनकी मानसिकता का समर्थन करने वाली आर एस एस की राजनैतिक विचारधारा को जनता तिरस्कृत करेगी और जाने अनजाने इसका साथ देने वाले अपने घुटनों के बल बैठकर से माफी मांगेगी । ऐसे समय डॉ. जयंत विष्णु नारळीकर जैसे निडर वैज्ञातिकों याद बेहद आयेगी – जिन्होंने काली आँधियों के बीच खुद को मशाल बनाकर रखा । 

🔵 लोकजतन परिवार की ओर से महान वैज्ञानिक डॉ. जयंत विष्णु नारळीकर को विनम्र श्रद्धांजलि ।

#लेखिका 

◾ भौतिकशास्त्र की अध्येता एवं बदलाव के सामाजिक विज्ञान वैज्ञानिक भौतिकवाद की  प्रमुख एक्टिविस्ट्स में से एक हैं ।

Ramswaroop Mantri

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