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जेएनयू हुआ लाल, सलाम साथियों !

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  -सुसंस्कृति परिहार 

 केंद्रीय सरकार, शिक्षा मंत्रालय, विश्वविद्यालय प्रशासन के असामान्य हस्तक्षेप और पिछले वर्षों में नियुक्तियों में RSS से संबंधित लोगों की छाँट छांट कर भर्ती, शोध छात्रों की संख्या में बड़ी कटौती और दिल्ली पुलिस की मदद से मौजूदा सत्ता से असहमत छात्र संगठनों और सामान्य छात्रों के विरुध्द आतंक पैदा करने वाली हिंसक घटनाओं के बावजूद जेएनयू में एक बार फिर लाल परचम फहराया है

इसकी एक वजह यह भी है कि JNUSU के चुनावों का संचालन छात्रों की ही एक चुनी हुई सर्वसम्मत इकाई करवाती है ! यदि यह कार्य ज्ञानेश कुमार गुप्ता जी के हाथ में होता तो नतीजे निश्चित ही कुछ और होते !

जीते हुए उम्मीदवार :-प्रेसिडेंट : अदिति मिश्रा (लेफ्ट यूनाइटेड)उपाध्यक्ष : के. गोपिका (लेफ्ट यूनाइटेड)महासचिव : सुनील यादव (लेफ्ट यूनाइटेड)।संयुक्त सचिव : दानिश अली (लेफ्ट यूनाइटेड) हैं। बीजेपी की छात्र इकाई ABVP का साफ होना इस बात का द्योतक है कि युवा भाजपा और संघ को भली-भांति समझ गए हैं। वे किसी दबाव और उत्पीड़न से नहीं डरे। शाबाश जेएनयू। इस शानदार जीत ने लाल परचम फहराकर वातावरण लाल कर दिया है।जो क्रांति का उद्घोष है।

इस जीत के मायने स्पष्ट हैं पढ़ा लिखा युवा आज की राजनीति से ख़फ़ा है। वह साफ़ सुथरे चुनाव का हामी है।बैलेट से चुनाव का पक्षधर है।साथ ही महिलाओं के प्रति नरम रुख रखता है उनको ज़िम्मेदारी देने में नहीं हिचकता। इसलिए चार प्रमुख पदों में से तीन पर युवतियों को जिताया है। उन्हें अपनी चयन समिति पर विश्वास था और जीत के बाद भी सभी साथियों पर यकीन है।काश ऐसा यकीन देश भर के चुनावों में देखने मिलता।

विदित हो,1971में JNUSU चुनाव के बाद से, JNU वामपंथी राजनीति का केंद्र रहा है। JNUSU अध्यक्ष पद पर अब तक SFI ने 22 बार और AISA ने 12 बार जीत हासिल की है, जो वामपंथी विरासत को बताती है। ABVP को केवल एक बार, साल 2000 में, संदीप महापात्रा ने महज एक वोट से जीत दिलाई थी। NSUI के तनवीर अख्तर ने 1991 में जीत दर्ज की थी।

कोविड-19 के कारण चार साल के बाद, 2023 में वाम एकता ने फिर से सभी चार पद जीतकर अपनी पकड़ मजबूत की थी। इस बार, लेफ्ट यूनिटी अपने इतिहास को दोहराया है।

 नई चुनी गई यूनियन कई जरूरी स्टूडेंट समस्याओं को हल करने में बहुत अहम् होती है  जैसे लाइब्रेरी और हॉस्टल की सुविधाओं को बेहतर बनाना। एकेडमिक सिस्टम में बदलाव करना, रिसर्च के लिए ज़्यादा पैसा पाना और कैंपस को सभी के लिए ज्यादा वेलकमिंग बनाना, नेशनल एजुकेशन पॉलिसी कैंपस की आजादी और स्टूडेंट वेलफेयर पर चर्चाएं नई यूनियन की टु डू लिस्ट में सबसे ऊपर रहने की उम्मीद की जा सकती है।

यूनिवर्सिटी ने इलेक्शन कमेटी की तारीफ़ की है कि उन्होंने यह पक्का किया कि चुनाव प्रक्रिया निष्पक्ष और खुली हो। इस बीच, जीतने वाले उम्मीदवारों के समर्थक पूरे कैंपस में हॉस्टल और मैदानों में नारे लगाकर और बैनर लहराकर खूब जश्न मना रहे हैं । 

और अब जब JNUSU 2025 के नतीजे आ गए हैं, तो कैंपस में राजनीतिक बातचीत एक नए दौर में पहुँच गई है। यह भारत के सबसे ज़्यादा राजनीतिक रूप से जागरूक विश्व विद्यालयों में से एक है जिसमें सक्रिय स्टूडेंट भागीदारी और ज़ोरदार बहसों के एक और साल के लिए मंच तैयार करता है।

जेएनयू के इन चुनावों से देश में हो रहे चुनाव को सबक सीखने की ज़रुरत है। यहां चुनाव आयोग जैसा छल छंद नहीं है।सभी यूनियनों के लोग विद्यार्थियों के बीच अपनी बात रखते हैं। विद्यार्थी ही चुनाव सम्पन्न कराते हैं और फिर सब मिलकर जय पराजय को भूलकर खुशनुमा माहौल में जश्न मनाते हैं तथा चयनित फेडरेशन को सहयोग करते हैं 

सबसे बड़ी बात है जेएनयू की इस महान परम्परा को ख़त्म करने की भारत सरकार हज़ारहा कोशिश करने के बाद जेएनयू की रौनक बरकरार है। उम्मीद है यह निरंतरता और जागरूकता कायम रहेगी जिसने देश को महान नेता सीताराम येचुरी और कन्हैया कुमार तथा अनेक विद्वान दिए है। विश्व विद्यालय अपनी गरिमा बनाए रखेगा।ऐसा भरोसा है जिसका सम्मान दुनियाभर के लोग करते हैं। एक बार फिर जेएनयू को लालसलाम।

Ramswaroop Mantri

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