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*कैलास मानसरोवर यात्रा-सशरीर स्वर्ग देखने का सोपान:शेषनाग, संगतराश कुदरत और कैलास परिक्रमा*

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सृष्टि की शुरुआत से शिव अकेले ऐसे देवता हैं, जिनकी निरंतरता बनी हुई है. वे या तो कैलास पर रहते हैं या फिर श्मशान में, और काशी- यह तो महाश्मशान है. शिव उसके अधिपति हैं. हमारी आस्था में कैलास, शिव और पार्वती का निवास है. बौद्ध धर्म में इसे बोधिसत्वों के पृथ्वी पर उतरने की जगह मानते हैं. जैन धर्म के पहले तीर्थंकर ऋषभदेव की निर्वाण-स्थली है कैलास.

पांच साल बाद कैलास-मानसरोवर यात्रा फिर शुरू हो गई है. उधर चीन ने भी पचास श्रद्धालुओं का जत्था भेजा है. उसमें पत्रकार मित्र भी हैं. टुकड़ों-टुकड़ों में सबके अनुभव आ रहे हैं. आज कैलास चीन के कब्जे में है. हमारे देवता का घर चीन के कब्जे में है. वैसे भी आजादी के बाद के भारत का हिस्सा ये कभी नहीं रहा. तिब्बत में रहा लेकिन अब तिब्बत ही तिब्बत का न रहा. आधुनिक भारत के नक्शे का हिस्सा न होकर भी कैलास भारत और भारत की सांस्कृतिक-आध्यात्मिक सीमा का एक अहम स्तंभ है. शिव के बिना भारत की बात नहीं हो सकती और कैलास के बिना शिव की.

कैलास को दुनिया की नाभि या दुनिया के केंद्र बिंदु माना जाता है. इसे आकाशीय ध्रुव और भौगोलिक ध्रुव का केंद्र भी मानते हैं. कहते हैं कि यही वह बिंदु है जहां आकाश धरती से आकर मिलता है. यहीं पर आकर दसों दिशाओं का मिलन भी होता है. शिव और पार्वती भी यहीं मिले थे. भगवान शिव का रुद्रलोक भी कैलास पर्वत के ऊपर ब्रह्मांड में है. यह स्वर्ग का द्वार है. ॐ की ध्वनि यहीं गूंजती है. कैलास पर्वत के साथ ही मेरु पर्वत है जिसे श्री कृष्ण गीता में कहते हैं कि पर्वतों में मैं मेरु पर्वत हूं.

मन में ये जिज्ञासा थी कि काशी और कैलास का क्या रिश्ता? देवताओं के देव महादेव को आखिर कैलास इतना क्यों पसंद है? ऋषि-मुनियों के इस नंदन-कानन कैलास को देखने की इच्छा बचपन से थी. काशी में जन्म लेने के बाद जब से होश संभाला, यही सोचता था कि शिव अगर कैलास पर रहते हैं तो काशी में क्या करते हैं? इन्हीं सवालों के उत्तर ढूंढने की अपनी यात्रा में आपको भी आज से अपना सहयात्री बना रहा हूं. और सहयात्री केवल देखते नहीं हैं, महसूस करते हैं. पहुंच जाते हैं वहीं. यह अगर मैं कर पाया तो मेरी कैलास यात्रा सफल. तो चलते हैं कैलास की यात्रा पर, शिव की चर्चा और संदर्भों के साथ.

कैलास: यात्रा का किस्सा पार्ट 1

कैलास यानी साक्षात् स्वर्ग. और काशी, जहां मात्र मरने से स्वर्ग जाते हैं. काशी और कैलास का यही शाश्वत रिश्ता है. कैलास जाने का मैंने जो संकल्प लिया, उसके मूल में यही रिश्ता था, यानी मुझे स्वर्ग जाना था. पर बिना मरे. सब नहीं जा सकते. वहां बुलावे पर ही जाना होता है. हमारे खानदान में कोई नहीं गया. रिश्ते-नातेदार भी नहीं गए. किसी की कल्पना भी नहीं थी कि वहां सशरीर जाया जा सकता है. इसलिए मेरे लिए यह सिर्फ यात्रा नहीं, अंतर-यात्रा थी. अतीत की यादों में जाने का एक आयोजन. पुरखों को तारने का यज्ञ. जीते-जी स्वर्गीय होने का सुख. इसलिए हमें कैलास जाना था.

सृष्टि की शुरुआत से शिव अकेले ऐसे देवता हैं, जिनकी निरंतरता बनी हुई है. वे या तो कैलास पर रहते हैं या फिर श्मशान में, और काशी- यह तो महाश्मशान है. शिव उसके अधिपति हैं. इसी तार के जरिए काशी और कैलास का मेल बनता है. दोनों के मूल में शिव हैं. एक स्वर्ग है और दूसरा स्वर्ग जाने का रास्ता. यही सेतु लंबे समय से मैं ढूंढ रहा था.

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घुमक्कड़ी प्रवृत्ति, देश और समाज को जानने की इच्छा वर्षों से मेरे कैलास जाने के आवेग को बढ़ा रही थी. मन में कई जिज्ञासाएं थीं. शंकर वहां रहते हैं. सभी नदियों के स्रोत वहां हैं. धरती पर ताजे पानी का सबसे बड़ा भंडार वहीं है. राजहंस वहीं पाए जाते हैं. मेरी दादी बचपन में कैलास को स्वप्नलोक-सा बताती थीं. कैलास की तलहटी में मानसरोवर भी एक अद्भुत रहस्य-लोक है. दिन में कई बार सूरज की स्थिति बदलने से मानसरोवर का रंग बदलता है.

ऋषि-मुनि और देवगण यहां बड़े सवेरे ब्रह्म-मुहूर्त में नहाने आते हैं. रिनपोछे जी भी कैलास को उतनी ही श्रद्धा से याद करते थे जितनी श्रद्धा उन्हें भगवान बुद्ध में थी. बनारस में रिनपोछे जी ( समदांग ) तिब्बत की निर्वासित सरकार के प्रधानमंत्री थे. बनारस में रहते हुए उनका हमारे घर अकसर आना-जाना हुआ करता था. वे कैलास के अलौकिक सौंदर्य का बखान करते नहीं थकते. बचपन में उन्हीं के जरिए मेरी बौद्ध धर्म की भी समझ बनी. बाकी जो बचा था वह घुमक्कड़ समाजवादी कृष्णनाथ जी ने समझाया. तिब्बत, कैलास और बौद्ध धर्म पर उनकी गहरी समझ थी.

बिना सोचे-समझे चल पड़े

कहते हैं, ब्रह्मा ब्रह्मलोक में, विष्णु बैकुंठ में और शिव कैलास पर रहते हैं. जिंदा रहते हम न ब्रह्मलोक जा सकते हैं, न बैकुंठ. सिर्फ कैलास ही जाया जा सकता है. शिव आदि हैं, इसलिए कैलास जाना अपनी जड़ों को खोजना है. गंगा के मूल में जाना है. क्षीर सागर की गोद में बैठना है. शिव और गंगा से हमारा बनारसी नाता ही हमें कैलास की ओर खींच रहा था.

मित्रों ने सचेत किया कि यात्रा कठिन है. जाने से पहले एक बार और सोचिए. लेकिन मेरा तो संकल्प था. मुझे जाना ही है. सोचा, अपनी वसीयत तो लिख ही दूं, ताकि कुछ गड़बड़ हुई तो लोगों को परेशानी न हो. फिर ख्याल आया, अगर उन्हें यही मंजूर है तो मैं क्यों लिखूं? बिना सोचे-समझे हम चल पड़े- दुनिया की सबसे सुंदर और दुर्गम यात्रा के लिए. शिवत्व की खोज में एक आदिम और अनंत स्मृति की ओर. इस मान्यता के साथ कि कैलास ही मेरु पर्वत है, जो ब्रह्मांड की धुरी है.

हमारी आस्था में कैलास, शिव और पार्वती का निवास है. बौद्ध धर्म में इसे बोधिसत्वों के पृथ्वी पर उतरने की जगह मानते हैं. जैन धर्म के पहले तीर्थंकर ऋषभदेव की निर्वाण-स्थली है कैलास. इसे अष्टपद भी कहते हैं क्योंकि जैन मानते हैं कि ऋषभदेव ने आठ पग में इसकी परिक्रमा की थी.

बौद्ध धर्म में बुद्ध का अलौकिक रूप डैमचौक कैलास पर ही पाया जाता है. बुद्ध के इस रूप को धर्मपाल कहते हैं. बौद्ध कैलास को कांग रिनपोचे कहते हैं. कांग रिनपोचे का मतलब है- आध्यात्मिक सुख की प्राप्ति. तिब्बत में मान्यता है कि मानसरोवर के पास ही भगवान बुद्ध महारानी माया के गर्भ में आए थे. बोनपाओ बुद्ध से पहले तिब्बतियों का धर्म था. उसके अनुसार, कैलास एक नौ मंजिला स्वस्तिक शिखर था, जिसके जरिए उनके पंथ-प्रवर्तक धरती पर उतरे थे. इस पर्वत के चारों तरफ दिव्य शांति और आध्यात्मिकता की तरंगें उठती हैं. उनकी मान्यता जो भी हो, पर कैलास की परिक्रमा में इसे सहज महसूस किया जा सकता है.

रामायण-महाभारत में कैलास का वर्णन

सबसे पहले ऋषि मांधाता इस पवित्र भूमि पर आए थे. आदि शंकराचार्य ने अपना शरीर कैलास पर ही छोड़ा था. गुरु नानक देवजी भी इस पर्वत पर ध्यान लगा चुके हैं. स्वामीनारायण संप्रदाय के स्वामीनारायण का यहीं ईश्वर से साक्षात्कार हुआ था. वे उत्तर प्रदेश के गोंडा के छपिया गांव से सीधे यहीं पहुंचे थे.

रामायण और महाभारत में कैलास का वर्णन है. रावण ने इसी जगह शिव की आराधना की थी. वह कैलास पर्वत को उठाकर अपने साथ ले जाना चाहता था. शिव ने बहलाकर उसे ऐसा करने से रोका. अर्जुन ने भी इसी पर्वत पर तपस्या कर भगवान शंकर से पाशुपत अस्त्र हासिल किया था. युधिष्ठिर यहीं से स्वर्ग गए थे. उस वक्त एक-एक कर उनके सभी साथी कैलास के रास्ते में ही छूट गए थे. सिर्फ उनका कुत्ता ही उनके साथ जा पाया था. भस्मासुर यहीं भस्म हुआ था. किसी को भी छूकर भस्म कर देने का वरदान उसे भगवान शिव ने इसी पर्वत पर दिया था. वरदान पाते ही वह शिव की ओर दौड़ पड़ा. शिव को अपनी जान बचाने के लिए भागना पड़ा. ब्रह्मा के मानस से रचा मानसरोवर यहीं है.

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पत्नी की मृत्यु से व्याकुल भगवान शंकर जब सती का शव लेकर घूम रहे थे तो सती का हाथ यहीं गिरा था, कथा है कि इससे ही मानसरोवर झील बनी. शिव उस वक्त क्रोध से विक्षिप्त होकर घूम रहे थे. उनके क्रोध को देख देवताओं को लगा कि अब महाविनाश होगा. ब्रह्मा ने विष्णु को उनके पीछे भेजा, ताकि सती का शव किसी तरह उनसे अलग किया जाए. योजना बनी कि सती के अंग गलाए जाएं, क्योंकि शव के रहते शिव का क्रोध शांत नहीं हो पा रहा था. इसलिए यह जगह शक्तिपीठों में भी शुमार है.

सिर्फ शिव हैं जो मरते नहीं

कैलास पर कभी पर्वतारोहण नहीं हुआ. लोग इस पर्वत शिखर पर चढ़ते नहीं, सिर्फ नीचे से इसकी परिक्रमा होती है. चढ़ने वाला पर्वत एवरेस्ट है. इसलिए एवरेस्ट प्रतिस्पर्धा का प्रतीक है और कैलास श्रद्धा का. यह पर्वत पूजनीय है. इस पर पांव कैसे रखें? शिव का डर है. वे विध्वंसक हैं. अगर न हों तो संसार में अराजकता होगी. बाकी देवता मरते रहते हैं, सिर्फ शिव हैं जो मरते नहीं. वे लोटा भर जल और दो बिल्व पत्र से प्रसन्न हो जाते हैं. घोर नास्तिक भी कैलास जाकर नतमस्तक होता है.

लेकिन सभ्यता की दृष्टि अब असभ्य होने लगी है. प्रकृति के सापेक्ष. प्रकृति अब मनुष्य के विस्तार की पीड़ा महसूस कर रही है. अब सभ्यता की काली छाया मानसरोवर पर भी पड़ने लगी है. यह सरोवर सिकुड़ रहा है. 410 वर्ग किलोमीटर का यह पवित्र सरोवर 12 किलोमीटर तक सिकुड़ गया है. चीन ने उसकी छाती पर सड़कें बना दी हैं. इसे प्रकृति का क्रोध ही मानें. कालिदास होते तो देखते कि उनके हिमालय को क्या हो गया. क्या यह वही हिमालय है, जिसका वर्णन रघुवंश और कुमारसंभव में हुआ है. सभ्यता वहां पहुंच चुकी है, इसलिए हिमालय के दिव्य आकार में भयानक उत्पात हो रहा है.

इस उत्पात को भी मैं अपनी यात्रा में साक्षी भाव से देखता रहा. एक ओर कैलास तक आने का परम लक्ष्य और दूसरी ओर मानसरोवर की सूखती अंजुली का अपार कष्ट. मेरी यात्रा वृतांत की आगे के कड़ियां इन्हीं दोनों अनुभवों के बीच चलती हुई आगे बढ़ेंगी. अगली कड़ी से हम चल पड़ेंगे कैलास की यात्रा पर… जय जय!

कैलास यात्रा : सांसों की माला में सिमरूं मैं शिव का नाम

राम का व्यक्तित्व मर्यादित है, कृष्ण का उन्मुक्त और शिव असीमित व्यक्तित्व के स्वामी. वे आदि हैं और अंत भी. वे अणु हैं और अनंत भी. शायद इसीलिए बाकी सब देव हैं, केवल शिव महादेव. वे उत्सवप्रिय हैं. शोक, अवसाद और अभाव में भी उत्सव मनाने की उनके पास कला है. सिर्फ देश में ही नहीं, विदेश में भी शिव की गहरी व्याप्ति है. ‘हिप्पी संस्कृति’ 60 के दशक में अमेरिका से भारत आई.

तो तय हुआ, नटराज शिव के पास जाना है. फिर क्या ले जाना और क्या वापस लाना! मन तो कहता है, सब वहीं छोड़ आएं. फिर भी, घर में तैयारियां युद्ध स्तर पर थीं. मेरे लिए शून्य से कम तापमान में पहनने वाले जैकेट और पैंट लाए गए. सिर पर बांधनेवाली टॉर्च. बिना बिजली के मोबाइल चार्ज करनेवाला यंत्र. बर्फबारी में पहननेवाली बरसाती. वाटरप्रूफ जूता, टोपी, मोजे, चश्मा और न जाने क्या-क्या! ऊंचाई पर काम आनेवाली दवाइयां. हाथ और पैर गरम करनेवाले रासायनिक पाउच, जिन्हें सिर्फ जेब में रखकर गरमी महसूस की जा सकती है. पत्नी-बच्चों ने ये सब सामान बांध हमें दिल्ली से लखनऊ रवाना किया, मानो एडमंड हिलेरी और तेनजिंग नोर्गे के बाद मैं ही हिमालय पर जा रहा हूं. हाई अल्टीट्यूड में सिकनेस की दवाइयां. मसलन रक्त पतला करनेवाली गोली डायमॉस भी साथ रखी. डॉक्टर की राय थी कि अगर सुबह-शाम एक गोली ली गई तो परेशानी ज्यादा नहीं होगी.

लखनऊ से कुछ और मित्र यात्रा में शामिल हुए. हम बहराइच के रास्ते नेपालगंज पहुंच गए. नेपालगंज नेपाल का माओवादी असर वाला इलाका था. उस रोज वहां माओवादियों की नाकेबंदी थी. सारे रास्ते बंद. हमारे साथ एक रसूखदार मित्र थे. उनकी रक्षा में पुलिस थी. लोगों ने बताया कि पुलिस देख माओवादी और भड़कते हैं. संयोग से नेपालगंज के मेरे एक पुराने मित्र, जो पहले स्थानीय पत्रकार थे, उन दिनों माओवादियों के एरिया कमांडर के तौर पर काम कर रहे थे, वे मुझे मिल गए. बड़ी आवभगत की. और अपने साथ हमें होटल तक सुरक्षित पहुंचा गए.

सिमिकोट एक छोटा गांव

मैं अतिवादी नहीं हूं, पर न जाने कैसे यह अति हो गई. कैलास मानसरोवर की सरकारी यात्रा 26 दिनों की होती है. नेपाल के रास्ते कुछ टूर ऑपरेटर पंद्रह रोज में लैंडक्रूजर गाड़ियों से यात्रा कराते हैं. पर हमने महज पांच रोज में यात्रा करने की ठानी, नेपाल की एक टूरिस्ट एजेंसी की मदद से. सात सीटोंवाले एक चार्टेड हेलीकॉप्टर के जरिए. हेलीकॉप्टर को हमें तिब्बत के हिलसा तक ले जाना था और वहीं से लौटाकर नेपालगंज वापस छोड़ना था. हिलसा से आगे तीन घंटे की यात्रा लैंडक्रूजर गाड़ियों से तय करनी थी. यात्रा के बाकी सामान, टेंट, खाने-पीने की वस्तुएं, खानसामा और गाइड हमें तकलाकोट में मिलने वाले थे. यह टीम अलग से हमारे ग्रुप के लिए ही काठमांडू से चली थी.

दूसरे रोज अल-सुबह हम नेपालगंज हवाई अड्डे पर थे. हमारे लिए सात सीटोंवाला एक बेल हेलीकॉप्टर खड़ा था. मौसम खराब था, इसलिए नेपालगंज से सिमिकोट के लिए हेलीकॉप्टर देर से उड़ा. सिमिकोट नेपाल-तिब्बत सीमा पर दुर्गम इलाके में 10 हजार फीट की ऊंचाई पर छोटा सा गांव है. हेलीकॉप्टर के पायलट कैप्टन प्रधान को उड़ान का खासा अनुभव था. वे आदमी भी अच्छे थे. लेकिन मेरी चिंता कुछ और थी. हेलीकॉप्टर में वे अकेले पायलट थे, क्योंकि सह-पायलट की सीट पर हमारे सातवें साथी सवार थे. इसलिए हेलीकॉप्टर सह-पायलट के बिना उड़ा. हरे-हरे पेड़ों से लदी पर्वत-श्रृंखलाओं को पार करते हम दो घंटे बाद सिमिकोट के ऊपर थे.

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दस हजार फीट की ऊंचाई पर सिमिकोट नाम के इस छोटे से गांव में एक कच्ची हवाई पट्टी थी. बारह सीटोंवाले छोटे जहाज यहां आते हैं. यही जहाज इनके खाने-पीने का सामान लाने और बाहरी दुनिया से इस गांव के संपर्क का जरिया हैं. वरना सौ घरों की इस बस्ती में दोनों ओर (नेपाल और तिब्बत) सात रोज पैदल चलने के बाद ही बाजार मिलते हैं. राशन या तो नेपाल से जहाज में आता है या फिर तिब्बत से खच्चरों के जरिए. खच्चर तकलाकोट से दुर्गम पहाड़ियां पार कर सात रोज में यहां तक पहुंचते हैं.

एक प्रश्न बार-बार जेहन में कौंधता रहा

सिमिकोट कहने को नेपाल में था. वहां नेपाल के बजाय चीन की सुविधाएं ज्यादा थीं. नेपाल में रहते हुए भी ये गांव नेपाली सभ्यता से कटा था. हमें हवाई अड्डे के कंट्रोल टावर के पास ही लकड़ी के बने एक अतिथिगृह में ठहराया गया. अब क्या करना है? मेरे इस सवाल पर कैप्टन प्रधान ने कहा कि हम कल सुबह चलेंगे. फिलहाल आप लोग यहीं आराम करें.

आखिर हम कल तक का वक्त क्यों बरबाद करें? आज ही क्यों न चलें? हमने पूछा.

प्रधान बोले, पहले इस ऊंचाई से आपके शरीर का तालमेल बैठ जाए, फिर आगे चलेंगे.

पर हमें तो अभी कोई परेशानी नहीं है. हम वैसे ही हैं. आगे भी चल सकते हैं.

हंसते हुए प्रधान बोले, परेशानी बढ़ सकती है. यह कह वे आराम करने चले गए.

तभी बारी-बारी से हम सभी के सिर भारी होने लगे. शरीर श्लथ होने लगा. सांस लेने में ताकत लगने लगी और लगा कि सांस लेने से फेफड़ों की प्यास बुझ नहीं रही है. कैप्टन को बुलाया गया. उन्होंने हमें दवाई दी और सलाह दी कि लंबी-लंबी सांस लें. शाम तक फेफड़े अभ्यस्त हो जाएंगे. अब हम सब कैप्टन के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित कर रहे थे. यहां रुकने का प्रयोजन पता चल चुका था. रात तक हम प्रकृतस्थ हो गए थे.

सांस अब संतुलन बैठाने लगी थी. बहुत हलचल और चहलकदमी की गुंजाइश मगर अभी कम थी. हम आती-जाती सांस के साथ रात काटने के जतन में लग चुके थे. लेटे-लेटे विचारों की कौंध फिर से चेतना पर छाने लगी. एक प्रश्न बार-बार जेहन में कौंधता रहा कि आखिर शिव में ऐसा क्या है, जो उत्तर में कैलास से लेकर दक्षिण में रामेश्वरम तक वे एक जैसे पूजे जाते हैं? उनके व्यक्तित्व में कौन सा चुंबक है, जिस कारण समाज के भद्रलोक से लेकर शोषित, वंचित, भिखारी तक उन्हें अपना मानते हैं? वे सर्वहारा के देवता हैं. उनका दायरा इतना व्यापक कैसे और क्यों है?

यात्रा पूरी तरह से शिवमय हो गई

राम का व्यक्तित्व मर्यादित है, कृष्ण का उन्मुक्त और शिव असीमित व्यक्तित्व के स्वामी. वे आदि हैं और अंत भी. वे अणु हैं और अनंत भी. शायद इसीलिए बाकी सब देव हैं, केवल शिव महादेव. वे उत्सवप्रिय हैं. शोक, अवसाद और अभाव में भी उत्सव मनाने की उनके पास कला है. वे उस समाज में भरोसा करते हैं, जो नाच-गा सकता हो. माया से ऊपर उठकर स्वयं में खो सकता हो. यही शैव परंपरा है. जर्मन दार्शनिक फ्रेडरिक नीत्शे कहते हैं, उदास परंपरा बीमार समाज बनाती है. शिव का नृत्य तो श्मशान में भी होता है. श्मशान में उत्सव मनाने वाले वे अकेले देवता हैं. तभी तो पंडित छन्नूलाल मिश्र भी गाते हैं- खेलैं मसाने में होरी दिगंबर खेलैं मसाने में होरी, भूत-पिशाच बटोरी दिगंबर खेलैं मसाने में होरी. यह गायन लोक का है.

सिर्फ देश में ही नहीं, विदेश में भी शिव की गहरी व्याप्ति है. ‘हिप्पी संस्कृति’ 60 के दशक में अमेरिका से भारत आई. हिप्पी आंदोलन की नींव यूनानियों की प्रति संस्कृति आंदोलन में देखी जा सकती है. पर हिप्पियों के आदि देवता शिव तो हमारे यहां पहले से ही मौजूद थे या यों कहें, शिव आदि हिप्पी थे. अधनंगे, मतवाले, नाचते-गाते, नशा करते भगवान शंकर. इन्हें भंगड़, भिक्षुक, भोला-भंडारी भी कहते हैं. आम आदमी के देवता, भूखे-नंगों के प्रतीक. वे हर वक्त सामाजिक बंदिशों से आजाद होने, खुद की राह बनाने और जीवन के नए अर्थ खोजने की चाह में रहते हैं.

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यही मस्तमौला हिप्पीपन उनके विवाह में अड़चन था. देवी के पिता इस हिप्पी से बेटी ब्याहने को तैयार नहीं थे. कोई भी पिता किसी भूखे, नंगे, मतवाले से बेटी ब्याहने की इजाजत कैसे देगा. शिव की बारात में नंग-धड़ंग, चीखते-चिल्लाते, पागल, भूत-प्रेत, मतवाले सब थे. लोग बारात देख भागने लगे. शिव की बारात ही स्वयं में उनकी लोक व्याप्ति की मिसाल है.

हमारी परंपरा में विपरीत ध्रुवों और विषम परिस्थितियों से अद्भुत सामंजस्य बिठानेवाला उनसे बड़ा कोई दूसरा भगवान नहीं है. मसलन, वे अर्धनारीश्वर होकर भी काम पर विजेता हैं. गृहस्थ होकर भी परम विरक्त हैं. नीलकंठ होकर भी विष से अलिप्त हैं. उग्र होते हैं तो तांडव, नहीं तो सौम्यता से भरे भोला भंडारी हैं. परम क्रोधी पर दयासिंधु भी शिव ही हैं. विषधर नाग और शीतल चंद्रमा दोनों उनके आभूषण हैं. उनके पास चंद्रमा का अमृत है और सागर का विष भी. वे ऋद्धि-सिद्धि के स्वामी होकर भी उनसे अलग हैं. सांप, सिंह, मोर, बैल, सब आपस का वैर भाव भुला समभाव से उनके सामने हैं. वे समाजवादी व्यवस्था के पोषक हैं. सिर्फ संहारक नहीं, वे कल्याणकारी, मंगलकर्ता भी हैं. यानी शिव विलक्षण समन्वयक हैं, महान कोऑर्डिनेटर.

सोचते-सोचते मैं सो गया. यह बताने में भले ही हल्का ही लगे लेकिन अनुभव की दृष्टि से अलौकिक ही है कि यात्रा पूरी तरह से शिवमय हो गई थी. शिव का स्मरण जगते हुए, चलते हुए या उड़नखटोले में. उद्देश्य और लक्ष्य भी शिव. आराम करने के लिए रुके तो चेतना में भी शिव और शिव का समझने-जानने की जिज्ञासाओं के बीच ही सोचते सोचते सो जाना. अलौकिक था सचमुच. सपने याद नहीं. थकावट वाक़ई गहरी नींद देती है. अगली सुबह आगे की यात्रा के लिए इंतज़ार कर रही थी… जय जय!

कैलास यात्रा: चीनी सिपाही और नमकीन चाय

चीनी पुलिसवालों के साथ हमारा पहला अनुभव अच्छा नहीं था. वे बेहद सख्त, बेरहम और बदजुबान थे. एक ने मेरे पास कई किताबें देख कर पूछा, दलाई लामा का फोटो तो नहीं है. मैंने कहा, किताब में नहीं, दिल में है. वह मेरी ओर खीझ से देख रहा था. चीन में दलाई लामा के चित्रों पर पाबंदी है. वहां दलाई लामा के चित्रों के सार्वजनिक प्रदर्शन पर 10 साल की सजा का प्रावधान है.

दूसरे रोज सुबह हम सिमिकोट से हिलसा के लिए उड़े. हिलसा चौदह हजार फीट पर था. ऊंचाई ज्यादा थी, इसलिए हेलीकॉप्टर पूरी क्षमता से नहीं उड़ सकता था. तीन और चार के ग्रुप में हम बारी-बारी से वहां पहुंचाए गए. हिलसा पचास घरों का छोटा सा अस्थायी गांव है. अस्थायी इसलिए कि सर्दियों में जब यहां बर्फ पड़ती है तो ये गांववाले सिमिकोट चले जाते हैं. एक पतली लेकिन हाहाकारी नदी करनाली हिलसा में नेपाल और तिब्बत की सीमा बनाती है. नदी के उस पार चीन है. दोनों को जोड़नेवाला एक लक्ष्मण झूला जैसा पुल है. इस पुल को पैदल पार करना होता है.

करनाली नदी मानसरोवर से निकलती है. पूरा नेपाल पार करते हुए जब भारत में पहुंचती है तो सरयू कही जाती है. यही अयोध्या के बाद घाघरा बन जाती है. यानी मानसरोवर से निकलकर बलिया के पास गंगा में मिलते-मिलते यह नदी तीन नामों से जानी जाती है.

करनाली नदी के सरयू अवतार से एक खूबसूरत संयोग समझ आया. कैलास से रामेश्वरम तक शिव और राम का संबंध. कैलास मानसरोवर से सरयू निकली जिसके किनारे अयोध्या बसी है. यहीं राम जन्मे और सरयू में खेलते, तैरते बड़े हुए. सरयू के तट पर राम ने जीवन सीखा, समाज को जाना, परंपरा और धर्म को समझा. इसी जल से सींचकर राम का व्यक्तित्व बना. और राम जब वनवास पर निकले, सीता हरण के बाद लंका से पहले समुद्र तट पर रुके, तब भी शिव की आराधना से ही रावण और लंका पर विजय की संकल्प सिद्धि की. राम के जीवन में शिव के समावेश का यह प्रसार कैलास से रामेश्वरम तक स्थापित है.

हम हिलसा में थे. हिलसा में सब टुन्न थे, परम बुद्धत्व को प्राप्त. पूरा समाज चौबीस घंटे परमानंद को प्राप्त. कस्बे के लगभग सभी घर यहां चाय-नाश्ते की दुकान चलाते हैं या ऊन बेचते हैं. हेलीकॉप्टर से आनेवाले तीर्थयात्रियों के लिए लकड़ी की आग में बनाई गई चाय और भोजन से ही इनकी आजीविका है. महिलाएं दुकान संभालती हैं और पुरुष नेपाल तथा चीन के सीमांत सम्मोहन से ऊपर उठ परम टुन्न. हमारे दूसरे साथियों के इंतजार में हमें यहां चाय-नाश्ता करना पड़ता है. सबके आने के बाद हम पैदल पुल पार कर चीन के तकलाकोट पहुंचे.

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हिलसा गांव

चीन में भारतीय मुद्रा पर पाबंदी

तकलाकोट शहर तो यहां से दूर है, पर सीमा चौकी पास ही है, जहां कस्टम और आव्रजन की जांच होती है. हमारे पासपोर्ट और परमिट देखे जाते हैं. हमारी घड़ियों की सुई ढाई घंटे आगे बढ़ा दी गई, क्योंकि वहां का टाइम जोन हमसे ढाई घंटे आगे है. किसी के पास भारतीय मुद्रा और सीमांत क्षेत्र में खींची गई फोटो तो नहीं है, इसकी भी जांच हुई.

चीन में भारतीय मुद्रा नहीं ले जा सकते. चीनी पुलिसवालों के साथ हमारा पहला अनुभव अच्छा नहीं था. वे बेहद सख्त, बेरहम और बदजुबान थे. एक ने मेरे पास कई किताबें देख कर पूछा, दलाई लामा का फोटो तो नहीं है. मैंने कहा, किताब में नहीं, दिल में है. वह मेरी ओर खीझ से देख रहा था. चीन में दलाई लामा के चित्रों पर पाबंदी है. अगर आप वहां दलाई लामा के चित्रों का सार्वजनिक प्रदर्शन करें तो दस साल की सजा का प्रावधान है.

ॐ नम: शिवाय का नारा

अब हम चीन-शासित तिब्बत में थे. हमारे ड्राइवर तिब्बती थे. भाषा की समस्या थी. पर संवाद की नहीं. हमें देखते ही वे चीखे, बम भोले, हर-हर महादेव! सिर्फ इतनी ही हिंदी वे जानते थे. तिब्बत पर पांव रखते ही अहसास हुआ, अरे, ये तो हमारे सारनाथ जैसा है. स्थानीय लोगों का व्यवहार बड़ा आत्मीय था. यहां भाषा फेल थी. न हिंदी, न अंग्रेजी, बातें आंखों और इशारों से हो रही थीं.

भाषा के नाम पर गांव के बच्चे, बाजार वाले सभी नारे लगाते हैं- ॐ नम: शिवाय. वे देवनागरी से परिचित नहीं हैं लेकिन पंचाक्षर जानते हैं. मुझे मन में उनके पुण्य का भान हुआ. भारत और विश्व में करोड़ों लोग ऐसे हैं जो कैलास की जड़ में खड़े होकर एक बार पंचाक्षर मंत्र बोल पाने के अवसर के लिए तरसते हैं. और एक इनका भाग्य है कि कैलास की गोद में बैठकर जीवनभर इस मंत्र को बोल पाते हैं.

भारतीय और नेपालियों की दुकानें

तकलाकोट चीन का सीमांत शहर है. सुरक्षा के नाम पर काफी संवेदनशील. हमें थोड़ी-थोड़ी दूर पर सैन्य चौकियां दिख रही थीं. यहां के सरकारी रेस्ट हाउस में हमारे ठहरने का इंतजाम था. छह से सात हजार की आबादी है इस शहर की. तिब्बती, नेपाली, भारतीय सबके बाजार हैं यहां. भारतीय व्यापारियों का कभी यहां वर्चस्व हुआ करता था. सन् 1962 की लड़ाई के बाद उनका आना-जाना बंद हुआ. लेकिन यहां अभी भी 30-40 दुकानें भारतीय व्यापारियों की हैं. बाकी दुकानें चीनी और नेपाली लोगों की हैं.

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नेपाल और तिब्बत को जोड़ता पुल

तकलाकोट कस्टम ने यहां फिर से हमारा पासपोर्ट और परमिट जांचा, तब हमें आगे जाने की इजाजत दी. यहीं हमें काठमांडू से आए गाइड और खानसामा मिले, अपने ट्रक के साथ. ट्रक में पूरा किचन था. खाने के सभी सामान, बरतन, पीने का पानी था. सबके लिए दवाइयां, ऑक्सीजन सिलेंडर और माइनस तापमान के लिए खासतौर पर बनी जैकेट भी इसमें थीं. रात का खाना इन्हीं लोगों ने बनाया. नेपाली गाइड हमें समझा रहा था कि खाने के लिए किसी चीनी दुकान में न जाएं. न जाने वे क्या खिला दें… कुत्ता, बिल्ली, बंदर? तिब्बती ड्राइवर गुंफा दोरजी हमसे बातचीत में तिब्बत पर चीनी प्रभुत्व के खिलाफ आक्रोश प्रकट कर रहा था.

चीन के खिलाफ सुलगती चिंगारी

गुंफा की जिज्ञासा दलाई लामा और भारत में रह रहे तिब्बतियों का हाल जानने की थी. और ये केवल गुंफा के मन में हो, ऐसा नहीं है. तिब्बती भले ही चीनी प्रभाव में रहने को मजबूर हों लेकिन उनके मन में, आस्था में, गर्व और पहचान में अभी भी तिब्बत है, बुद्ध हैं, दलाई लामा है. चीन बहुत ताकतवर है. लेकिन लोगों के मन में सुलगती ये चिंगारियां ही आगे किसी विद्रोह की होलिका बनेंगी. ऐसा मेरा विश्वास हैं.

पता नहीं तिब्बत की स्वतंत्रता और स्वाधीनता का संघर्ष कितना लंबा चलना है और किसकी जीत होनी है. लेकिन जो कुछ मैंने देखा. महसूस किया उससे इस संभावनाओं को समझा जा सकता है कि दिलों में आग बाकी है. दुष्यंत तो कहते ही हैं- हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए. वहां आग जल रही है. हमने भारत में तिब्बतियों के प्रति अपने प्रेम की जानकारी उन्हें दी. उससे हमारी मित्रता अब आत्मीयता के स्तर पर थी.

वहां भी पुरुषों से ज्यादा जिम्मेदार महिलाएं

यहां भी वही स्थिति. सूर्य अस्त, पहाड़ मस्त. शहर में काफी गंदगी थी. मैंने महसूस किया कि दुनियाभर में काम के मामले में महिलाएं पुरुषों से ज्यादा जिम्मेदार और अनुशासित हैं. पहाड़ों में तो खासतौर पर देखने को मिलता ही है कि महिलाएं खेत, मवेशी, घर, बागीचे, बच्चे सब संभाल रही हैं और पुरुष धुंआ या तरल में डूबते तैरते नजर आ रहे हैं. इन महिलाओं को देखता हूं तो कभी गणेश और कार्तिकेय के पीछे भागती, नंदी और मंडली वालों की देखभाल करती पार्वती नजर आती हैं और कभी भोले भंडारी की पूरी नगरी, काशी के लिए रसोई पकाती, अन्न-जल प्रदान करती अन्नपूर्णा साक्षात दिखाई देती हैं.

हम मैदान से आए थे. हमारे लिए यहां की शराब खतरनाक हो सकती थी. ऐसा हमें पहले ही समझा दिया गया था. मैं वैसे भी इस स्वाद का नहीं हूं. तो हमारे लिए पीने के नाम पर चाय थी. पर सावधान. तिब्बती चाय नमकीन होती है और ऊपर से उसमें याक के दूध का मक्खन डाल देते हैं. पूरी यात्रा में सिर्फ एक बार मैंने यह चाय पी, वह भी तिब्बतियों से भाईचारा दिखाने के लिए नाक बंद कर पीनी पड़ी.

भारत में उत्तराखंड के धारचूला के जरिए जो सरकारी यात्रा आती है, वह भी सबसे पहले तकलाकोट ही पहुंचती है. इस लिहाज से तकलाकोट भारत की सीमा के सबसे करीब मानसरोवर यात्रा का सिंहद्वार है… जय जय

कैलास का पहला दर्शन और देवताओं का स्नान

अरे, यह तो मानसरोवर है! हम मानसरोवर के सामने थे. अद्भुत! अपूर्व! अलौकिक!! हमारे होशो-हवास गुम. इसकी तुलना किसी और से नहीं की जा सकती. एक आश्चर्य लोक. चारों ओर पहाड़, बीच में यह अपार जलराशि. दूर क्षितिज पर आकाश से झील जुड़ती नजर आ रही थी. मैं अवाक् एकटक घंटों मानसरोवर के किनारे खड़ा होकर उसे अपलक निहारता रहा था.

हमें तकलाकोट के रेस्ट हाउस में ही रात गुजारनी थी. कार से मानसरोवर तक की दूरी यहां से सिर्फ डेढ़ घंटे की थी, इसलिए हमने तय किया कि हम रात मानसरोवर के किनारे कैंप में ही बिताएंगे. क्योंकि मैंने यह पढ़ रखा था कि वहां तड़के देवतागण नहाने आते हैं. आकाश में गजब की लीला होती है. शक्ति-पुंज घूमते हैं. माहौल में रहस्य और रोमांच होता है. रात वहीं बिताने के मूल में यही उत्सुकता थी. शाम ढलने के पहले ही हम मानसरोवर के लिए अपनी-अपनी गाड़ियों से निकल पड़े.

पहाड़ों के बीच समतल मैदान में हम चल रहे थे. सुनसान बियाबान. दूर टीले और टीलेनुमा पहाड़ियां थीं. बिना गड्ढे की चौड़ी सड़कें. चिकनी, लेकिन चढ़ती-उतरती. इस कारण काफिले की दूसरी गाड़ियां कभी-कभी ओझल हो जाती थीं. ऐसी ऊंचाई पर अनंत रेगिस्तान-सा मैदान अचंभा और कौतुक पैदा कर रहा था. बारीक मिट्टी. न कहीं कोई दर्रा, न गहराई वाली घाटी, न जरा भी ऊंचाई का डर. सर्पीली नदियां जरूर साथ-साथ चल रही थीं.

एक ओर पहाड़, दूसरी ओर फिरोजी रंग की नदी. यह स्वर्ग का रास्ता था. बाईं तरफ नंदादेवी, धौलागिरि और त्रिशूल पहाड़ियां दिख रही थीं. इन पहाड़ियों के उस पार भारत था. लगभग दो घंटे चलने के बाद यकायक ड्राइवर ने कहा, बाईं ओर देखिए. बाहर देखते ही मैं सन्न रह गया. लगा- सपना सच हो गया. अरे, यह क्या! सामने श्वेत-शुभ्र, उज्ज्वल-धवल कैलास था. ड्राइवर ने गाड़ी रोक दी. सब गाड़ी से उतर पड़े. हम फोटो खींचते रहे. वहां से हटने को कोई तैयार नहीं था. ड्राइवर ने चेतना को झकझोरा, आगे चलिए, और बेहतर दिखेगा.

दूसरी ओर, सड़क के नीचे राक्षस ताल था. 15 हजार फीट की ऊंचाई पर इस ताल में न पूजा हो सकती है, न आचमन. दोनों वर्जित हैं. यहां स्नान करने से सारे पुण्य नष्ट हो जाते हैं. मानसरोवर में स्नान करने से पाप नष्ट होते हैं. दोनों सुविधा आमने-सामने है. आप जो चाहें लें.

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शुभ्र,धवल कैलास

राक्षस ताल में बुरी आत्माएं

तिब्बत में मान्यता है कि राक्षस ताल में बुरी आत्माएं रहती हैं. गाइड ने बताया, यहीं रावण ने तपस्या की थी. तपस्या कर शिव से वरदान मांगा कि वह कैलास को लंका ले जाएगा. देवता परेशान हो गए. अब शिव के दर्शन के लिए लंका जाना पड़ेगा. देवताओं ने एक षड्यंत्र किया. जब रावण कैलास उठाकर लंका की तरफ बढ़ने लगा तो उसे तीव्र लघुशंका लगी. रावण ने पास खड़े गणेश को कैलास थमाया और कहा, इसे तब तक भूमि पर न रखें जब तक मैं निवृत्त न हो जाऊं. रावण को निवृत्त होने में घंटों लग गए. गणेशजी थक रहे थे. आखिर थककर कैलास को जमीन पर रख दिया. जो रखा तो वहीं रह गया.

रावण को कैलास उठाने का वरदान सिर्फ एक ही बार का था. इसलिए कैलास लंका जाने से बच गया. राक्षस ताल उसी रावण का बनाया है इसलिए अपवित्र है. राक्षस ताल के बाबत ऐसी कई रोचक दंतकथा और मान्यता यहां प्रचलित है. राक्षस ताल 225 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है. एक छोटी नदी गंगा-छू दोनों झीलों को जोड़ती है. इस झील का रंग भी काला है. काला रंग विष का प्रतीक है. यह ईश्वर की लीला है. मानसरोवर अमृत है, राक्षस ताल विष. कैलास शिव का घर है और शिव विषधारी. वैज्ञानिक भी राक्षस ताल को विषैला इसलिए मानते हैं कि इसमें मिनरल्स का स्तर काफी ऊंचा है.

मांधाता ने रावण को हराया था

इस वक्त रात के 8 बजे थे. पर कैलास और राक्षस ताल दोनों चमक रहे थे. मानसरोवर में उजाला रात 9 बजे तक रहता है. वक्त अब छंट रहा था. मनुष्य की बनाई सभ्यता हमसे पीछे छूट रही थी. सामने गुरला मांधाता पर्वत था. राजा मांधाता ने ही सबसे पहले मानसरोवर की खोज कर उसके तट पर तपस्या की थी. इसलिए इस पर्वत को मांधाता कहते हैं. मांधाता ऋषि पुत्र थे. इन्द्र ने उन्हें पाला था. उन्होंने एक बार रावण को पराजित किया था.

अरे, यह तो मानसरोवर है! हम मानसरोवर के सामने थे. अद्भुत! अपूर्व! अलौकिक!! हमारे होशो-हवास गुम. इसकी तुलना किसी और से नहीं की जा सकती. एक आश्चर्य लोक. चारों ओर पहाड़, बीच में यह अपार जलराशि. दूर क्षितिज पर आकाश से झील जुड़ती नजर आ रही थी. मैं अवाक् एकटक घंटों मानसरोवर के किनारे खड़ा होकर उसे अपलक निहारता रहा था.

पहने 20 किलो से ज्यादा के कपड़े

तभी नेपाली गाइड शेरपा ने हमें सचेत किया ठंड बहुत है, जैकेट पहनिए. मैं लहरों के उठने और गिरने में अपनी सुध-बुध खो रहा था. लहरों के साथ किनारे आती सुनहरी मछलियां तट की सुंदरता को बढ़ा रही थीं. मानसरोवर में मछलियां मारना मना है. लेकिन लहर जब वापस जाती तो कुछ मछलियों को तट पर छोड़ जाती. लोग उन्हें बटोरकर अपने घर में रखते हैं, इन्हें शुभांकर मानते हैं और भोजन में सूखी मछलियां ठंड से भी बचाती हैं.

हवा तेजी से चुभ रही थी. हड्डियां कड़कड़ा रही थीं. हमें शून्य से कम तापमान के लिए खास तौर पर बनी जैकेट पहनाई गई. कोई 20 किलो से ज्यादा वजन के कपड़े मैंने पहने हुए थे. फिर भी ठंड का असर कम नहीं हो रहा था. मानसरोवर के इस किनारे को जैदी कैंप कहते हैं. सामने ठहरने के लिए एक-एक कमरे की सराय-नुमा कॉटेज बनी थीं.

चिदानंद मुनि जी का आश्रम

यहीं ऋषिकेश वाले चिदानंद मुनि जी का भी आश्रम है. वे अकेले भारतीय हैं, जिन्हें चीन सरकार ने आश्रम बनाने की इजाजत दी है. यहां कुछ दुकानें भी थीं, जहां याक का सूखा मांस छत से टंगा लटक रहा था. उसके टुकड़े को स्थानीय लोग टॉफी की तरह चूसते हैं. याक का मांस गरम होता है. ठंड से निजात मिलती है.

कैंप के हर कमरे में तीन चारपाइयां थीं. जैसे ही हम अपने कमरे में गए, सभी को कुछ-न-कुछ परेशानी शुरू होने लगी. किसी को माइग्रेन, किसी को चक्कर और बेचैनी, किसी को सांस लेने में तकलीफ. सिरदर्द के साथ मेरी भी समझने की क्षमता कम हो रही थी. जैकेट, टोपी, मफलर, दस्ताने पहने-पहने मैं छह-सात कंबल एक साथ ओढ़कर लेट गया.

गाइड शेरपा आया. उसने फौरन एक ऑक्सीजन सिलेंडर दिया. मुंह से ऑक्सीजन लिया. शेरपा ने पैर, कनपटी और हथेली में तिब्बत की जड़ी-बूटी से बना कोई गाढ़ा तेल रगड़ा. इस तेल से जादू की तरह चैतन्यता वापस आई. पास के कमरे में खाना बनना शुरू हो गया था. हमारे साथ चल रहे रसोइए ने हमें तिब्बती सूप पिलाया. इससे भी राहत मिली.

ब्रह्म मुहूर्त में मानसरोवर का रहस्य

कुछ मित्रों की सांसें अब भी उखड़ रही थीं. वे सब रजाई में ऑक्सीजन सिलेंडर लिए पड़े थे. बाहर भयानक ठंड थी. हिम्मत नहीं हुई कि खाना खाने बाहर जाया जाए. भोजन में अपनी भी रूचि नहीं थी. गाइड ने कहा, हम खाना यहीं ले आते हैं. उसका कहना था, न खाने से परेशानी बढ़ सकती है. इसलिए हमने सिर्फ खिचड़ी खाने का फैसला किया वह भी रजाई ओढ़कर. कंबल ओढ़ कर घी पीना आपने सुना होगा. हमने रजाई ओढ़कर खिचड़ी पी.

गाइड ने निर्देश दिया कि रात में अकेले बाहर न निकलें. टॉयलेट के लिए भी समूह में जाएं. छड़ी हाथ में जरूर रखें, क्योंकि यहां के कुत्ते खतरनाक हैं. लेकिन हमें तो ब्रह्म मुहूर्त में मानसरोवर का रहस्य जानना था. इसे लेकर एक कौतुहल मन में था. इस बेचैनी से नींद भी नहीं आ रही थी. मैं तड़के का इंतजार करता रहा. रात कोई 3.30 बजे उठा. कैमरा लिया और कमरे के बाहर निकला.

सामने ही पवित्र मानसरोवर था. थके-मांदे सभी सो रहे थे. निपट अकेला ही मैं मानसरोवर की ओर बढ़ा. कोई पचास कदम चलने के बाद सरोवर के किनारे था. नीला पारदर्शी जल, हमारी सभ्यता का पवित्रतम जल. उसे सिर पर रखा. आचमन किया. सामने चमक रहे कैलास को प्रणाम किया और मंत्रमुग्ध-सा खड़ा देखता रहा. इस सन्नाटे का भी एक संगीत था, जिसका सुंदर वर्णन रामायण, महाभारत और स्कंदपुराण में मिलता है. बाणभट्ट की कादंबरी, कालिदास के रघुवंश और कुमारसंभव के अलावा संस्कृत व पालि ग्रंथों में भी कैलास के सौंदर्य का अपूर्व वर्णन है.

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सुनहरे रंग की मानसरोवर झील.

शिव के नटराज रूप की परिकल्पना भले दक्षिण भारत से आई हो, पर शिव का महानृत्य पहली बार कैलास पर्वत पर ही हुआ. मान्यता है कि शंकर का नृत्य ही सृष्टि का विधान है. जगत की रक्षा के लिए शिव हर संध्या को नृत्य किया करते थे. उस समय सभी देव, यक्ष, किन्नर आदि उनकी सेवा में उपस्थित रहते थे. एक शंकर की पूजा से सबकी पूजा हो जाती थी.

कैलास साक्षात मेरे सामने

नटराज सहस्रनाम और प्रदोषस्तोत्रम् में इसका वर्णन है. कैलास पर्वत पर ही शैलपुत्री को रत्नजड़ित सिंहासन पर बिठाकर शिव जब नृत्य की अभिलाषा करते, तब सभी देवगण उनकी सेवा में उपस्थित होते. वाग्देवी हाथ में वीणा और इंद्र वेणु के साथ आते. ब्रह्मा करताल से ताल जगाते. भगवती रमा का गायन होता. विष्णु स्निग्ध मृदंग-वादन में अपनी पटुता दिखाते और शिव डमरू बजाते हुए जो नृत्य शुरू करते तो आसमान से पुष्पवर्षा शुरू हो जाती. आज वही कैलास साक्षात मेरे सामने था और मैं मानसरोवर में आचमन करके अपने जीवन को धन्य पा रहा था.

पौ अभी फटी नहीं थी. नीलकंठ के गले जैसा वर्ण आकाश ने धारण कर रखा था. गहरा नीला. ऐसा, जैसे विष का काला और उसके प्रभाव का नीला एकसाथ जीवित हों. आकाश में तारे इतने चमकीले थे कि बिना चंद्रमा के तारों की रोशनी से ही मानसरोवर चांदी-सा दिख रहा था. प्रतिपल हर कोण से सरोवर का रंग बदल रहा था. उत्तेजना में कभी मैं कैमरे की आंख से मानसरोवर देखता, कभी नंगी आंखों से.

जैसे किसी कंगले को मिला खजाना

दादी से सुन रखा था कि देर रात यहां देवता, ऋषि और अप्सराएं आती हैं. मैं लगातार दबे पांव उनका इंतजार कर रहा था. थोड़ी देर में ही झील सुनहरे रंग की हो गई. मैं चमत्कृत था. आपे में नहीं था. तभी कोई ज्योति-पुंज दिखा. दूर ढेर सारे लोगों की आहट सुनाई पड़ी. पर दिख कोई नहीं रहा था. मैं सन्न, स्तध खड़ा रहा.

तापमान शून्य से नीचे. चुभती हवा, जकड़ती ठंड. लेकिन ठंड की जरा भी परवाह नहीं. लग रहा था, न जाने क्या पा लिया! किनारे खड़ा सोचता रहा, क्या करूं? कैसे समेटूं इस आनंद को? कुछ समझ नहीं आ रहा था. जैसे किसी कंगले को खजाना मिल गया हो. लगा, कोई उत्सव हो रहा है यहां. मैंने क्या देखा, क्या अनुभव किया, इसे व्यक्त करना मुश्किल है, वर्णनातीत है. बिलकुल नि:शब्द. शब्द जहां फेल होते हैं. वहां चित्रों से आप काम चला सकते हैं.

अब तक सूरज निकल आया था. धूप की चमक सरोवर के रंग को और गाढ़ा बना रही थी. मैं पीछे मुड़ा तो होश उड़ गए. देखा, कुत्तों का एक झुंड मेरे पीछे खड़ा था. मैं डर गया. अब क्या होगा? जाते वक्त मानसरोवर का ढेर सारा साहित्य पढ़कर गया था. उसके मुताबिक, यहां के कुत्ते मांसाहारी होते हैं, चुपचाप चोरी से हमला करते हैं. पर ये सारे कुत्ते धीर-गंभीर, दार्शनिक मुद्रा में एकदम शांत खड़े थे.

ज्ञान मनुष्य को डरपोक बनाता

पहली बार लगा, ज्ञान मनुष्य को डरपोक बनाता है और अज्ञान के आगे डर लाचार होता है. मैं पीछे मुड़ पांव धीरे-धीरे खिसकाने लगा. मुझे मालूम था, तिब्बत में मृत मनुष्य के अंतिम संस्कार में उसे जलाते नहीं. मृत्यु के बाद उसकी देह को लामा लोग टुकड़े-टुकड़े काट पहाड़ों पर फेंक देते हैं, गिद्ध और दूसरे पक्षियों के लिए. इतनी ऊंचाई पर पक्षी कहां मिलें, सो अक्सर यह मांस कुत्ते ही खाते हैं. इसलिए उन्हें आदमी का मांस खाने की आदत पड़ जाती है. इस तथ्य को याद कर मेरी हालत और भी खराब हो रही थी.

इस उधेड़बुन में मैं मंथर गति से सरकते-सरकते लगभग तीस कदम तक पीछे हट चुका था. अब गंतव्य तक पहुंचने के लिए लगभग बीस कदम और बचे थे. यकायक मैं पीछे मुड़ा और उसैन बोल्ट की गति से जान हथेली पर रखकर दौड़ा. देखा, सामने गाइड खड़ा था. वह मजे लेने के अंदाज में बोला, मैंने कहा था न कि बाहर अकेले न जाएं. कमरे में पहुंचते ही मुझे लगा, जान बची तो लाखों पाए. मेरी सांस तेजी से फूल रही थी. जान बचने के अहसास से बड़ी राहत मिली.

इस हादसे के डर से मैं अभी उबरा ही था कि दूसरी जबरदस्त समस्या का सामना करना पड़ा. इस कैंप में निपटने-नहाने का कोई इंतजाम नहीं था. सब खुला खेल था. इस इलाके में सुबह के वक्त निवृत्त होना मानो युद्ध जीतने जैसा था. यहां भारत जैसे कच्चे संडास लाइन से बनाए गए थे, जिस पर छत नहीं थी. सभी एक लाइन में थे. एक-दूसरे से कोई आड़ भी नहीं थी.

तूफानी हवा और कुत्तों का डर

हम भारतीयों को लाइन लगाने की आदत तो होती है, पर इस काम के लिए मुझे लाइन में बैठना ठीक नहीं लगा. बनारसी भोजन से ज्यादा निपटने के इंतजाम बेहतर चाहता है. मैंने सोचा, इससे तो बेहतर है खुले निछद्दम में निपटा जाए. पर यह भी उतना आसान नहीं था. तेज बर्फीली हवाओं के बीच जैकेट, टोपी, मफलर, दस्ताने, जूते पहन दो पत्थरों पर संतुलन बनाकर बैठना उतना ही मुश्किल था जितना आज के माहौल में चीन और अमेरिका के बीच संतुलन स्थापित करना.

बर्फ से पगी तूफानी हवाएं शरीर में पिन की तरह चुभ रही थीं. पहने हुए कपड़ों का अपार बोझ. तूफानी हवा. कुत्तों का डर. पर क्या करूं? लक्ष्य भी महान् था. एक साथ इन सारे दबावों में निवृत होना किसी सर्कस से कम नहीं था. मैं कैसे निवृत्त हुआ, बता नहीं सकता. हां, उसके बाद विश्व-विजेता की मुद्रा में जरूर कैंप की तरफ लौटा. इस विजय से लगा, मैं हाथ में तिरंगा ले लॉर्ड्स क्रिकेट ग्राउंड का चक्कर लगा रहा हूं और लोग मेरी जीत पर तालियां बजा रहे हैं. जय जय…

 अपना तर्पण और पुरखों की सात पीढ़ियां

कैलास-दर्शन के बाद मानसरोवर-स्नान कर लगा, जीवन सफल हो गया. अब कुछ बचा नहीं है. ठंड के कारण अपने आप मुंह से फचाफच महामृत्युंजय मंत्र निकल रहा था. जैदी कैम्प तक पहुंचते-पहुंचते मानसरोवर की हमारी परिक्रमा पूरी हो गई थी. जो देखा वह एक सपना था. जो पूरा हुआ. इस विस्मय का बखान शब्दों से परे है.

आज सुबह बन गई. मानसरोवर पर देसी घी की पूड़ी और सब्जी. जबरदस्त बनारसी नाश्ता था. यह कमाल था गाइड और सहायक थापा जी का. वो अपने साथ छोटी ट्रक में एक टिन बुटवल देसी घी लाए थे. नाश्ते के बाद सभी मित्र सरोवर की ओर चले. किनारे पूजा-अर्चना की तैयारी थी. झील की परिधि 87 किलोमीटर है. कुल 350 किलोमीटर का क्षेत्रफल है इसका. इस झील से चार नदियां भी निकलती हैं, जिनका जिक्र हम बाद में करेंगे. हमें सरोवर की परिक्रमा करनी है. पर कैसे? पैदल तो संभव नहीं था. न ही हम लोगों की सेहत इजाजत दे रही थी. तय हुआ कि लैंडक्रूजर गाड़ी से ही परिक्रमा होगी. 90 किलोमीटर की.

समुद्र-तट से 15,000 फीट ऊंचाई पर स्थित इस झील की गहराई 300 फीट है. तिब्बती इसे त्सो मावांग कहते हैं. मानव सभ्यता के इतिहास की सबसे पुरानी झील. ऋषि दत्तात्रेय को जब कैलास पर भगवान शंकर के दर्शन हुए तब उन्होंने शिव से पूछा, संसार का सबसे पवित्र स्थान कौन सा है? शिव ने कहा, सबसे पवित्र हिमालय है, जहां कैलास और मानसरोवर हैं. और जो मानसरोवर में स्नान करता है, उसके सभी पाप धुल जाते हैं. कैलास का ध्यान मात्र काशी की यात्रा से ज्यादा पुण्यदायक है. उसका फल अनंत है. वह धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष- चारों पुरुषार्थों का प्रदाता है.

मानसरोवर के आकाश का रंग ऐसा नीला था जैसा नीला रंग आज तक हमने नहीं देखा था. रुई के फाहे से बने आकाश से लटकते बादल अलग-अलग आकृतियां बना रहे थे. मानसरोवर की लहरों से टकराते दूर क्षितिज पर ऐसा लग रहा था मानो अप्सराएं वहां नृत्य कर रही हों. शिवपुराण में लिखा है कि मानसरोवर में एक बार के स्नान से सात पीढ़ियां तर जाती हैं. मुझे लगा, सात पीढ़ी को एक साथ तारने का ऐसा मौका फिर कहां मिलेगा. साथ गए मित्रों में थोड़ी हिचकिचाहट जरूर थी, कुछ गड़बड़ न हो. इस भयानक ठंड में बर्फ के पानी से कहीं तबीयत खराब न हो जाए. बीमार हुए तो इस दुर्गम जगह में क्या होगा? मैंने कहा, अगर कुछ हुआ तो हमें यहीं छोड़ देना. कोई संस्कार की भी जरूरत नहीं. मैं यहीं रहूंगा. आखिर पांडव भी तो यहीं कहीं हैं. मुक्ति की इससे बेहतर जगह क्या होगी? यही जगह तो है, जहां देवी-देवता, ऋषि-मुनि, अप्सराएं सब एक साथ रहते हैं. सिर्फ हम ही नहीं, ऐसा तिब्बती भी मानते हैं.

तो क्यों न फौरन डुबकी लगाई जाए. मैंने कपड़े उतार गमछा पहना, लाल बनारसी गमछा. अपना बोध गया बनारस है और गमछा वहां का राष्ट्रीय पोशाक. गमछा सर्वहारा का वस्त्र है. और शिव सर्वहारा के देवता. गमछे में कोई दिखावा नहीं है. न ओढ़ी हुई सम्पन्नता. बेचारा गमछा आधुनिकता के सारे झंझावत झेलता बदलते फैशन में अपनी जगह अडिग है. गमछा ढांकता तो है इज्जत. पर उघाड़ता है अक्खड़पन. गमछा मल्टीपरपस है. लपेटिए और नहाइए. किसी की नजर से बचना है तो गले में लपेट लीजिए. रौब गालिब करना है तो कमर में बांध लें. तो मैनें भी गमछा लपेट शरीर को तैयार किया. पुरखों को याद कर ठंड से लड़ने का मनोबल बढ़ाया. सरोवर को प्रणाम किया. जल का आचमन किया. मीठा अमृत जैसा स्वाद. एक पांव मानसरोवर में रखा तो करंट दिमाग तक लगा. झट से दूसरा पांव भी रखा. फिर नाक पकड़कर डुबकी लगाई. लगा कि सिर पथरा गया, हाथ-पांव अकड़ गए. दूसरी व तीसरी डुबकी से थोड़ी राहत लगी. पर हड्डियां कांपने लगीं. लगा कि पुरखों को तारने आया था, कहीं पुरखों में शामिल तो नहीं हो जाऊंगा. प्रज्ञा लुप्त होने लगी.

तभी हंसों का एक जोड़ा दिखा. राजहंस यानी बार हेडेड गूज, जिन्हें हिमालयन ग्रीन फ्रिंच भी कहते हैं. सफेद लंबी गरदन, सुनहरे पंख, भव्य उड़ान. बड़े भाग्य से हंसों के दर्शन होते हैं. पीछे मुड़ मित्रों को जब तक बताता तब तक वे ओझल हो चुके थे. कबीर याद आए- उड़ जाएगा हंस अकेला, जग दरसन का मेला. मित्रगण मानने को तैयार नहीं थे कि मैंने राजहंस देखा. खैर, बाहर निकला. कपड़े पहने. सूर्यदेव दूर तक कहीं दिख नहीं रहे थे. और मेरी चेतना कम हो रही थी.

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झील के किनारे याक

भांग और सुगंधि से शिव का अभिषेक

कैलास-दर्शन के बाद मानसरोवर-स्नान कर लगा, जीवन सफल हो गया. अब कुछ बचा नहीं है. ठंड के कारण अपने आप मुंह से फचाफच महामृत्युंजय मंत्र निकल रहा था. मेरी दादी याद आ गईं, जिन्हें हम दादा कहते थे. दादा ने ही बचपन में सबसे पहले मानसरोवर का महत्व बताया था. मैंने सूर्य को अर्घ्य दिया. दादी के नाम पर एक अंजलि जल दिया. फिर लगा, दादी का तो तर्पण कर दिया. मेरे लिए यहां इतने दुर्गम स्थान पर कौन आएगा? गाइड बोला, अपना तर्पण खुद कीजिए. लोग यहां ऐसा ही करते हैं. मैंने अपना भी तर्पण किया. अंजुरी में लिए जल से कहा- जल, जीवन दो, मुक्ति दो. पुरखों को तारो. मन के कलुष को धो दो. काट अंध उर के बंधन स्तर, बहा जननि ज्योतिर्मय निर्झर.

मानसरोवर के किनारे एक प्रार्थना-ध्वज भी बांधा. एक कैन में जल भरा, दिल्ली लाने के लिए. फिर शुरू हुई पूजा. सामने कैलास, बगल में मानसरोवर. बिल्वपत्र साथ ले गया था. भांग और सुगंधि से शिव का अभिषेक किया- त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्. उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्. हमारे लिए यह बहुत तृप्तिदायक अनुष्ठान था.

गाड़ी में बैठ मैंने उसका हीटर चलाया तब जाकर चैतन्यता वापस लौटनी शुरू हुई. अब हम गाड़ी से मानसरोवर की परिक्रमा में थे. गोल छोटे-छोटे पत्थरों पर से हमारी लैंडक्रूजर धीरे-धीरे फिसलती सरकती चल रही थी. छोटे-छोटे जल-स्रोतों को पार करते हुए. मानसरोवर का प्रवाह कभी राक्षस ताल की ओर बहता है तो कभी उलटी तरफ. जिस साल इसका प्रवाह राक्षस ताल की तरफ होता है, वह साल तिब्बतियों के लिए शुभ माना जाता है.

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मानसरोवर झील

मानसरोवर के चारों ओर निकलने वाली नदियां

मानसरोवर के चारों ओर से दुनिया की चार बड़ी नदियां निकलती हैं. मानसरोवर के पश्चिम की ओर से निकलने वाली सतलुज नदी है. तिब्बती इसे लांजयेन खंबाब कहते हैं, जिसका मतलब हाथी का मुंह होता है. दक्षिण की ओर बहनेवाली नदी करनाली है, जिसे तिब्बती में मेपचा खंबाब कहते हैं. यही नदी भारत में पहले सरयू और बाद में घाघरा कही जाती है. ब्रह्मपुत्र को तिब्बती तमचोक खंबाब कहते हैं, यानी घोड़े का मुंह. यह पूर्वी छोर से निकलती है. सिंधु शेर के मुंह से निकलनेवाली नदी कही जाती है. उत्तर की तरफ से निकलने वाली सिंधु नदी को इंडस भी कहते हैं. जैदी कैम्प तक पहुंचते-पहुंचते मानसरोवर की हमारी परिक्रमा पूरी हो गई थी. जो देखा वह एक सपना था. जो पूरा हुआ. इस विस्मय का बखान शब्दों से परे है. जो देखा, वह ज्ञान से परे था. जो भोगा, वह समझ से परे था. कल और कठिन है. हमें कैलास जाना है… 

डोल्मा से नीचे ल्हादू घाटी की ओर हमारा कारवां चलता है. अब सीधी ढलान है. यहां 18,000 फीट की ऊंचाई पर पन्ने के रंग जैसी हरी आभा वाली एक ताजा झील मिलती है. अरे, यह तो गौरी कुंड है! इस झील की परिधि 7.5 कि.मी. और गहराई 80 फीट है. इस हवा, पत्थर, पानी, बर्फ, मिट्टी में कुछ तो है; क्योंकि ऐसी गहरी अनुभूति मुझे पहले कभी नहीं हुई.

कैलास की बौद्ध, सनातन परंपरा और माओ की मार

तारचेन से सामने की ओर से कैलास साफ दिखाई पड़ता है. 22,000 फीट की ऊंचाई वाला कैलास कुल 45 किलोमीटर इलाके में फैला है. यह पर्वत पांच बौद्ध गोंपाओं से घिरा है. किसी जमाने में बौद्ध गोंपा व मठ संस्कृत तथा पालि ग्रंथों से भरे पड़े थे. कैलास पर्वत-श्रृंखला भूटान तक फैली है. ल्हा चू और झोंग चू के बीच ही कैलास पर्वत है.

जैदी कैम्प से 40 किलोमीटर दूर तारचेन कैलास परिक्रमा का आधार शिविर है. यहीं से कैलास की परिक्रमा शुरू होती है. मित्रों की हालत देख एक बार तो लगा कि अब हम तारचेन न जाएं, यहीं से वापस लौट चलें. एक-एक कर सभी साथी लस्त-पस्त हो रहे थे, खासकर महिलाएं. रास्ते में एक गांव पड़ा. यह गड़रियों का गांव है. एक बड़े समतल मैदान के बीच कच्चे रास्ते से हमारी गाड़ी चली जा रही थी. पठार का सौंदर्य अद्भुत था.

थोड़ी देर में तारचेन दिखा. वह छोटे-छोटे ध्वजों, पताकाओं और झंडियों से सजा था. इस छोटे बाजार में एक बैरकनुमा अतिथिगृह भी था. यात्रा यहां तक गाड़ियों से आती है. इसके आगे गाड़ियां नहीं जातीं, यहीं रुक जाती हैं. इसलिए यहां गाड़ियों के कुछ मेकैनिक और छोटे गैराज भी हैं. एकाध तिब्बती रेस्त्रां भी हैं. कुछ छोटी दुकानें स्मारिकाओं और उपहारों की भी थीं. इस दुर्गम जगह से कोई पत्थर का टुकड़ा भी ले जाना भी एक स्मृति-चिह्न ही है. फिर यह तो उपहारों की दुकान थी, जहां हमारे साथी रुककर स्टीकर, रूमाल, स्कार्फ और झंडी-पताका खरीदने लगे. तारचेन में बुद्ध और शिव के चित्र एक साथ एक ही दुकान पर मिल रहे थे. चीन में ऐसा धार्मिक सौहार्द. सुखद था.

इस बस्ती में लगभग तीन सौ घर हैं. यहां रहनेवाले सभी भेड़-बकरी और याक चरानेवाले गड़रिए हैं या फिर तीर्थयात्रियों की सेवा-शुश्रूषा से जो मिल जाए, उसी से उनका जीवन चलता है. स्कूल के नाम पर रेडक्रॉस का एक स्कूल है. पर अस्पताल या कोई डिस्पेंसरी नहीं है. बीमार लोगों को 120 किलोमीटर दूर तकलाकोट तक जाना पड़ता है. रेडक्रॉस यहां अस्पताल खोलना चाहती है, पर चीनी सरकार न जाने क्यों इसकी इजाजत नहीं देती. शायद सीमांत इलाका है, इसलिए सरकार कुछ ज्यादा ही चौकसी बरतती है. चीनी सेना के जवान यहां आपको हर मोड़ पर मिलेंगे. कैलास के रास्ते इंसानी सभ्यता का यह अंतिम गांव है. इसके आगे तो सिर्फ निर्जन और अंतहीन सफेदी ही दिखती है.

हर गोंपा में चीनी तांडव की गूंज

तारचेन से सामने की ओर से कैलास साफ दिखाई पड़ता है. 22,000 फीट की ऊंचाई वाला कैलास कुल 45 किलोमीटर इलाके में फैला है. यह पर्वत पांच बौद्ध गोंपाओं से घिरा है. गोंपा झोंपड़ीनुमा बौद्ध विहार होते हैं, जहां अब कुछ ही नाममात्र के भिक्षु पूजा-पाठ करते हैं. लामा व्यवस्था तक इन गोंपाओं का बड़ा जलवा था. इन्हें धार्मिक के साथ-साथ प्रशासनिक अधिकार भी प्राप्त थे. सन 1949 में माओ के नेतृत्व में बौद्ध मठ और विहार तोड़े, लूटे व जलाए गए. चीनी क्रांति ने सारे गोंपाओं को खंडहरों में तब्दील कर दिया. उन्हीं खंडहरों को फिर से रंग-रोगन कर झोंपड़ीनुमा आकार में फिर से खड़ा कर दिया गया है. अब न तो उनका वो वैभव है, न विस्तार. ज्यादातर में तो दरवाजे, खिड़की भी नहीं हैं. बौद्धों का यह देवस्थान है.

किसी जमाने में बौद्ध गोंपा व मठ संस्कृत तथा पालि ग्रंथों से भरे पड़े थे. सन 1920 से 1930 के बीच महापंडित राहुल सांकृत्यायन याक पर लाद ढेर सारे ग्रंथ भारत लाए थे. दलाई लामा भी अपने साथ कुछ ग्रंथ लाए. लेकिन काफी महत्वपूर्ण हस्तलिखित ग्रंथों को चीनियों ने जला दिया. हर गोंपा में चीनी तांडव का एक आतंक गूंजता है. सहमे बौद्ध भिक्षु धीमी व दबी आवाज में मंत्र-पाठ करते हैं. वे लाचार और डरे हुए दिखते हैं. उन्हें देख तिब्बत में तिब्बतियों की दशा पर क्रोध और क्षोभ दोनों होता है.

Kailash Mansarovar Yatra (8)

कैलास पर्वत-श्रृंखला भूटान तक फैली है. ल्हा चू और झोंग चू के बीच ही कैलास पर्वत है. इसकी सबसे निचली चोटी तारचेन और सबसे ऊंची चोटी डेशफू गोंपा है. कैलास की परिक्रमा 16,000 फीट की ऊंचाई से शुरू हो 19,000 फीट तक जाती है. हम आगे बढ़े. सामने का नजारा अद्भुत था. दो घाटियों के बीच में बर्फ की सफेद चादर से ढकी पर्वत-शृंखला, उसके पीछे नीला साफ आकाश. इस नीले आकाश पर कहीं-कहीं सफेद बादल के टुकड़े. उस पर्वत से पिघलते बर्फ के झरने. दूर से दिखा जैसे पर्वत से दुग्ध-धारा निकल रही हो. दूध की ऐसी धाराएं मैंने महाशिवरात्रि में काशी के विश्वनाथ मंदिर के शिवलिंग पर ही देखी थीं. ये उनका विस्तार रूप था.

थोड़ा और आगे बढ़े, एक और घाटी, चारों तरफ बर्फ से ढकी हुई. हमें बताया गया कि यहीं महादेव ने कामदेव को भस्म किया था. तब यहां इतनी बर्फ नहीं थी, हरियाली थी और फूल खिलते थे. बारहों महीने वसंत रहता था. तारक नाम के राक्षस से देवता आक्रांत थे. उसे ब्रह्मा का वरदान था. देवता ब्रह्मा की शरण में गए. ब्रह्माजी मुसकराए, बोले- तारक का संहार शिव-पुत्र ही करेगा. पर शिव तो सती के वियोग में तपस्यारत हैं, फिर पुत्र कैसे होगा? उनकी तपस्या तोड़ने के लिए इंद्र ने कामदेव को भेजा. कामदेव पहुंचे तो उस बर्फीले पर्वत पर वसंत छा गया.

स्वर्ग जाने का इकलौता रास्ता

पार्वती अपनी सखियों के संग शिव के दर्शन के लिए पहुंचीं. तपस्या में लीन शिव के चरणों में पुष्प अर्पित किए. घनी झाड़ी में छुपे कामदेव ने फूलों से बींधा बाण चला दिया. शिव ने पार्वती को देखा, उनकी तरफ हाथ बढ़ाया. सोचने लगे, यह सुंदरी यहां कैसे! ध्यान भटका. लेकिन फिर तप में लीन हो गए. पर कहीं व्यवधान था. ध्यान केंद्रित नहीं हुआ. शिव चकित थे. काम का बाण अपना असर दिखा रहा था. कामदेव मुस्कुराया. तभी शिव का तीसरा नेत्र खुल गया. कामदेव वहीं भस्म हो गया. पार्वती व सखियां घबराकर भाग गईं.

कामदेव की पत्नी रति रोती-बिलखती शिव की शरण में आई- मेरा क्या होगा प्रभु? भोलेनाथ पिघले. बोले- अच्छा, जाओ, कामदेव को जीवित करता हूं; पर अब वह अनंग रहेगा. कभी सामने नहीं आ पाएगा. हमेशा छुपकर वार करेगा. पहले वह बारहों महीने फूल खिला सकता था, पर अब नहीं. अब केवल दो महीनों के लिए फूल खिलेंगे और तब वसंत आएगा. तभी से वसंत सिर्फ दो महीनों के लिए ही आता है.

अब हम यमद्वार के पास थे. इसे स्वर्ग जाने का इकलौता रास्ता बताते हैं. यहां पहाड़ों की आकृति एक बड़े द्वार की तरह है. नीचे मनुष्यों ने भी एक द्वार बना रखा है. लोग पत्थरों पर पत्थर रख उसे पिरामिड की शक्ल देते हैं. यहां ढेर सारे पिरामिड बने हैं. एक मंदिर भी है, तीर्थयात्री यहां पत्थर रखकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं. यमद्वार पर बुद्धकालीन एक शिलालेख भी है. युधिष्ठिर यहां से आगे अकेले अपने कुत्ते के साथ स्वर्ग की ओर गए थे. नचिकेता का यमद्वार भी यहीं है. जहां उसने यम से संवाद किया था.

Kailash Mansarovar Yatra (7)

84 महासिद्धों की आकाश समाधियां

दाईं ओर ऊपर पहाड़ियों पर तिब्बत के 84 महासिद्धों की आकाश समाधियां हैं. आकाश समाधि वह स्थान है, जहां मनुष्य की देह को अंतिम संस्कार के लिए चीलों व गिद्धों को खिलाने के लिए रखा जाता है. हम वहां नहीं गए. जाना दिवंगत लोगों के प्रति असम्मान होता. इसे शिब-त-साल यानी मृत्यु का पठार भी कहते हैं. यहां सुरक्षित पहुंचना पुनर्जन्म माना जाता है. मुरारी बापू को यह जगह बहुत पसंद है. वे कई बार यहां अपना कथा शिविर लगा चुके हैं. यमद्वार से आगे का रास्ता दुष्कर है. इसलिए सामान ले जाने के लिए याक मिलते हैं.

ब्रह्मपुत्र नदी का उद्गम स्थल इसी के पास है. गिरते-पड़ते हम अष्टपद की ओर जा रहे थे. अष्टपद जैन धर्म का पवित्रतम स्थान है. पहले तीर्थंकर ऋषभदेव ने इस अष्टपद की परिक्रमा की थी. बाद में यहीं उन्होंने शरीर छोड़ा. इसलिए जैन लोग भी कैलास से उतनी ही श्रद्धा रखते हैं जितनी हम.

अब हम कैलास के दक्षिणी मुख पर हैं. सामने शिव का नंदी बहुत करीब दिखता है. दरअसल यह नंदी के आकार का एक पहाड़ है. उसे ही नंदी पर्वत कहते हैं. सांस अब भारी हो चली थी. चारों तरफ ऊंचे पहाड़, बीच में दलदल, ऊबड़-खाबड़ रास्ता. पर हम चलते जा रहे थे. अनंत की ओर. चरैवेती चरैवेती. कविवर बच्चन जी याद आ रहे थे. स्फटिक- निर्मल और दर्पन स्वच्छ, हे हिमखण्ड. शीतल और समुज्जवल, तुम चमकते इस तरह हो,चांदनी जैसे जमीं है, या गला चांदी तुम्हारे रूप में ढाली गयी है

कैलास पर बर्फ से बनी सीढ़ियां साफ दिख रही थीं. इन्हीं सीढ़ियों से कभी देवाधिदेव उतरते होंगे. हम छड़ी लेकर चल रहे थे, पर पांव उठ नहीं रहे थे. हवा का दबाव इतना कि लगा, छाती फट जाएगी. रास्ते में नेवले की प्रजाति और खरगोश की चाल-ढाल वाला एक जानवर दिखा. किसी ने कहा, नेवला है; कोई कहता, गिलहरी है. पर गाइड बोला, यह एक तरह का चूहा है, जिसका तिब्बती नाम चिपि है. इस दुर्गम ऊंचाई पर सैकड़ों की संख्या में चिपि थे. चलो, इतनी ऊंचाई पर जीव के नाम पर कुछ तो मिला. मन को संतोष हुआ.

सबका गला सूख रहा था. हमें थोड़ा-थोड़ा मतिभ्रम भी हो रहा था, ऑक्सीजन की कमी सबसे पहले मति पर हमला करती है. गाइड शेरपा ने सलाह दी, थोड़ी-थोड़ी देर पर पानी पीते रहेंगे तो सिरदर्द नहीं होगा. सामान ढोनेवाले याक साथ-साथ चल रहे थे. कुछ ऐसे बुजुर्ग लोग भी थे, जो याक की पीठ पर बैठकर परिक्रमा कर रहे थे. बीमार लोगों को पीठ पर लादे कुछ नेपाली शेरपा भी परिक्रमा मार्ग में मिले. याक की पीठ पर बैठकर परिक्रमा करनेवाले भी परेशान थे, क्योंकि याक स्वच्छंद होकर चलता था; कभी दौड़ने लगता. छोटा पहाड़ी रास्ता. नीचे गहरी घाटी. याक कभी एकदम पहाड़ी के किनारे-किनारे खतरनाक ढंग से चलता. गहरी खाई देख याक पर बैठे आदमी के प्राण सूख जाते. फिर कभी वह बीच में ही रुक पानी पीने लगता. मनमौजी और मस्त व्यवहार रहता है उसका.

तिब्बती जीवन बिना याक के नहीं चलता. दुनिया की इस छत पर उसका खासा महत्व है. अगर कैलास की एक परिक्रमा से हमारा जीवन तरता है तो इस इलाके के कुछ याक तो सैकड़ों बार परिक्रमा कर चुके हैं. उनके पास तो मनुष्यों से ज्यादा पुण्य जमा होगा. मेरी इस सोच ने याकों के प्रति अपनी श्रद्धा और बढ़ा दी. वे अद्भुत जानवर हैं- धीर-गंभीर और मेहनतकश. हाड़-तोड़ मेहनत करते हैं, लेकिन कोई नाराजगी या गुस्सा उनके व्यवहार में नहीं मिलता. तिब्बती लोग उन्हें बहुत प्यार करते हैं. वे प्यार से हर याक का कोई-न-कोई नाम रखते हैं. पर किस्मत के मामले में याक गधे, खच्चर जैसे ही लगते हैं. चीनियों के अत्याचार से वे भी अछूते नहीं हैं. चीनी उन्हें मारकर खा जाते हैं.

याक पर ही अपनी भी रसोई और खाने का सामान परिक्रमा में साथ-साथ चल रहा था. रात का पड़ाव जहां होगा वहीं भोजन बनेगा. ब्रह्मपुत्र पार करने के लिए हमने याक का इस्तेमाल किया. अब काफिला डेरापुक की ओर चल पड़ा. यह डगर कठिन है, बेहद थका देनेवाली; कहीं चढ़ाई तो कहीं ढलान. कुली और गाइड सब याक के मांस का सूखा टुकड़ा चबाते हुए चल रहे हैं. हम ठहरे काशी के पंडित. क्या उपाय करें कि ठंड का प्रकोप कम हो. मांस का कोई विकल्प नहीं है यहां. इसलिए सिवाय ठंड से कड़कड़ाने के कोई और उपाय बचा नहीं था.

पहली बार लगा कैलास जा रहे हैं या परलोक

दिल्ली से पर्वतारोहण का जो सामान ले गया था उसमें एक रसायनिक पाउच था. जिसे जैकेट की जेब और जूते के भीतर रखने से गर्मी रहती है. मेरा काम उसी से चल रहा था. यानी जेब गरम थी. इस मुहावरे का यथार्थ समझ रहा था. आगे परिक्रमा मार्ग में ल्हासू नदी मिली, जिसका अर्थ है देवनदी. नदी के किनारे से कैलास के दक्षिणी हिस्से का दर्शन होता है. ल्हासू ही आगे जाकर सिंधु नदी कहलाती है. जो वहां से निकल भारत होते हुए पाकिस्तान जाती है. इसी नदी को पहलगाम हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान जाने से रोकने का फैसला लिया. परिक्रमा मार्ग पर इस नदी को बांस से बने पुल के जरिए पार करना पड़ता है.

ऐसी कठिन यात्रा में पहली बार लगा कि हम कैलास जा रहे हैं या परलोक. मतिभ्रम, उल्टियां, सिरदर्द, ऑक्सीजन की कमी का प्रकोप बढ़ने लगा था. लंबे समय तक बर्फ की चमक से अंधत्व भी आता है. अब आंखों पर भी कुछ-कुछ असर पड़ रहा था. हालांकि हमने काले चश्मे पहने थे, फिर भी दूर-दूर तक बर्फ-ही-बर्फ देख कवि आलोक याद आए- पहाड़ों के जिस्मों पे बर्फों की चादर. कवि के पहाड़ का तो ओर-छोर है. पर यहां तो इस सफेद चादर का कोई सिरा नजर नहीं आ रहा था. कल कैलास संस्मरण पढ़ते हुए साहित्य मनीषी Jai Narain Budhwar जय नारायण बुधवार जी ने बाबा नागार्जुन को याद किया था. मुझे वह उस वक्त भी याद थे.

अमल धवल गिरि के शिखरों पर,

बादल को घिरते देखा है.

छोटे-छोटे मोती जैसे

उसके शीतल तुहिन कणों को,

मानसरोवर के उन स्वर्णिम

कमलों पर गिरते देखा है.

बादल को घिरते देखा है.

तुंग हिमालय के कंधों पर,

छोटी बड़ी कई झीलें हैं,

उनके श्यामल नील सलिल में,

समतल देशों से आ-आकर,

पावस की ऊमस से आकुल,

तिक्त-मधुर बिषतंतु खोजते

हंसों को तिरते देखा है.

अगल-बग़ल स्वर्णाभ शिखर थे,

एक-दूसरे से विरहित हो,

अलग-अलग रहकर ही जिनको

सारी रात बितानी होती,

निशा-काल से चिर-अभिशापित

बेबस उस चकवा-चकई का,

बंद हुआ क्रंदन, फिर उनमें,

उस महान सरवर के तीरे,

शैवालों की हरी दरी पर

प्रणय-कलह छिड़ते देखा है.

जो बाबा नागार्जुन ने यहीं बैठकर देखा. उसे मैं वहां जाकर देख रहा था. परिक्रमा मार्ग में डोल्मा दर्रा सबसे ऊंचाई पर है. 19,500 फीट की ऊंचाई. यह ऊंचाई एवरेस्ट के बेस कैंप से 1,200 फीट ज्यादा है. दिल दहला देनेवाली यह सबसे कठिन चढ़ाई थी. यहां आते-आते सांसें छूटने लगीं. डोल्मा से कैलास शिखर की ऊंचाई महज 3,000 फीट रह जाती है. लगा कि हाथ बढ़ा कर कैलास को छू लूं. बर्फ से ढके शिवलिंग की तरह कैलास सबसे मनोरम यहीं से दिखते हैं. सचमुच स्वर्ग की सीढ़ी का अहसास होता है. बाकी हिम-शिखरों से बिलकुल भिन्न. अदृश्य शक्तियों का भंडार. संतुलित पूरा पहाड़ जितना लंबा उतना चौड़ा. हम थके फेफड़ों और मद्धिम पड़ती मति के साथ उसके सामने थे, बिल्कुल नतमस्तक. मेरा मुझमें कुछ नहीं जो कुछ है वह तेरा.

Kailash Mansarovar Yatra (9)

परिक्रमा मार्ग

डोल्मा में कुछ-न-कुछ छोड़कर आने की परंपरा

यहां से कैलास के पश्चिमी छोर से उस पर बनी शेषनाग की लहरियां दिखती हैं. गाइड ने बताया कि ये समुद्र-मंथन के निशान हैं. कुदरत से बड़ा संगतराश कौन है. ग्रेनाइट पत्थर का यह पर्वत महाशिवलिंग का आभास देता था. वही निशान हमें शेरपा अपनी व्याख्या के साथ दिखा रहा था. रास्ता खतरनाक था. हमें बड़े-बड़े पत्थरों पर संतुलन बिठाकर चलना पड़ रहा था. लगता था, अगर पांव फिसला तो सीधे महादेव के चरणों में.

डोल्मा यानी तारा देवी. इस दर्रे के शिखर पर उनकी पूजा-अर्चना होती है. एक चट्टान पर पूजा हो रही थी- दीप, धूप, अक्षत. रास्ते के नाम पर सिर्फ एक रेखा जैसी पगडंडी. सहयात्री यहां धर्म-ध्वज टांगते हैं. इस जगह सिर्फ 15 मिनट ठहरने के बाद हिम्मत छूटने लगती है. यहां ऑक्सीजन की जबरदस्त कमी थी. ठंडी हवा. मौसम हर पल बदल रहा था. डोल्मा में कुछ-न-कुछ छोड़कर आने की परंपरा है. जब भी यहां यह परंपरा शुरू हुई होगी, तब वह शायद छल, कपट, अहंकार, दुर्व्यसन, राग-द्वेष छोड़ने के लिए ही रही होगी. पर आजकल लोग वहां जूते-चप्पल, कपड़े, रूमाल, गमछे वगैरह छोड़कर चले आते हैं. वहां ऐसे कूड़े का बड़ा अंबार लगा था. कुछ लोग जो यहां नहीं आ सकते, उनके कपड़े उनके परिजन, दोस्त, मित्र वहां लाकर छोड़ रहे थे. अपने प्रियों के वस्त्र. यह भी प्रतीकात्मक है. अगर छोड़ना ही है तो शरीर छोड़िए क्योंकि गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने तो कहा ही है, शरीर भी एक वस्त्र है, जिसे आत्मा बदलती रहती है.

मौसम से संघर्षरत हम ॐ नम: शिवाय का पाठ कर रहे थे. भयंकर ठंड और दमघोंटू माहौल में मुंह से क्या निकल रहा था, यह हमें ही पता नहीं चल पा रहा था. सिर्फ ओठ हिलते थे. उन पर वश नहीं था. मुंह से क्या निकल रहा था, यह बगल वाला भी नहीं जान सकता था. विचार कौंधा, इतनी दुर्गम जगह पर हमारे देव क्यों रहते हैं? लगता है, भक्तों से देवता भी ऊब गए, तभी तो उन्होंने हर उस जगह अपना ठिकाना बनाया, जहां भक्तों का आना-जाना आसान न हो. बावजूद इसके लोग वहां भी पहुंच रहे हैं. जरूर भगवान इससे परेशान होंगे. मुझे लगता है, कहीं इसके बाद वे और ऊपर दुर्गम जगह पर न चले जाएं.

वातावरण में एक अलग किस्म का वाइब्रेशन

डोल्मा से नीचे ल्हादू घाटी की ओर हमारा कारवां चलता है. अब सीधी ढलान है. यहां 18,000 फीट की ऊंचाई पर पन्ने के रंग जैसी हरी आभा वाली एक ताजा झील मिलती है. अरे, यह तो गौरी कुंड है! इस झील की परिधि 7.5 कि.मी. और गहराई 80 फीट है. गौरी कुंड पूरे साल बर्फ से ढकी रहती है. इस जमी हुई झील के नीचे से पानी का कल-कल संगीत सुना जा सकता है. बर्फ हटाकर कुछ लोग स्नान भी कर रहे थे. मान्यता है कि यहीं पार्वती स्नान करती थीं. यहीं गणेश पैदा हुए थे. शिव के लिए पार्वती ने यहीं तपस्या भी की थी.

इस हवा, पत्थर, पानी, बर्फ, मिट्टी में कुछ तो है; क्योंकि ऐसी गहरी अनुभूति मुझे पहले कभी नहीं हुई. यहां के वातावरण में एक अलग किस्म का वाइब्रेशन है. पूरा माहौल मन को दूसरी अवस्था में ले जाता है. चौरासी सिद्धों की यह तपोभूमि है. यहां एक पारलौकिक सत्ता की अनुभूति होती है. गौरी कुंड से नीचे जोगंछू नदी के किनारे चलते-चलते परिक्रमा आगे बढ़ती है. अब तारचेन यहां से सिर्फ 15 कि.मी. बचा रह गया है. वहीं परिक्रमा का समापन होना है. अब यात्रा अपेक्षाकृत कुछ सरल थी.

तभी हमें एक अनोखी श्रद्धा दिखी, बल्कि श्रद्धा का शिखर. तिब्बती भी कैलास के प्रति अपार श्रद्धा रखते थे. ऐसे ही कुछ साहसी श्रद्धालु दंडवत् परिक्रमा कर रहे थे. हर बार लेटते थे, फिर उठते थे, फिर लेटते थे. यह होती है दंडवत् परिक्रमा. जब हमें पैरों से चलकर परिक्रमा करने में इतनी मुश्किल हो रही थी, तब वे लेटकर परिक्रमा कर रहे थे. उनकी इस अगाध श्रद्धा को हमने प्रणाम किया. परिक्रमा का रास्ता खासा ऊबड़-खाबड़ होता है, इसलिए वे हाथों में जूट का दस्ताना और घुटनों पर टायर के टुकड़े बाँधे हुए थे. जैसे हम पूजा करने के लिए पंडित को दक्षिणा का संकल्प दे उसे पूजा करने का ठेका देते हैं, वैसे ही यहां भी कई पैसेवाले लोग अपना संकल्प इन कुलियों को दे उनसे परिक्रमा कराते हैं. पता नहीं पुण्य किसे मिलता है, पर श्रद्धा तो इन कुलियों की ही दिखती है.

परिक्रमा पूरी कर हम तारचेन लौट आए. सब एक-दूसरे को ॐ नम: शिवाय कहकर धन्यवाद ज्ञापित कर रहे थे. वापस आने के बाद हम सब में धीरे-धीरे जान लौट रही थी. मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि अपनी इस यात्रा के लिए किसको धन्यवाद दूं. एक मौन, अव्यक्त, शांत और निरुत्तर अनुभूति थी मेरे मन में… जय जय!

Ramswaroop Mantri

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