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*कश्मीर व आतंकवाद का हल है भारत व पाकिस्तान के बीच मैत्री व शांति*

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संदीप पाण्डेय

पहलगाम के आतंकवादी हमले के बाद भारत की ओर पाकिस्तान के अंदर आंतकवादी संगठनों के नौ ठिकानों पर की गई कार्यवाही से दोनों देशों के बीच एक युद्ध शुरू हो गया। जब तक युद्ध चल रहा था तब तक तो दोनों देशों में युद्धोन्माद का माहौल रहा लेकिन अचानक अमरीका, जिसने पहले तो कहा कि उसका इस युद्ध से कोई लेना-देना नहीं है, ने दोनों देशों के बीच युद्ध-विराम की घोषणा कर दी। फिर अचानक माहौल बदल गया और लोगों को बड़ी राहत महसूस हुई। ऐसा लग रहा है कि सिवाय कट्टरपंथियों के युद्ध कोई चाहता नहीं था। अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कश्मीर समस्या का हल निकालने के लिए मध्यस्थता की भी पेशकश की है। यह वही डोनाल्ड ट्रम्प हैं जो कुछ दिन पहले फिलीस्तीनियों को मिस्र, जार्डन, आदि देशों में बसा कर, गजा को खाली करा अमरीका को सौंपने की बात कर रहे थे। कनाडा और ग्रीनलैण्ड पर भी उनकी नजर है। इसलिए अमरीका की कोई भी भूमिका संदिग्ध है। दो बिल्लियों की लड़ाई में हो सकता है बंदर ही रोटी हड़प ले।

यदि भारत सरकार की मानें तो पहलगाम पर हमला इसलिए हुआ क्योंकि पाकिस्तान कश्मीर को विवादित मानता है। भारत पाकिस्तान के बीच जो युद्ध शुरू हुआ था उसमें तो विराम हो गया। सभी लोग राहत महसूस कर रहे हैं। लेकिन कश्मीर के लोग अभी भी असुरक्षित हैं। कल वहां कोई छोटा या बड़ा आतंकवादी हमला नहीं होगा इसकी कोई गारंटी नहीं है। दो देशों के बीच लड़ाई में कश्मीर के लोग अपने को ठगा महसूस कर रहे हैं। इसका हल हमें निकालना ही होगा। भारत पाकिस्तान से बात किए बिना इस समस्या का कोई हल निकाल ही नहीं सकता। फिर कश्मीर का जो भी हल निकले वह वहां के लोगों की सहमति के बिना नहीं हो सकता। जब तक कश्मीर के लोगों की राय के मुताबिक वहां कोई हल नहीं निकाला जाता आतंकवाद की समस्या बनी रहेगी।

हम उम्मीद करते हैं कि इस युद्ध से इतना तो सबक हमारे नेताओं ने सीखा होगा। बजाए पाकिस्तान को सबक सिखाने के यदि वे कश्मीर की समस्या का हल निकालें तो ज्यादा सार्थक होगा। नरेन्द्र मोदी यह कहते रहेंगे कि पाकिस्तान के साथ बातचीत सिर्फ आतंकवाद या पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर पर ही हो सकती है तो मामला वहीं अटका रहेगा। आखिर पाकिस्तान सिंधु जल संधि पर क्यों बातचीत नहीं करना चाहेगा? अमरीका, जिसकी वजह से शांति आई है, पाकिस्तान को आतंकवाद के संरक्षक के रूप में उस तरह से नहीं देखता जैसे हम देखते हैं। अमरीका ने भी पाकिस्तान में ही जाकर उसामा बिन लादेन को मारा लेकिन उसने पाकिस्तान की सरकार को इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया और न ही पाकिस्तान पर कोई हमला किया। उसे पाकिस्तान को सबक सिखाने की कोई जरूरत नहीं महसूस हुई। उसने पाकिस्तान के साथ अपने सामान्य सम्बंध कायम रखे। पाकिस्तान को हाल में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से बड़ा ऋण भी मिल गया जो अमरीका की मर्जी के बिना सम्भव नहीं था। डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत और पाकिस्तान को दो महान देश बताया है। जाहिर है अमरीका पाकिस्तान को आतंकवाद के लिए उस तरह से जिम्मेदार नहीं मानता जैसे भारत मानता है।

हकीकत तो यह है कि पाकिस्तान में अब तक 22,000 से ज्यादा आम लोग आतंकवादी घटनाओं में मारे जा चुके हैं। वहां के लोग भी आतंकवाद से त्रस्त हैं। इसी वर्ष मार्च में क्वेटा से पेशावर जा रही रेलगाड़ी जाफर एक्सपे्रस जिसमें 380 यात्री सवार थे का बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी ने अपहरण कर लिया था। बाद में सेना के जवानों के साथ गोलीबारी में कई जानें गईं। बाकी दुनिया पाकिस्तान को आतंकवाद का संरक्षक नहीं बल्कि आतंकवाद से पीड़ित देश मानती है। हमें सोचना चाहिए कि क्या हम अपने नजरिए में कोई बदलाव ला सकते हैं? अमरीका क्यों हमें व पाकिस्तान को एक समान देखता है? चीन अपना सारा समान भारत को निर्यात करता है लेकिन अपने हथियार पाकिस्तान को देता है।

नरेन्द्र मोदी ने पाकिस्तान को यह भी चेतावनी दी है कि भारत उसके द्वारा नाभिकीय शस्त्र के उपयोग की धमकी से नहीं डरेगा। डोनाल्ड ट्रम्प ने दावा किया है कि उन्होंने भारत-पाकिस्तान के बीच नाभिकीय युद्ध होने से बचा लिया। इन बातों से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पाकिस्तान शायद नाभिकीय शस्त्र के इस्तेमाल के बारे में सोच रहा था। यदि ऐसा हो जाता तो दोनों तरफ कम से कम पचास-पचास शहरों में 1945 के हिरोशिमा व नागासाकी जैसी विभीषिका देखने को मिलती। वह जरूर भारत-पाकिस्तान का अंतिम युद्ध होता।

यह बात सही है कि भारत-पाकिस्तान के हरेक युद्ध की शुरुआत पाकिस्तान से हुई लेकिन नाभिकीय शस्.त्रों की होड़ तो भारत ने शुरू की। 1974 में इंदिरा गांधी ने नाभिकीय परीक्षण किया और 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी ने। इंदिरा गांधी ने तो दुनिया को बताया कि परीक्षण शांतिपूर्ण उपयोग के लिए था हलांकि समझने वाले जानते थे कि परीक्षण बम बनाने के लिए ही हुआ था। वाजपेयी ने तो खुलकर कह ही दिया कि भारत ने नाभिकीय शस्त्र बनाने की क्षमता हासिल कर ली है। शीघ्र ही पाकिस्तान ने भी परीक्षण कर लिया। पारम्परिक शस्त्रों और सेना बल में तो भारत पाकिस्तान पर भारी पड़ता था लेकिन नाभिकीय शस्त्रों की होड़ में पाकिस्तान हमारे बराबर हो गया। अतः यदि पाकिस्तान के पास नाभिकीय शस्त्र आया तो इसके लिए भारत ही जिम्मेदार है।

दोनों देशों की सरकारों को मैत्री व शांति की पहल लेकर मिलकर आतंकवाद नामक समस्या को खत्म करने का बीड़ा उठाना चाहिए क्योंकि आतंकवाद से पीड़ित तो दोनों ही हैं। किंतु यह तभी सम्भव हो पाएगा जब पाकिस्तान की जनता और चुनी हुई सरकार का दबाव वहां की सेना व खुफिया संस्था पर पड़ेगा। जिस तरह से इमरान खान के समर्थन में और सेना के खिलाफ लोग सड़कों पर पहले उतरें हैं ऐसा काफी सम्भव है। पाकिस्तान की कोई भी चुनी हुई सरकार भारत के साथ सम्बंध सामान्य ही करना चाहेगी। जैसे इमरान खान ने भारतीय तीर्थयात्रियों के लिए करतारपुर गलियारा खोलकर करने का प्रयास किया था। यदि इसके जवाब में भारत पाकिस्तान के तीर्थयात्रियों के लिए अजमेर शरीफ दरगाह का एक गलियारा खोल देता तो पाकिस्तान के अंदर भारत के लिए एक सद्भावना जागृत हो जाती जिसका स्वाभाविक असर यह होता कि वहां कट्टरपंथी ताकतें कमजोर पड़तीं। इसके अलावा दोनों देशों को मिलकर दक्षिण अमरीका, अर्फीका, मध्य एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया व मंगोलिया की तरह अपने अपने नाभिकीय शस्त्र खत्म कर दक्षिण एशिया को नाभिकीय शस्त्र मुक्त क्षेत्र घोषित कर देना चाहिए। हो सके तो इसमें चीन को भी शामिल करना चाहिए। तभी हम सही मायने में सुरक्षित महसूस करेंगे।

लेखकः संदीप पाण्डेय, महासचिव, सोशलिस्ट पार्टी (इण्डिया), फोनः 0522 3564437, e-mail id: ashaashram@yahoo.com

Ramswaroop Mantri

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