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*कांवड़ यात्रा : आस्था की आड़ में अराजकता का विस्तार*

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-तेजपाल सिंह ‘तेज’

            भारत एक ऐसा देश है जहाँ धर्म केवल व्यक्तिगत श्रद्धा नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन की धुरी भी है। यहाँ पर्व और यात्राएँ केवल उत्सव नहीं, सामूहिक चेतना का हिस्सा हैं। इन्हीं में एक है कांवड़ यात्रा, जो भगवान शिव की भक्ति में डूबी एक प्राचीन परंपरा मानी जाती है। किंतु बीते कुछ वर्षों में इस यात्रा का स्वरूप जिस प्रकार बदलता गया है, वह केवल धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक संकट का संकेत बन गया है।

            कांवड़ यात्रा भारतीय धार्मिक परंपरा का एक पुरातन रूप है, जिसमें भगवान शिव के भक्त गंगाजल लेकर अपने-अपने इलाकों के शिवालयों में जल चढ़ाने जाते हैं। यह परंपरा मूलतः तप, सेवा, संयम और भक्ति का प्रतीक मानी जाती रही है। किंतु वर्तमान समय में यह यात्रा अपने पारंपरिक स्वरूप से हटकर एक ऐसे सामाजिक-राजनीतिक उन्माद में परिवर्तित हो गई है जहाँ ‘आस्था’ की आड़ में ‘अराजकता’, ‘हिंसा’, ‘शो ऑफ स्ट्रेंथ’ और ‘धर्म की राजनीतिक ब्रांडिंग’ खुलकर सामने आती है।

            ABP न्यूज़ के वरिष्ठ पत्रकार संदीप चौधरी द्वारा प्रस्तुत उपरोक्त चर्चा महज़ एक मीडिया रिपोर्ट नहीं, बल्कि भारत के वर्तमान धार्मिक-राजनीतिक और प्रशासनिक ढाँचे पर एक सशक्त टिप्पणी है। यह विषय केवल “कांवड़ियों का उत्पात” नहीं है, यह मुद्दा है—सत्ता संरक्षित धार्मिक उपद्रव, न्याय की चुप्पी, और आम नागरिक की दुर्दशा का।

            आज कांवड़ यात्रा भक्ति का प्रतीक कम और भीड़तंत्र का विस्तार अधिक बनती जा रही है। आस्था की आड़ में सड़कों पर कब्जा, आम जनता की दिनचर्या का विघटन, और प्रशासन की मौन सहमति इस यात्रा को लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था के लिए खतरे की घंटी बना रही है। यह आलेख इसी विडंबना का विश्लेषण करता है—जहाँ धार्मिक आस्था और लोकतांत्रिक अधिकारों के बीच टकराव उत्पन्न हो चुका है।

            भारत एक ऐसा देश है जहाँ धर्म केवल व्यक्तिगत श्रद्धा नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन की धुरी भी है। यहाँ पर्व और यात्राएँ केवल उत्सव नहीं, सामूहिक चेतना का हिस्सा हैं। इन्हीं में एक है कांवड़ यात्रा, जो भगवान शिव की भक्ति में डूबी एक प्राचीन परंपरा मानी जाती है। किंतु बीते कुछ वर्षों में इस यात्रा का स्वरूप जिस प्रकार बदलता गया है, वह केवल धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक संकट का संकेत बन गया है। आज कांवड़ यात्रा भक्ति का प्रतीक कम और भीड़तंत्र का विस्तार अधिक बनती जा रही है। आस्था की आड़ में सड़कों पर कब्जा, आम जनता की दिनचर्या का विघटन, और प्रशासन की मौन सहमति इस यात्रा को लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था के लिए खतरे की घंटी बना रही है। यह आलेख इसी विडंबना का विश्लेषण करता है—जहाँ धार्मिक आस्था और लोकतांत्रिक अधिकारों के बीच टकराव उत्पन्न हो चुका है।

1. कांवड़ यात्रा: एक सांस्कृतिक परंपरा से भीड़ के राजनीतिक प्रदर्शन तक:

            कांवड़ यात्रा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि धार्मिक श्रद्धा और तपस्या से जुड़ी रही है। सावन मास में, उत्तर भारत विशेषकर उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, हरियाणा और दिल्ली से लाखों श्रद्धालु हरिद्वार, गंगोत्री, सुल्तानगंज, गया आदि स्थानों से पवित्र गंगाजल लेकर अपने-अपने इलाकों के शिवालयों में जल चढ़ाने जाते हैं।

            पुराने समय में यह यात्रा प्रायः मौन तपस्या के रूप में होती थी। श्रद्धालु नंगे पाँव चलते, उपवास करते, और मार्ग में अनुशासन रखते। कांवड़ उठाना भक्ति का प्रतीक होता था, न कि शक्ति प्रदर्शन का। परंतु आज यह यात्रा शक्ति प्रदर्शन, धार्मिक उन्माद और सत्तावादी संरक्षण का रूप धारण कर चुकी है। बाइकों पर स्पीकर बाँधकर डीजे बजाते, सड़कों पर हुड़दंग करते, ट्रैफिक रोकते, दुकानों और गाड़ियों को नुकसान पहुँचाते, आम लोगों को धमकाते और महिलाओं तक को नहीं बख्शने वाले इन ‘कांवड़ियों’ को देखना अब आम बात हो गई है।

2. आस्था का विचलन या सत्ता का संरक्षित भीड़तंत्र?

            आस्था का सम्मान हर व्यक्ति का अधिकार है, परंतु वही आस्था जब दूसरों के अधिकारों को बाधित करने लगे, तो वह संवैधानिक चुनौती बन जाती है। हरिद्वार से दिल्ली तक का मार्ग जब केवल कांवड़ियों के हवाले कर दिया जाता है, जब दो जिलों में स्कूल बंद हो जाते हैं, जब हाईवे पर एंबुलेंस फँसी रह जाती है, और प्रशासन मूकदर्शक बना रहता है—तो यह किसी एक धार्मिक समूह की विशेष सुविधा नहीं, बल्कि लोकतंत्र का अवमूल्यन है।

            क्या एक नागरिक के रूप में हम करों का भुगतान केवल इसलिए करते हैं कि हमारी ही सड़कों पर हमें चलने का अधिकार छीन लिया जाए? रामधारी सिंह दिनकर ने कहा था—“सिंहासन खाली करो, जनता आ रही है।” लेकिन आज के भारत में दृश्य बदल गया है—“सड़कें खाली करो, कांवड़िए आ रहे हैं।” और यह परिवर्तन केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि राजनीतिक संरक्षण और मीडिया के धार्मिक महिमामंडन का परिणाम है।

            कांवड़ यात्रा के दौरान देश के कई हिस्सों, विशेष रूप से उत्तर भारत (हरिद्वार, मेरठ, मुज़फ्फरनगर, दिल्ली, गाज़ियाबाद आदि) में जिस तरह की घटनाएँ सामने आईं—दुकानों का तोड़ा जाना, महिलाओं से बदसलूकी, रोडवेज बसों और एंबुलेंस को रोका जाना, बच्चों की स्कूल बसों पर हमला—ये सारी घटनाएँ यह बताती हैं कि ‘आस्था’ अब एक निजी साधना नहीं रही, बल्कि भीड़तंत्र का सार्वजनिक शक्ति-प्रदर्शन बन चुकी है।

            यह भीड़ किसी एक धर्म या विचारधारा की नहीं, यह उस मानसिकता की भीड़ है जिसे राज्य सत्ता ने लंबे समय से पोषित किया है। यही कारण है कि जब एक शिक्षक बच्चों को एक कविता के माध्यम से ‘ज्ञान का दीप जलाने’ और ‘मानवता की सेवा’ का संदेश देता है, तो उस पर प्राथमिकी दर्ज होती है, लेकिन सड़कें जाम कर देने, दुकानों को बर्बाद करने, और एंबुलेंस रोक देने वाले लोगों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती। लगता है कि आजकल आस्था ने आतंक का रूप ले लिया है: या यूँ कहें कि आजकल श्रद्धा के नाम पर संवैधानिक अधिकार कुचले जाते हैं।

3. सत्ता की चुप्पी और पुलिस की पंगुता: जब कानून भी ‘भक्त’ बन जाए:

            एबीपी के संदीप चौधरी की रिपोर्ट के अनुसार, जब डीजीपी स्वयं कांवड़ियों के पैर धोते हैं, जब पुलिस उन्हें टोकने की बजाय ‘प्रसाद’ चढ़ा रही होती है, तो स्थानीय पुलिस अधिकारियों से कैसे उम्मीद की जाए कि वे नियम तोड़ने वाले श्रद्धालुओं पर सख़्त कार्रवाई करेंगे? ध्यान देने योग्य बात यह है कि यदि कोई मुस्लिम नागरिक सड़क पर नमाज़ पढ़ता है, तो प्रशासन तत्काल नोटिस जारी करता है, लेकिन कांवड़ यात्रा के नाम पर महीनों तक चलने वाली अराजकता पर कोई भी ठोस आपराधिक कार्रवाई नहीं होती। यह न्याय का दोहरा मानदंड है, जो केवल धार्मिक विभाजन नहीं बढ़ा रहा, बल्कि संविधान के मूल स्वरूप को भी विकृत कर रहा है।

            संदीप चौधरी का यह सवाल कि “क्या सिस्टम नाम की कोई चीज़ बची है?” बेहद मौजू है। जब सड़कें कांवड़ियों के हवाले कर दी जाती हैं, ट्रैफिक रूट बदल दिए जाते हैं, स्कूल बंद कर दिए जाते हैं, और आम नागरिक को डर के साए में जीना पड़ता है—तब यह ‘लोकतंत्र’ नहीं, ‘भीड़तंत्र’ बन जाता है।  दुखद यह है कि न्यायपालिका भी ऐसे मामलों में मौन दिखाई देती है। यदि कोई मुसलमान सड़क पर नमाज़ पढ़ ले, तो उस पर नोटिस और गिरफ़्तारी हो सकती है, लेकिन कांवड़ियों के नाम पर हफ्तों तक चलने वाले अराजक कब्जे पर कोई सख्त कार्रवाई नहीं होती। यह न्याय की दोहरी चाल है, जो सामाजिक ताने-बाने को और अधिक विषैला बना रही है

4. शिक्षा बनाम अंधभक्ति: नई पीढ़ी के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह

            रिपोर्ट में वर्णित शिक्षक की कविता—“कांवड़ यात्रा मत करो, ज्ञान का दीप जलाओ”—पर दर्ज हुई एफआईआर यह दर्शाती है कि भारत में अब भक्ति और अंधश्रद्धा को वैचारिक विमर्श से ऊपर रखा जा रहा है। वह शिक्षक मुसलमान नहीं, हिंदू था, जिसने केवल शिक्षा और मानवता की बात की, परंतु धार्मिक संगठनों ने उसे आस्था पर हमला बताया और उसे अपराधी की तरह देखा गया।

            उत्तर प्रदेश में 7 लाख से अधिक बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं। इन बच्चों के लिए न तो सरकार कांवड़ यात्रा जैसी कोई योजना बनाती है, न ही कोई सुरक्षा बल तैनात करती है। यह दृश्य दर्शाता है कि सरकार की प्राथमिकता भक्ति से अधिक राजनीतिक लाभ है, और शिक्षा—राष्ट्रनिर्माण का मूल आधार—हाशिए पर है।

            जब एक शिक्षक, जो बच्चों को ‘ज्ञान का दीप जलाने’ की सलाह देता है, उसके खिलाफ एफआईआर होती है, तो यह घटना केवल अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला नहीं है, यह पूरे शिक्षा-तंत्र पर राजनीतिक धार्मिकता का नियंत्रण है। रिपोर्ट में बताया गया कि उत्तर प्रदेश में स्कूल न जाने वाले बच्चों की संख्या सबसे अधिक है। ऐसे में कांवड़ यात्रा में करोड़ों खर्च किए जाते हैं, जबकि बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे—क्या यह राष्ट्र निर्माण का रास्ता है? यह स्थिति दरअसल यह दिखाती है कि किस तरह राज्य धार्मिक आस्थाओं को राजनीतिक शक्ति के रूप में देख रहा है, और युवाओं को शिक्षा की बजाय उत्सव, भक्ति और भीड़ में शामिल होने के लिए उकसा रहा है।

5. भीड़तंत्र बनाम नागरिकता: जब राष्ट्र ‘उत्सव राज्य’ में बदल जाए:

            भारत धीरे-धीरे एक ऐसे ‘उत्सव-राज्य’ में बदल रहा है जहाँ हर महीने कोई न कोई धार्मिक आयोजन सत्ता के संरक्षण में होता है। इन आयोजनों में भीड़ जुटाना, सरकारी संसाधनों का प्रयोग करना, ट्रैफिक रोकना, स्कूल बंद करना, और सुरक्षा बल तैनात करना अब सामान्य बन चुका है।

            भीड़ का यह प्रदर्शन अक्सर ‘धर्म का उत्सव’ नहीं, बल्कि ‘राजनीति का प्रचार’ बन चुका है। कांवड़ यात्रा में शामिल युवाओं को कोई नहीं बताता कि वही सड़कें, वही स्कूल, वही एंबुलेंस उनके भी अधिकार हैं। किसी भी लोकतंत्र का भविष्य तब संकट में होता है जब नागरिक विवेक की जगह धार्मिक उत्तेजना ले लेती है, और सरकारें वोटबैंक के लालच में संविधान की शपथ को ताक पर रख देती हैं। कांवड़ यात्रा में जो दृश्य सामने आए—गाड़ियों को तोड़ना, लोगों को पीटना, व्यापार ठप करना, आम नागरिक की दिनचर्या को बाधित करना—यह सब केवल अराजकता नहीं, सत्ता संरक्षित हिंसा है। इन दृश्यों में धर्म का सौंदर्य, अध्यात्म की गहराई, और परंपरा की गरिमा कहीं नहीं दिखती।  सवाल यह नहीं है कि सभी कांवड़िये हिंसक हैं। सवाल यह है कि जो हिंसा कर रहे हैं, क्या वे पकड़े जा रहे हैं? क्या उन्हें सजा मिल रही है? क्या समाज और सरकार की ओर से यह स्पष्ट सन्देश दिया जा रहा है कि ‘धर्म की आड़ में गुंडागर्दी स्वीकार्य नहीं है’? उत्तर है—नहीं।

6. मीडिया की भूमिका: धर्म का बाज़ार या जनसरोकार की पत्रकारिता?

            कांवड़ यात्रा पर अधिकांश मीडिया संस्थान केवल ‘भक्ति रस’ में डूबे रहते हैं। उनकी स्क्रीन पर कांवड़ियों की भक्ति, जयकारे, पुष्पवर्षा और भजन दिखाए जाते हैं, लेकिन जब भीड़ स्कूल बस पर हमला करती है, जब महिलाएँ पीटी जाती हैं, या जब दुकानदार की रोज़ी-रोटी उजड़ती है—तो वे चुप हो जाते हैं। संदीप चौधरी जैसे पत्रकारों की कोशिशें इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती हैं, क्योंकि वे न केवल घटनाओं को रिपोर्ट करते हैं, बल्कि उनकी सामाजिक-राजनीतिक पृष्ठभूमि को भी उजागर करते हैं। मीडिया की भूमिका यहाँ केवल सूचना देना नहीं, बल्कि जनचेतना को जगाना होना चाहिए। यदि पत्रकार भी केवल धार्मिक सत्ता के प्रचारक बन जाएँ, तो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की नींव ही हिल जाती है।

7. हिन्दू धर्म का अपहरण: आस्था के नाम पर अधर्म का विस्तार:

            हिंदू धर्म हजारों वर्षों से सहिष्णुता, अहिंसा, और आत्मानुशासन का वाहक रहा है। भगवान शिव को तो ‘अघोरी’, ‘वैरागी’, और ‘करुणा का प्रतीक’ माना जाता है। परंतु कांवड़ यात्रा में जो दृश्य दिख रहे हैं—वे शिव नहीं, शस्त्र का प्रचार कर रहे हैं। क्या भगवान शिव अपने नाम पर किसी महिला को पीटे जाने, किसी स्कूल बस के शीशे तोड़े जाने, या किसी दुकानदार को सड़क पर मारने की अनुमति देंगे? बिल्कुल नहीं।

            यहाँ सवाल यह है कि क्या हिंदू धर्म का यही स्वरूप हम अगली पीढ़ी को सौंप रहे हैं? क्या हम उन्हें बता रहे हैं कि श्रद्धा का मतलब है लाठी, डंडे, हॉकी और धौंस? हिंदू धर्म को उसके वास्तविक स्वरूप में पुनर्स्थापित करने की ज़रूरत है—जहाँ भक्ति का मतलब सेवा हो, और आस्था का मतलब आत्मानुशासन।

            पिछले एक दशक में धार्मिक यात्राओं—चाहे वह राम नवमी की शोभा यात्रा हो या कांवड़ यात्रा—का स्वरूप तीव्र रूप से बदला है। यह परिवर्तन केवल भक्तों की बढ़ती संख्या का नहीं, बल्कि सत्ता-समर्थित धार्मिक उन्माद का प्रमाण है। उत्तर प्रदेश के डीजीपी द्वारा कांवड़ियों के पैर धोना कोई निजी श्रद्धा नहीं, बल्कि राज्य का वैचारिक झुकाव दर्शाता है। यह दृश्य एक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के लिए शर्मनाक है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब सरकारें पुष्पवर्षा करती हैं, स्कूलों को बंद कर देती हैं, हाईवे को आस्था के नाम पर आमजन के लिए प्रतिबंधित कर देती हैं, तब आम नागरिक का संवैधानिक अधिकार कहाँ जाता है? क्या केवल एक समुदाय विशेष की धार्मिक भावनाएँ ही ‘रक्षा योग्य’ हैं?

8. समाधान की दिशा में : कानून, शिक्षा और जनजागरण की त्रिवेणी:

            समस्या केवल भीड़ की नहीं, प्रशासनिक नपुंसकता, राजनीतिक स्वार्थ, और सामाजिक चुप्पी की भी है। इसके समाधान के लिए —

·        प्रशासन को स्पष्ट दिशा निर्देश देने होंगे कि कोई भी धार्मिक आयोजन नागरिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं कर सकता।

·        सड़कों और ट्रैफिक व्यवस्था को वैज्ञानिक ढंग से पुनर्गठित किया जाए, जिससे आम नागरिक प्रभावित न हो।

·        शिक्षा तंत्र में धार्मिक सहिष्णुता, विवेकशीलता और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित पाठ्यक्रम को अनिवार्य किया जाए।

·        मीडिया को सजग और निष्पक्ष भूमिका निभानी होगी, केवल जयकारे नहीं, अन्याय के विरोध की भी हिम्मत दिखानी होगी।

·        सामाजिक संगठनों और बुद्धिजीवियों को भी आगे आना होगा, जो धर्म के नाम पर फैलाए जा रहे अंधविश्वास और अराजकता के खिलाफ आवाज़ उठाएँ।

            कांवड़ यात्रा को लेकर संदीप चौधरी की रिपोर्ट महज़ एक घटनाक्रम नहीं, बल्कि भारतीय समाज के भीतर गहराते धार्मिक उन्माद, राज्य संरक्षित हिंसा और लोकतांत्रिक पतन की असल तस्वीर है। जब सड़कें धर्म के नाम पर जाम हो जाएँ, एंबुलेंस रास्ते में अटक जाएँ, स्कूल बंद कर दिए जाएँ और कानून-व्यवस्था असहाय दिखे—तो यह किसी धार्मिक आयोजन की सफलता नहीं, राजनीतिक विफलता और सामाजिक संवेदनहीनता का संकेत है।

            आज ज़रूरत है एक ऐसी विवेकशील नागरिकता की, जो धर्म और आस्था को अराजकता से अलग कर सके, जो सवाल पूछ सके कि—“क्या मेरी श्रद्धा किसी और के अधिकारों को कुचलने का औज़ार बन सकती है?”

            यदि हम सचमुच धर्म को उसके मूल रूप—सेवा, शांति और समभाव—में स्थापित करना चाहते हैं, तो हमें भीड़ नहीं, विवेक से चलना होगा। तभी भारत एक सच्चे धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के रूप में जीवित रह सकेगा।

9. धर्म के नाम पर लोकतंत्र का अपहरण:

            कांवड़ यात्रा आज धार्मिक श्रद्धा नहीं, एक राजनीतिक आयोजन बन चुकी है। यह यात्रा अब सड़क पर शक्ति प्रदर्शन, आस्था की आड़ में अराजकता और राज्य के मौन समर्थन का त्रिकोण बन गई है। धर्म एक निजी आस्था है, उसे राज्य नीति नहीं बनाया जा सकता। लोकतंत्र में आस्था की स्वतंत्रता है, लेकिन वह स्वतंत्रता दूसरों के अधिकारों को कुचलने की छूट नहीं देती। आज जब एक शिक्षक को शिक्षा की बात करने पर अपराधी बना दिया जाता है, और अराजक तत्वों को ‘भक्त’ कहकर सम्मानित किया जाता है, तब यह स्थिति केवल संविधान की हत्या नहीं, बल्कि एक भयावह धार्मिक तानाशाही की दस्तक है। अब समय है कि समाज सवाल करे—”क्या हम धर्म के नाम पर हिंसा और अन्याय को चुपचाप स्वीकार करते रहेंगे?” या फिर “ज्ञान का दीप जलाकर धर्म, समाज और राज्य—all three—को नया, न्यायपूर्ण और मानवीय स्वरूप देंगे?”

संभावित उद्धरण:

·        “धर्म जो दूसरों को दुःख दे, वह धर्म नहीं, अधर्म है।” — महात्मा गांधी

·        “लोकतंत्र तभी सफल है जब भीड़ नहीं, विवेक बोलता है।” — डॉ. भीमराव अंबेडकर

            कांवड़ यात्रा भारतीय धार्मिक परंपरा का एक पुरातन रूप है, जिसमें भगवान शिव के भक्त गंगाजल लेकर अपने-अपने इलाकों के शिवालयों में जल चढ़ाने जाते हैं। यह परंपरा मूलतः तप, सेवा, संयम और भक्ति का प्रतीक मानी जाती रही है। किंतु वर्तमान समय में यह यात्रा अपने पारंपरिक स्वरूप से हटकर एक ऐसे सामाजिक-राजनीतिक उन्माद में परिवर्तित हो गई है जहाँ ‘आस्था’ की आड़ में ‘अराजकता’, ‘हिंसा’, ‘शो ऑफ स्ट्रेंथ’ और ‘धर्म की राजनीतिक ब्रांडिंग’ खुलकर सामने आती है।  भारत एक ऐसा देश है जहाँ धर्म केवल व्यक्तिगत श्रद्धा नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन की धुरी भी है। यहाँ पर्व और यात्राएँ केवल उत्सव नहीं, सामूहिक चेतना का हिस्सा हैं। इन्हीं में एक है कांवड़ यात्रा, जो भगवान शिव की भक्ति में डूबी एक प्राचीन परंपरा मानी जाती है। किंतु बीते कुछ वर्षों में इस यात्रा का स्वरूप जिस प्रकार बदलता गया है, वह केवल धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक संकट का संकेत बन गया है।

            आज कांवड़ यात्रा भक्ति का प्रतीक कम और भीड़तंत्र का विस्तार अधिक बनती जा रही है। आस्था की आड़ में सड़कों पर कब्जा, आम जनता की दिनचर्या का विघटन, और प्रशासन की मौन सहमति इस यात्रा को लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था के लिए खतरे की घंटी बना रही है। यह आलेख इसी विडंबना का विश्लेषण करता है—जहाँ धार्मिक आस्था और लोकतांत्रिक अधिकारों के बीच टकराव उत्पन्न हो चुका है। 

            कांवड़ यात्रा को लेकर संदीप चौधरी की रिपोर्ट महज़ एक घटनाक्रम नहीं, बल्कि भारतीय समाज के भीतर गहराते धार्मिक उन्माद, राज्य संरक्षित हिंसा और लोकतांत्रिक पतन की असल तस्वीर है। जब सड़कें धर्म के नाम पर जाम हो जाएँ, एंबुलेंस रास्ते में अटक जाएँ, स्कूल बंद कर दिए जाएँ और कानून-व्यवस्था असहाय दिखे—तो यह किसी धार्मिक आयोजन की सफलता नहीं, राजनीतिक विफलता और सामाजिक संवेदनहीनता का संकेत है। आज ज़रूरत है एक ऐसी विवेकशील नागरिकता की, जो धर्म और आस्था को अराजकता से अलग कर सके, जो सवाल पूछ सके कि—“क्या मेरी श्रद्धा किसी और के अधिकारों को कुचलने का औज़ार बन सकती है?” यदि हम सचमुच धर्म को उसके मूल रूप—सेवा, शांति और समभाव—में स्थापित करना चाहते हैं, तो हमें भीड़ नहीं, विवेक से चलना होगा। तभी भारत एक सच्चे धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के रूप में जीवित रह सकेगा। अन्यथा ये मान लेना चाहिए कि हम Elected Autocracy की देहर पर खड़े हैं।

Ramswaroop Mantri

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