
बादल सरोज
तारीखें सिर्फ तिथियाँ नहीं होतीं, वे उर्दू के शब्द ‘तारीख’ के एक और अर्थ इतिहास की तरह अतीत के साथ साक्षात्कार का अवसर भी मुहैया कराती हैं। इन्हें मनाना कोई औपचारिक कर्मकांड नहीं है – इतिहास हमेशा सबक लेने के लिए होता है। जैसा कि कहा जाता है जो इतिहास से सबक नहीं लेते वे उसे दोहराने के लिए अभिशप्त होते है।
यह वर्ष भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन को नयी दिशा, नयी ऊर्जा और प्रेरणा देने वाले संगठन नौजवान भारत सभा का शताब्दी वर्ष है। 1926 में इसके गठन को पूरे 100 हो जायेंगे। इसके योगदान और आज इसकी प्रासंगिकता और सामयिकता पर थोड़ी निगाह डालना जरूरी भी है, उपयोगी भी है।
पिछली सदी के शुरुआती दो दशक देश और दुनिया दोनों के लिए बड़े झंझावतों के दशक थे। गांधी आ भी चुके थे और लोगों की लामबंदी करने की अपनी असाधारण क्षमता के चलते भारत के राजीतिक परिदृश्य पर छा भी चुके थे। इसी के साथ देश और दुनिया में कुछ ऐसा घट चुका था, घट रहा था जो बड़े पैमाने पर नई सोच, नए व्यवहार और नए तरीकों की आवश्यकता महसूस करा रहा था। जैसे :
एक : 1917 में मानव समाज के इतिहास की दिशा हमेशा के लिए बदल देने वाली रूसी क्रांति हो चुकी थी और उसकी चकाचौंध से अफ्रीका से लेकर एशिया तक के नाउम्मीदी के अँधेरे में डूबी मानवता को रौशनी दिखाई देने लगी थी।
दो ; दुनिया के बंटवारे के लिए हुए पहले विश्वयुद्ध की अनावश्यक विभीषिका और उसमें भारत के 14 लाख सैनिकों को उन देशों के विरुद्ध लड़ने भेजा जाना, जिनसे भारत का कोई झगड़ा नहीं था। दूसरों के लिए लड़ते हुए इस युद्ध में 74187 भारतीय सैनिक मारे गए। इस त्रासदी के साथ नत्थी एक बात यह भी थी कि 13 लाख से अधिक सैनिक दुनिया के अनेक देश और उनके अपने से भिन्न और आजाद समाज देखकर, रोशन खयाल होकर लौटे भी थे।
तीन : 1919 में जलियांवाला बाग़ का नरसंहार – जो भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सबसे निर्णायक दो टर्निंग पॉइंट्स में से पहला था।
चार : मजदूर वर्ग राष्ट्रीय स्तर की ट्रेड यूनियन के रूप में संगठित हुआ और देश भर में आन्दोलनों और हडतालों की लहर का उठी। इसी दौरान अनगिनत किसान संघर्षों का उभार आया जिनमें से कई बगावतों तक पहुंची ।
पांच : भारत की कम्युनिस्ट पार्टी का गठन हुआ और उसी के साथ, उसके द्वारा पहली बार पूर्ण स्वतन्त्रता की मांग की गयी और इसी के साथ स्वतन्त्रता के बाद के भारत के ढाँचे के बारे में बहस शुरू हुई।
इन सबने मिलकर दो बड़े प्रभाव डाले जिनमें से पहला था कांग्रेस और गांधी की समझौतावादी नीतियों से असहमति का मुखर होना, ज्यादा धारदार रास्ता अपनाने की मांग उठना। दूसरा था क्रातिकारी धारा का नया, विकसित चरण सामने आना। इनसे पहले के, वर्ष 1819 से 1913 तक के दौर की जुझारू धाराओं की सीमा यह थीं कि धर्म – हिन्दू धर्म – इसकी मुख्य प्रेरणा था।
आजादी को लेकर भी स्पष्ट समझ का अभाव था। बंगाल का शानदार अनुशीलन आन्दोलन और कुछ हद तक युगांतर इसके उदाहरण हैं। महाराष्ट्र में चाफेकर बन्धु सहित और भी कई समूह इसमें जोड़े जा सकते हैं। 20 वीं शताब्दी के पहले दो दशकों में हुए बदलावों के चलते तब तक के रोमांटिक दुस्साहसी रास्ते की बजाय वैज्ञानिक क्रांतिकारी रास्ता चुने जाने की स्थिति आ गयी : भगत सिंह इसके आइकॉन और अगुआ थे।
क्यों और कैसे बनी नौजवान भारत सभा
यह क्रांतिकारी रास्ता भी विकसित – इवोल्व – हो रहा था। 1923 में हिन्दुस्तान रिपब्लिकन आर्मी बन चुकी थी जो पांच वर्षों में ही एचआरए से होती हुई एचएसआरए ‘हिन्स्दुतान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ तक जा पहुंची।
तेजी से एक के बाद एक कार्यवाहियां हो रही थीं किन्तु इसी बीच काकोरी केस के बाद लगभग पूरे शीर्ष नेतृत्व की गिरफ्तारी और कठोर सजाओं के बाद यह विचार शुरू हुआ कि इस लड़ाई को जनता के साथ जुड़ाव के बिना सिर्फ सीमित क्रांतिकारी समूह के जरिये चलाना ठीक नहीं है। राय बनी कि जनता के बीच आधार बनाने के लिए ऐसे माध्यम तलाशे जाने चाहिए जो खुले हों, व्यापक भागीदारी वाले हों।
ऐसे मंच हों जिनमें गांधी और कांग्रेस की समझौतावादी नीतियों की आलोचना करते हुए क्रांतिकारी राजनीतिक कार्यक्रम के लिए सहानुभूति और प्रेरणा प्रदान करने वाले काम किये जा सकें। इसके लिए 1926 में लाहौर में नौजवान भारत सभा का गठन किया गया।
भगत सिंह, भगवती चरण बोहरा, नेशनल कॉलेज के रामचंद्र कपूर इसके सूत्रधारों में थे। धन्वन्तरी, एहसान इलाही, पिण्डीदास सोढ़ी इसके सहयोगियों थे। उस जमाने की कांग्रेस में वामपंथी रुझान वाले बड़े नेता डॉ सत्यपाल और डॉ सैफुद्दीन किचलू की इसके साथ खुली सहानुभूति थी। भगत सिंह इसके जनरल सेक्रेटरी और भगवती चरण बोहरा इसके प्रचार मंत्री बने। इसी के साथ भगत सिंह देश के दीगर प्रान्तों में भी इस संगठन को खड़ा करने के लिए निकल गये – शुरुआत उन्होंने पंजाब से दिल्ली होते हुए कानपुर से की।
बहुआयामी गतिविधियों से शुरुआत
इसकी गतिविधियों के आयाम भी इसी मकसद को ध्यान में रखते हुए तय किये गए। शुरुआत 18 वर्ष की उम्र में लाहौर षडयंत्र केस में हँसते-हँसते फांसी चढ़ जाने वाले क्रान्तिकारी करतार सिंह सराभा की याद में एक आयोजन से हुई।
उस दौर में भी सर उठा रही साम्प्रदायिकता और जाति के सवाल – जिन्हें भारत की जनता की एकता विभाजित करने के लिए अंग्रेज हुकूमत ठीक उसी तरह इस्तेमाल कर रही थी जिस तरह आज मोदी की अगुआई वाली हिंदुत्ववादी कारपोरेट सरकार कर रही है, को भी नौजवान सभा ने निशाने पर लिया।
सामाजिक साम्प्रदायिक एकता बनाने बढ़ाने के लिए सहभोजों की श्रृंखला शुरू हुई। हालांकि इनमें खिचड़ी या चना पुलाव और मठे के अलावा कुछ नहीं होता था – अगर जिस एकता को बनाना चाहते थे वह बनती थी । नया युवा जुड़ता जिनके साथ राजनीतिक संवाद आगे बढ़ता था। भगत सिंह और उनकी टीम इस मामले में सजग थी इसलिए ये आयोजन सर्वधर्म समभाव के कर्मकांडों में घटकर नहीं रह जाते थे।
इनमें अल्लाहो अकबर, सत श्रीअकाल और हर हर महादेव के नारे नहीं लगते थे ; इन्कलाब जिंदाबाद और साम्राज्यवाद मुर्दाबाद की ललकार गूंजा करती थी। इन्हीं के साथ अंधविश्वास और पोंगापंथ, कठमुल्लावाद और अंधश्रद्धा पर प्रहार करने वाले, कुरीतियों और अवैज्ञानिक नजरिये का खंडन करने वाले सार्वजनिक व्याख्यानो – सेमिनार्स – का भी आयोजन किया जाता था।
स्पष्ट समझ पर आधारित कारगर कार्यनीति
वे इस मामले में बहुत सचेत थे। अमृतसर में 1928 की 11, 12, 13 अप्रैल को नौजवान भारत सभा के घोषणापत्र में दर्ज किया गया कि “ आज हम महान रूस में विश्व के मुक्तिदाता के दर्शन कर सकते हैं। जबकि हम भारतवासी, हम क्या कर रहे हैं ?
पीपल की एक डाल टूटते ही हिन्दुओं की धार्मिक भावनाएँ चोटिल हो उठती हैं! बुतों को तोड़ने वाले मुसलमानों के ताजिये नामक कागज के बुत का कोना फटते ही अल्लाह का प्रकोप जाग उठता है और फिर वह ‘नापाक’ हिन्दुओं के खून से कम किसी वस्तु से सन्तुष्ट नहीं होता! मनुष्य को पशुओं से अधिक महत्त्व दिया जाना चाहिए, लेकिन यहाँ भारत में लोग पवित्र पशु के नाम पर एक-दूसरे का सिर फोड़ते हैं।“
यह घोषणापत्र भगत सिंह ने ही लिखा था – इसमें आगे कहा गया कि “धार्मिक अन्धविश्वास और कट्टरपन हमारी प्रगति में बहुत बड़े बाधक हैं। वे हमारे रास्ते के रोड़े साबित हुए हैं और हमें उनसे हर हालत में छुटकारा पा लेना चाहिए। ‘’जो चीज आजाद विचारों को बर्दाश्त नहीं कर सकती उसे समाप्त हो जाना चाहिए।’’
इसी प्रकार की और भी बहुत सी कमजोरियाँ हैं जिन पर हमें विजय पानी है। हिन्दुओं का दकियानूसीपन और कट्टरपन, मुसलमानों की धर्मान्धता तथा दूसरे देशों के प्रति लगाव और आम तौर पर सभी सम्प्रदायों के लोगों का संकुचित दृष्टिकोण आदि बातों का विदेशी शत्रु हमेशा लाभ उठाता है। इस काम के लिए सभी समुदायों के क्रान्तिकारी उत्साह वाले नौजवानों की आवश्यकता है।“
भारत की नौजवान सभा की आवाज भगत सिंह थे। नौजवान उनकी प्राथमिकता में सदा रहे। 19 अक्टूबर, 1929 को पंजाब विद्यार्थी सम्मेलन के लिए सेंट्रल जेल, लाहौर से भेजे पत्र में उन्होंने भारत की आज़ादी की लड़ाई में युवाओं और छात्रों की भूमिका पर ज़ोर दिया था।
उन्होंने लिखा कि “आज हमारा देश बहुत नाज़ुक दौर से गुजर रहा है। देश की समस्याओं के समाधान की जिम्मेदारी आज नौजवानों पर है। देश के नौजवान ही आज देश की बागडोर संभाल सकते हैं। हमें देश को एक नया जीवन देना है, और यह काम हम तभी कर सकते हैं जब हम एक क्रांतिकारी आंदोलन में भाग लेंगे। इतिहास इस बात का गवाह है कि किसी भी देश में क्रांति नौजवानों के बिना नहीं आ सकती। आज हमें जरूरत है कि हम गांव-गांव, कारखानों और झोपड़ियों में जाकर क्रांति की ज्वाला जलाएं। हमें लोगों को समझाना होगा कि वे अपनी गुलामी से बाहर निकलें।“
इसके अंत में उन्होंने कहा कि “आज हमें एक बड़ा आंदोलन खड़ा करने की जरूरत है। हमें किसानों और मजदूरों को संगठित करना होगा।“
बदलाव की लड़ाई में युवाओं की भूमिका
नौजवानों की भूमिका और महत्व को भगत सिंह पूरी तरह समझते थे – सिर्फ इसलिए नहीं कि वे स्वयं युवा थे बल्कि इसलिए कि वे दुनिया भर के आंदोलनों, संघर्षों, मुक्ति संग्रामो के बारे में जानते थे। इसलिए भी कि वे लड़ाई के बीच ही पढ़ाई करते हुए क्रांतिकारी बदलाव की वैज्ञानिक विचारधारा के न केवल संपर्क में आ चुके थे बल्कि उसे आत्मसात भी कर चुके थे।
उनका 2 फरवरी 1931 को लिखा ‘नवयुवक राजनीतिक कार्यकर्ताओं के नाम पत्र’ एक 23 वर्ष के युवा, जिसे सिर्फ 7 सप्ताह बाद फांसी पर चढ़ना था, की असाधारण स्पष्टता और निडरता का दस्तावेज है। इसमें वे इन्कलाब से उनका क्या आशय है उसे साफ़ करते हैं कि:
“क्रान्ति से हमारा अभिप्राय समाज की वर्तमान प्रणाली और वर्तमान संगठन को पूरी तरह उखाड़ फेंकना है। इस उद्देश्य के लिये हम पहले सरकार की ताक़त को अपने हाथ में लेना चाहते हैं। इस समय शासन की मशीन अमीरों के हाथ में है। सामान्य जनता के हितों की रक्षा के लिये तथा अपने आदर्शों को क्रियात्मक रूप देने के लिये – अर्थात् समाज का नये सिरे से संगठन कार्ल मार्क्स के सिद्धान्तों के अनुसार करने के लिये – हम सरकार की मशीन को अपने हाथ में लेना चाहते हैं। हम इस उद्देश्य के लिये लड़ रहे हैं। परन्तु इसके लिये साधारण जनता को शिक्षित करना चाहिए।“
उन्होंने लिखा है कि “हमारा लक्ष्य शासन-शक्ति को उन हाथों के सुपुर्द करना है, जिनका लक्ष्य समाजवाद हो। इसके लिये मज़दूरों और किसानों केा संगठित करना आवश्यक होगा, क्योंकि उन लोगों के लिये लार्ड रीडिंग या इरविन की जगह तेजबहादुर या पुरुषोत्तम दास ठाकुर दास के आ जाने से कोई भारी फ़र्क न पड़ सकेगा।“
इसे और साफ़ करते हुए वे कहते हैं कि “यदि देश की लड़ाई लड़नी हो, तो मज़दूरों, किसानों और सामान्य जनता को आगे लाना होगा, उन्हें लड़ाई के लिये संगठित करना होगा। नेता उन्हें आगे लाने के लिये अभी तक कुछ नहीं करते, न कर ही सकते हैं। इन किसानों को विदेशी हुकूमत के साथ-साथ भूमिपतियों और पूँजीपतियों के जुए से भी उद्धार पाना है ।“
इसी के साथ वे जोर देकर कहते हैं कि “हमें युवकों के लिये स्वाध्याय-मण्डल – स्टडी सर्कल्स – खोलने चाहिए। पैम्फ़लेटों और लीफ़लेटों, छोटी पुस्तकों, छोटे-छोटे पुस्तकालयों और लेक्चरों, बातचीत आदि से हमें अपने विचारों का सर्वत्र प्रचार करना चाहिए।“
नौजवान भारत सभा की निरंतरता में डीवायएफआई
इस तरह नौजवान भारत सभा सिर्फ अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति पाने तक के लिए महदूद संगठन नहीं था। यह भारत और उसकी मेहनतकश जनता की सम्पूर्ण मुक्ति, मानव समाज की सभी बेड़ियों से मुक्ति के प्रति समर्पित विचार पर आधारित संगठन था।
जाहिर सी बात है कि यदि लड़ाई उस मंजिल तक नहीं पहुंची तो उसे नए जोश और उत्साह के साथ आगे ले जाना ही एक रास्ता बचता है। पंजाब के ही लुधियाना में 1 से 3 नवम्बर 1980 को देश भर से आये युवा आन्दोलन के नेताओं ने, नए हालात में नई ऊर्जा और ताकत के साथ इसी काम को आगे ले जाने का मंसूबा बनाया। नौजवान भारत सभा की सोच, विचार, कुर्बानी के जज्बे और सांगठनिक समझ वाले संगठन भारत की जनवादी नौजवान सभा की स्थापना की।
यह निरंतरता सचमुच की निरंतरता थी। डीवायएफआई की स्थापना के इस सम्मेलन के मंच पर तीनों दिन नौजवान भारत सभा के संस्थापकों में से एक कामरेड पंडित किशोरी लाल देश भर से आये बाकी युवाओं के साथ लगातार बैठे रहे। ये वही किशोरी लाल थे जिन्हें जिस मुकदमे में भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु को फांसी की सजा सुनाई गयी थी उस केस में, उम्र कम होने की वजह से फांसी देने की बजाय आजीवन कारावास की सजा दी गयी थी।
लाहौर, मुल्तान और मोंटगोमरी की जेलों में सजा काटते हुए उन्होंने एचएसआरए के कैदियों की एतिहासिक भूख हड़ताल में भी भाग लिया। 5 साल जेल के अन्दर भी जेल – एक कोठरी में अलग से बंद रहने की – की सजा भी काटी थी । इसी दौरान वे कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बन गए और आजादी के बाद भी लड़ाई जारी रखी।
कुल मिलाकर 27 वर्ष जेल काटने वाले किशोरी लाल ने 1952 की शुरुआत में पुर्तगाल नियंत्रण वाले गोवा के मुक्ति आंदोलन में भाग लिया आख़िरी सांस तक वे सीपीएम के सदस्य रहे। शरीर अशक्त हो जाने के बाद भी वे पुस्तकालय का काम देखते रहे।
उनकी मौजूदगी में भारत की जनवादी नौजवान सभा की स्थापना लाहौर 1926 से लुधियाना 1980 होते हुए आज तक जारी एक ऐसी अनवरत यात्रा है जो उसी तरह से तब तक निरंतर चलती रहेगी जब तक कि मंजिल नहीं आ जाती।
(लेखक लुधियाना में हुए भारत की जनवादी नौजवान सभा के स्थापना सम्मेलन की पूर्व तैय्यारियों के लिए बनी संयोजन समिति के सदस्य के रूप में उसके संस्थापकों में से एक हैं। फिलहाल अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव एवं लोकजतन के सम्पादक हैं।)





