अम्बुज माहेश्वरी, रायसेन
आजाद भारत में तिरंगा फहराने पर युवाओं को पुलिस की गोलियों का सामना करना पड़ा था यह सुनकर आपको आथर्य जरूर होगा लेकिन जलियाँ वाला बाग गोलीकांड की तरह ही एक गोलीकांड रायसेन जिले के बौरास नर्मदा तट से जुड़ा हुआ है जहां 14 जनवरी 1949 को आजाद भारत में गुलाम भोपाल के दौर में मकर संक्रांति मेले के दौरान युवाओं की एक टोली वंदे मातरम गाते हुए तिरंगा फहराने आगे बढ़ रही थी तब नबाब भोपाल के इशारे पर थानेदार जाफर अली खान ने बंदूक से अंधाधुंध गोलियां चलाई चार युवा माँ नर्मदा की गोद में ही शहीद हो गए एक गम्भीर घायल हुआ लेकिन किसी ने भी हाथ से तिरंगा नहीं छूटने दिया। इस गोलीकांड से नबावकाल की अंतिम गिनती शुरू हुई अगले 4 महीने देश भर में चले विरोध प्रदर्शन के बाद नवाब को सत्ता से पकड़ ढीली हो गई और उसे भोपाल के भारत में विलय समझौते को स्वीकार करना पड़ा। नर्मदा तट पर बहे युवाओं के रक्त से भोपाल विलीनीकरण के आंदोलन में जो उबाल आया वो भोपाल की आजादी का अहम कारण बना। हर वर्ष 14 जनवरी मकर संक्रांति और 1 जून भोपाल विलय दिवस पर इन अमर शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है।
आंदोलन में ऊर्जा प्रवाहित करने हाथों में तिरंगा लेकर चल रहे थे युवकः भोपाल में भाई रतन कुमार गुप्ता केनेतृत्व में विलीनीकरण आंदोलन चल रहा था अनेक जगह शांतिपूर्वक आंदोलन करके भारत का राष्ट्रीय ध्वज फहराया जा रहा था 14 जनवरी 1949 को रायसेन जिले के बौरास में नर्मदा तट पर मकर सक्रांति का मेला भरा था यहां तिरंगा फहराने का निर्णय लिया और कई युवा तिरंगा फहराने आगे आए, थानेदार जाफर अली खान ने गोलियां चलाना शुरू कर दिया। चार युवा छोटे लाल, विशाल सिंह, धन सिंह
और मंगल सिंह वहीं शहीद हो गए लेकिन तिरंगा हाथ से नहीं छोड़ा, कालू राम की इलाज के दौरान बाद में मौत हो गई। घनश्याम दास मालानी और अनेक साथी गिरफ्तार कर लिए गए। मालानी परिवार के पास कई वर्ष पहले तक यह रक्तरंजित तिरंगा सुरक्षित रहा था।
गोलीकांड से नबाव काल की अंतिम गिनती हो गई थी शुरू: 15 अगस्त 1947 में देश आजाद होने के बाद भी भोपाल के आजाद न होने से विलीनीकरण आंदोलन चल रहे थे। बौरास में हुए इस घटनाक्रम ने आंदोलन की आग को देशभर में फैला दिया भोपाल नवाब के खिलाफ तीखे विरोध प्रदर्शन हुए। सरदार वल्लभभाई पटेल ने अपने सचिव वीपी मेनन को भोपाल भेजा। नवाब से कहा गया कि वे अपने प्रधानमंत्री का इस्तीफा लें। स्वतंत्र देश का सपना देख रहे भोपाल नवाब हमीदुल्ला खां की सत्ता से पकड़ ढीली होती चली गई और आखिरकार उन्हें भोपाल का भारत में विलय करने के समझौते पर हस्ताक्षर करने पड़े तब जाकर 1 जून 1949 को भोपाल भारत देश का हिस्सा बना।
गोली लगने के बाद भी तिरंगा नहीं गिरने दिया अंतिम सांसों तक थामे रहे:
अंतिम सांस तक शहीदों ने तिरंगे को जमीन पर नहीं गिरने दिया। उस समय के साक्षी रहे लोगों के अनुसार 25 वर्षीय धनसिंह जब वंदेमातरम गाते हुए तिरंगा फहराने जा रहा था, थानेदार जाफर ने उसे गीत गाने से मना किया। धनसिंह नहीं माने और तिरंगा फहराने के लिए आगे बढ़े, तो उन्हें गोली मार दी गई। धनसिंह के जमीन पर गिरने से पहले 16 साल के मंगल सिंह ने झंडा थाम लिया। मंगलसिंह को गोली लगी तो 25 वर्षीय विशाल ने झंडा थाम लिया इसके बाद जाफर अली ने विशाल को भी गोली मार दी। तिरंगा तीनों के खून से लथपथ हो चुका था और विशाल जमीन पर गिरता, इससे पहले उसने डंडे में से झंडा निकालकर अपनी जेब में रख लिया। इसके अलावा 25 वर्षीय विशाल सिंह और 45
साल के कालूराम को भी गोली लग चुकी थी। इनके साथी घनश्याम दास मालानी, नित्यगोपाल शर्मा, धनराज रघुवंशी आदि गिरफ्तार कर लिए गए। इस घटना के आठ दिन पहले ही बरेली में विलीनीकरण आंदोलन के दौरान ही एक लाठी चार्ज में 28 वर्षीय रामप्रसाद और 35 वर्षीय जुगराज शहीद हो गए थे।
डॉ शंकरदयाल शर्मा ने कहा था मुझे गर्व है में उस भूमि
का पुत्र हैं: वर्ष 1949 में ही पूर्व राष्ट्रपति एवं तत्कालीन लखनऊ विश्व विद्यालय के प्रोफेसर डॉ शंकरदयाल शर्मा ने लिखा था कि मुझे इस बात का गर्व है कि में उस भूमि का पुत्र हूँ जहाँ की जनता इतनी जागृत और निर्भीक है कि जहाँ के वीर बौरास का अदभुत दृश्य उपस्थित कर सकते है। उन्होंने यह भी लिखा था कि जहाँ की वीरांगनाओं ने बौरास के अमर शहीदों को जन्म दिया और इन शेरदिल इंसानों की जिंदा दिली को जरा भी जेल और डंडे की यातनाएं कम नहीं कर पाई। उल्लेखनीय है कि स्वर्गीय डॉ शंकरदयाल शर्मा की जन्मस्थली उदयपुरा के निकट स्तिथ ग्राम जेथारी है। डॉ शर्मा ने सन 1952 से 1965 तक मप्र विधानसभा में उदयपुरा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व भी किया था।
25 साल से रामपाल सिंह कर रहे सम्मानः
बीते 25सालों से पूर्व लोनिवि मंत्री रामपाल सिंह राजपूत संक्रांति के अवसर पर बौरास पहुँचकर गोलीकांड के शहीदों के परिजनों व विलीनीकरण के सेनानियों और उनके जीवित न होने पर परिजनों का सम्मान करते आ रहे है। यह बात अलग है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही सरकारें यहाँ अमर बलिदानियों के स्मृति में कुछ खास नहीं कर सकी है।
भुला बिसरा पृष्ठ बन रही यह महान आहुतिः
विलीनीकरण यज्ञ में बौरास की यह महान आहुतियाँ गौरवशाली अतीत का भुला बिसरा पृष्ठ बन गई है। इस शहीद स्थल पर ऐसा कुछ नहीं हो पाया है जो भावी पीढ़ियों को महान धरोहरों से परिचित कराने का दायित्व निभा सके। बौरास गोलीकांड का रक्त रंजित राष्ट्रध्वज भी एक वयोवृद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के निधन के बाद उनके परिजनों ने संभाल कर रखा है। युवा पीढ़ी को यह यश गाथा बताने के लिए स्वातन्त्र्य स्मारक आंदोलन समिति भोपाल आगे आई है।





