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माणकचंद कटारिया : सेवा, विचार और संयम का उजला अध्याय

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माणकचंद कटारिया जन्मशती स्‍मरण आयेाजन 14 दिंसबर पर

कुमार सिद्धार्थ,

गांधीवादी विचारक,चिंतक, लेखक, स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदार रहे इंदौर में 29 नवंबर 1925 को जन्मे माणकचंद कटारिया उन विरल व्यक्तित्वों में थे, जिनके जीवन में सेवा, विचार और संयम का ऐसा संतुलन दिखाई देता था, जो आज भी प्रेरक बना हुआ है। उनका जीवन जितना सरल, उतना ही गहन था। 29 अक्टूबर 1977 को उनका अवसान हुआ, जो यह एक ऐसे व्‍यक्ति का वियोग था, जिसकी शांत उपस्थिति हर कार्य, हर योजना और हर संवाद में महसूस की जाती थी।

उनके सार्वजनिक जीवन की शुरुआत बाल्यावस्था में हो गई थी। 1941 में वे वीर वाचनालय और प्रजामंडल से जुड़े। वह समय स्वतंत्रता आंदोलन का था और वाचनालय की अलमारियों में सत्य-साहित्य और क्रांतिकारी पुस्तकों की गूंज से युवा मनों की दिशा बदल रही थी। इन्हीं पुस्तकों ने उनके भीतर राष्ट्रधर्म और नैतिक चेतना की ज्योति जलाई। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में प्रतिबंधित साहित्य के प्रसार की जिम्मेदारी उठाना किसी बालक का कार्य नहीं था, पर उन्‍होंने इसे अपने स्वभावगत निर्भीक संयम के साथ निभाया। ‘करो या मरो’ के पर्चों और साइक्लोस्टाइल की गई पत्रिकाओं के साथ उनकी गिरफ्तारी इसी कर्मठता का परिणाम थी। रिहा होने के बाद भी उनका कार्य-जीवन वहीं से आगे बढ़ता रहा—शांत, निरंतर और उद्देश्यपूर्ण।

सन् 45 से 47 तक उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में एम.ए. किया। यह अध्ययन उनके भीतर एक ऐसी दृष्टि लेकर आया जिसने सत्ता के मार्ग को किनारे रखते हुए लोकनीति और समाज-सेवा के पथ को चुना। उन्हें ज्ञात था कि राजनीति के अवसर आकर्षक हो सकते हैं, पर समाज के भीतर जाकर बदलाव की राह खोजने में ही सच्चा अर्थ है। इसी विचार के साथ वे गांधीवादी चिंतन के निकट आए और संपादकीय कार्य को अपने जीवन का साधन बनाया। उन्‍होंने प्रजामंडल, लोक सेवक और कुछ समय के लिए दैनिक जागरण का संपादन गहन निष्ठा से किया। उनकी लेखनी में विचार की स्पष्टता, भाषा की सहजता और अनुभव की गहराई दिखाई देती थी।

इंदौर में जब बाल निकेतन संघ की स्थापना हुई तब प्रसिद्ध चिंतक और  इंदौर की राजनीति के सूत्रधारों में प्रमुख तात्‍या सहब सरवटे ने उन्हें बाल निकेतन संघ के कार्य मंडल में सम्मिलित किया।

उनके जीवन का सबसे व्यापक और निर्णायक अध्याय इंदौर स्थित कस्तूरबा गांधी राष्ट्रीय स्मारक ट्रस्ट में बीता। 1954 से 1976 तक उन्होंने ‘कस्तूरबा-दर्शन’ का संपादन किया। यह संपादन केवल पत्रिका के प्रबंधन का कार्य नहीं था; यह विचारों को आकार देने, संगठन की दिशा तय करने और गांधीवादी मूल्यों को समकालीन जीवन से जोड़ने का प्रयास था। कस्तूरबा-स्मारिका, ट्रस्ट की पच्चीस वर्षीय रिपोर्ट और साहित्यिक दिवाली अंकों में उनकी दृष्टि, भाषा और बौद्धिक अनुशासन स्पष्ट रूप से पहचाना जा सकता है। गांधी-दर्शन प्रदर्शनी के आयोजन में भी उनकी भूमिका रही।

ट्रस्ट की अनेक योजनाओं के निर्माण और क्रियान्वयन में उनका योगदान महत्वपूर्ण था। कस्तूरबाग्राम में आयोजित बड़े राष्ट्रीय सम्मेलनों का संयोजन, राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री सहित विभिन्न राज्यों के वरिष्ठ अतिथियों की व्यवस्था और ग्राम-उन्नति संबंधी योजनाओं की प्रस्तुति में उनकी संगठनात्मक दक्षता बार-बार सामने आती थी। भवन-निर्माण के निर्णयों में उनकी व्यावहारिक दृष्टि और ग्राम-जीवन की बारीकियों पर उनकी पकड़ कस्तूरबा ग्राम की संरचना में आज भी प्रमाण की तरह उपस्थित है।

समय के साथ उनका सेवा-क्षेत्र और भी विस्तृत हुआ और वे दिल्ली स्थित हरिजन सेवक संघ में सचिव की भूमिका में आए। हरिजन चेतना, समरसता एवं सुधार कार्यक्रमों में उन्होंने अपनी संपूर्ण ऊर्जा समर्पित की। इसी दौरान घनश्याम दास बिड़ला के अमूल्य संग्रह “बापू की प्रेम प्रसादी” के संपादन कार्य में सहयोग किया।

आज जब हम सार्वजनिक जीवन के दौरान माणकचंद कटारिया द्वारा लिखी दैनंदिनी डायरी को देखते है तो पाते है कि कोई साधारण व्यक्ति की निजी टिप्पणियाँ भर नहीं है, बल्कि स्वतंत्रता-संग्राम के दौर में एक सजग, संवेदनशील और चिंतनशील युवा मन की जीवंत दस्तावेज़ी गाथा है। उनके डायरी के पन्‍ने भारतीय इतिहास के उन दिनों के साक्षी है, जब राष्ट्र जाग रहा था, बदल रहा था और अपने भविष्य की खोज में संघर्षरत था।

उनकी डायरी का सबसे बड़ा मूल्य उनकी ईमानदार आत्मदृष्टि है। डायरी के पन्‍नों में कटारियाजी अपने भीतर की कमज़ोरियों, असफलताओं, संदेहों और द्वंद्वों को भी छिपाते नहीं है। वे बार-बार स्वयं से प्रश्न करते हैं “हम आज़ाद हैं तो फिर इतना रक्तपात क्यों?” यह प्रश्न केवल उस समय का नहीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी विचारणीय है। उनकी बेचैनी बताती है कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक जागरण भी है।

कटारियाजी की डायरी का एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष है उनका सक्रिय सार्वजनिक जीवन। इलाहाबाद में सत्याग्रह, छात्र-आंदोलनों, पुलिस दमन, नेताओं से संवाद ये सब डायरी को इतिहास के दस्तावेज़ के रूप में विश्वसनीय बनाते हैं। 1943 और 1946 के प्रसंग विशेष रूप से दर्शाते हैं कि एक युवा स्वतंत्रता आंदोलन को केवल समाचार की तरह नहीं देख रहा था, बल्कि उसका हिस्सा था।

डायरी में कटारियाजी जैन दर्शन, महावीर के सिद्धांतों, और व्यावहारिक जीवन के बीच की दूरी पर तीव्र आत्ममंथन करते हैं “यदि धर्म मनुष्य को आकार देता है, तो हम मंदिरों तक सीमित क्यों हों?” डायरी में उल्लिखित गांधीजी का 1946 का प्रसंग बताता है कि कटारियाजी के भीतर गांधी की करुणा, सत्य और विनम्रता के प्रति गहरा आकर्षण था।

लेखन कर्म की इसी श्रृंखला में “महावीर जीवन में?”  पुस्‍तक माणकचंद कटारिया की उस विशिष्ट लेख-शृंखला का संकलन है, जिसमें उन्होंने महावीर के अहिंसा धर्म, अनेकान्त, अपरिग्रह और सहअस्तित्व जैसे मूलभूत जैन सिद्धान्तों को केवल दार्शनिक अवधारणाओं के रूप में नहीं, बल्कि मानव-जीवन की व्यवहारिक आवश्यकताओं के रूप में समझाया है।

कटारिया जी के व्यक्तित्व को समझने में उनके समकालीनों के उद्गार अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ‘मालवा के गांधी’ के नाम से ख्‍यात काशीनाथ त्रिवेदी ने उनकी स्मृतियों को एक ऐसी अमर धरोहर बताया है जिसे न कोई चुरा सकता है, न मिटा सकता है। त्रिवेदी जी लिखते हैं कि उनकी मिठास, उनकी सरलता और मन को सुख देने वाली उनकी उपस्थिति आज भी आत्मिक आश्वासन देती है। बनवारीलाल चौधरी ने उन्हें मक्खन-सी मृदुल और फौलाद-सी दृढ़ता का अद्वितीय संगम कहा है। चौधरीजी का मानना था कि निर्भीकता उनका सहज स्वभाव था और विरोधी गुणों को साथ लेकर चल पाने की क्षमता उनके भीतर विलक्षण थी। लक्ष्मी एन. मेनन ने उन्हें श्यामलालजी के साथ इतना एकाकार पाया कि लोगों के लिए यह समझना कठिन हो जाता था कि किसकी पहचान कहाँ समाप्त होकर किससे जुड़ जाती है।

ये वर्ष माणकचंद कटारिया का जन्मशताब्‍दी वर्ष है। इस मौके पर  जब हम उनके जीवन और कृतित्व को देखते हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि सच्चा कार्य न कभी घोषणाओं में बसता है, न प्रशस्तियों में। वह अपने शांत प्रभाव, निर्मल दृष्टि और सतत कर्म के माध्यम से समाज में परिवर्तन लाता है। कटारिया जी का समर्पण, उनकी नैतिक सहजता, उनका लेखन और उनका संगठन–कौशल इसी प्रकार की उजली परंपरा के हिस्से रहे हैं। उनका स्मरण केवल श्रद्धा का भाव नहीं, बल्कि प्रेरणा का आह्वान है उस रास्‍ते पर चलने का जिसे उन्होंने शांतिपूर्वक, धैर्यपूर्वक और पूरी निष्ठा से जिया।

कुमार सिद्धार्थपिछले चार दशक से पत्रकारिता और सामाजिक विकास के क्षेत्र में सक्रिय है। आप शिक्षापर्यावरणसामाजिक आयामों पर देशभर के विभिन्‍न अखबारों में लिखते रहते हैं।

Ramswaroop Mantri

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