*बेदेही ज्योतिष परामर्श केंद्र की प्रमुख पूजा अग्निहोत्री दुबे*
ज्योतिष विज्ञान है और इसे जानने वाले देश के कोने-कोने में फेले हुए हैं । इंदौर में भी कई विद्वान ज्योतिषी है तथा वे अपने-अपने तरीके से देश दुनिया और लोगों के भविष्य को बाचने का काम करते हैं । इन्हीं में से एक है पूजा अग्निहोत्री दुबे। बेदेही ज्योतिष परामर्श केंद्र की प्रमुख पूजा अग्निहोत्री दुबे का गणितीय और फलित ज्योतिष देखने का अपना तरीका है उनका कहना है कि
भारत एक प्रभुत्व संपन्न लोकतांत्रिक गणराज्य है। यहां पर विभिन्न प्रकार की संस्कृति भाषा शैली वेशभूषा एवं अनेक प्रकार के धर्म के लोग एक साथ निवास करते हैं ।इस प्रकार अनेकता में एकता भारतवर्ष की सबसे बड़ी विशेषता है । भारत का प्राचीन नाम आर्यावर्त है इसे हिंदुस्तान एवं इंडिया भी कहते हैं। आर्यावर्त की उत्तर दिशा में स्थित हिमालय इसके मस्तक पर मुकुट की भांति शोभायमन है एवं दक्षिण दिशा में स्थित विशालकाय समंदर निरंतर इसके चरणों को पखारता है अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य से युक्त आर्यावर्त के विशाल अभ्यारण में विभिन्न प्रकार की प्रजाति के पशु पक्षी निरंतर ही इसके आकर्षण मे वृद्धि करते रहते हैं। यहां के वन प्रदेशों में विशालकाय वृक्षों की मूकबद्ध एवं क्रमबद्ध पंक्तियां किसी साधनारत साधु की साधना का स्मरण कराती हुई प्रतीत होती हैं चंद्रिका चर्चित यामिनी की इस स्तब्ध निशा में समूचे आर्यावर्त का सौंदर्य देवताओं को भी यहां आने के लिए लालायित एवं विवश कर देता है ।समूची पृथ्वी पर आर्यावर्त एक महान आध्यात्मिक भूखंड है इसकी पूर्व दिशा में स्थित जगन्नाथ पुरी पश्चिम दिशा में स्थित द्वारिका पुरी दक्षिण दिशा में स्थित रामेश्वरम उत्तर दिशा में स्थित केदारनाथ बद्रीनाथ ऋषिकेश गंगोत्री एवं यमुनोत्री से उत्सर्जित ऊर्जा आर्यावर्त को परम आध्यात्मिकता से परिपूर्ण कर देती है । यहां से उच्चारित मंत्रों एवं श्लोकों की ध्वनि से आर्यावर्त का वातावरण महान अलौकिकता से परिपूर्ण हो जाता है । एवं देवलोक के वातावरण को भी संकुचित करता है । यहां कैलाश पर्वत से निकली हुई गंगा यमुना सरस्वती कृष्ण कावेरी मंदाकिनी गोदावरी शिप्रा नर्मदा आदि कल कल ध्वनि करती हुई तीव्र वेग से विभिन्न अभ्यारणों को पर करती हुई बंगाल की खाड़ी में समा जाती हैं। सुंदर सरोवरों एवं नदियों का समूह विभिन्न अभ्यारणों एवं अरंड प्रदेशों को प्रबल आकर्षण से समृद्ध कर देता है। प्रायः आर्यावर्त के अलौकिक सौंदर्य को देवता भी अपनी मधुर वाणी में गायन करते नहीं थकते। इस प्रकार हमारा आर्यावर्त में जन्म लेना तथा यहां पालित एवं पोषित होना एवं विचरण करना तप करना और अंत में समाधि को प्राप्त कर लेना हमारे आर्यावर्त में ही संभव है।
पूजा अग्निहोत्री दुबे रहती है कि संसार मैं सबसे कठिन कार्य ज्योतिष धारण कर लेना है अर्थात आने वाली समय को देख लेना एवं जनमानस को सावधान कर देना हां यह बात अलग है की क्षेत्र अगर छोटा है तो हम उसे क्षेत्र विशेष के लोगों को ही जानकारी देकर सावधान कर पाएंगे और क्षेत्र अगर वृहद है तब बड़ी मात्रा में जनमानस को सावधान किया जा सकता है,।
वह कहती है कि ज्योतिष के इतिहास की क्या बात करें वह तो आदिकाल से ही है विश्वामित्र वशिष्ठ वाल्मीकि परशुराम अत्रि अनसूईया भृगु पारासर दुर्वासा गौतम अगस्तय द्वापर में भी संदीपनी आदि ऋषि काल की गति को पढ़ना जानते थे एवं भविष्य को देख सकते की क्षमता उनमें विद्यमान थी। वे महान वैज्ञानिक थे। भूत भविष्य वर्तमान सब कुछ उनके समक्ष होता था। समय ही उन्हें नतमस्तक होता था। बाद में वराह मिहिर, आर्यभट्ट आदि ने भी इसमें सिद्ध हस्तता प्राप्त की पृथ्वी पर निरंतर हर समय ज्योतिष की बड़ी-बड़ी विभूतियां समय-समय पर उपस्थित रही हैं। हां यह बात अलग है की कुछ पर्दे पर स्क्रीन पर आ गई और कुछ पर्दे के पीछे ही रह गई।
अपने बारे में बताते हुए कहती हैं किमेरे दादाजी अपने समय एवं अपने क्षेत्र के विशिष्ट ज्योतिषि रहे हैं। मेरे दादाजी को राम रक्षा स्त्रोत सिद्ध था। उनके बाद उनके पांच पुत्र जो ज्योतिष के ही विभिन्न अंगों से जुड़े हुए थे। कोई कर्मकांड में पारंगत था। कोई हस्तरेखा में। कोई यज्ञ एवं भागवत की विधा में। और मेरे पिताजी ज्योतिष में जन्म पत्रिका के फलादेश मैं पारंगत रहे । उन्होंने कुंडली के अष्टम भाव पर शोध किया था। वह गणित विषय में मास्टर ऑफ साइंस की डिग्री एवं बैचलर आफ एजुकेशन की डिग्री प्राप्त करके शिक्षा विभाग में व्याख्याता के पदपर रहे।वह नियमित राम रक्षा स्त्रोत का पाठ करते थे ।मेरी माता भी ज्योतिष का विशिष्ट ज्ञान रखती थी। एवं भगवान शंकर की उपासक थी। उन्होंने मुझे बहुत ही छोटी सी उम्र में सर्वप्रथम शिव चालीसा का पाठ करना सिखाया । जैसे-जैसे मैं बड़ी होने लगी मैंने पापा जी को राम रक्षा स्त्रोत के ध्यान में देखा। तब मैंने भी 11वीं कक्षा से राम रक्षा स्त्रोत का पाठ नियमित करना प्रारंभ किया। एक दिन सुबह का समय था तभी एक व्यक्ति ने हमारे घर का दरवाजा खटखटाया सुबह के 6:00 थे मैंने उठकर दरवाजा खोला। क्योंकि वह देहाती क्षेत्र था तो उसे व्यक्ति ने देहाती लहजे में ही मुझसे कहा की महाराज कहां है मैं अंदर जाकर पापा को उठाया पापा उठकर आंखें मलते हुए उस व्यक्ति से बैठने के लिए बोलकर और मुझे चाय बनाने के लिए कहकर मुंह हाथ धोने चले गए जब मैं चाय बनाकर लेकरआई तब मैंने देखा आपा पंचांग लिए हुए उसे व्यक्ति को बोल रहे हैं कि इस बच्चे से ज्यादा मोह मत करना इसका जीवन पृथ्वी पर आंशिक ही है उनके कहने का अभिप्राय था कि वह बच्चा बहुत ही कम समय के लिए पृथ्वी पर हैं मैंने चाय टेबल पर रखी तभी वह व्यक्ति मेरे पापा से कहने लगा की महाराज मुझे इस बच्चे से कोई मोह नहीं रहा मैं तो उसे दफन भी करके आ गया हूं आपसे मैं आगे क्या क्रियाविधि करना है उसके लिए पंचांग दिखाने आया हूं। सो महाराज मुझे बताएं। दरअसल उस व्यक्ति के यहां बालक का जन्म हुआ था और कुछ समय बाद वह काल कवलित हो गया। तो उसके बाद नियम अनुसार क्या करना चाहिए यह पूछने के लिए वह आया था। खैर पापा ने उसे आगे की क्रियाविधि बतला कर रवाना किया। और उसी क्षण में अत्यधिक आश्चर्य में पड़ गई मैं बस यही सोचे जा रही थी कि पापा जी को यह बात पंचांग से कैसे पता लग गई और मैं उनसे पूछने लगी तब उन्होंने मुझे उसके बारे में थोड़ी चर्चा की तब मैंने निश्चय किया कि मैं ज्योतिष को ही अपना विशेष विषय बनाऊंगी उसे समय में कक्षा ग्यारहवीं में गणित की छात्रा थी फिर मैं ने आगे मास्टर ऑफ साइंस मैथमेटिक्स किया और बैचलर ऑफ़ एजुकेशन किया पर विशेष अध्ययन मेरा ज्योतिष में ही रहा क्योंकि मेरी माता जी भी ज्योतिष शास्त्र की ज्ञाता थी इसलिए उन्होंने 11वीं कक्षा से ही मुझे कुंडली का चक्र बनाना सिखाए क्योंकि घर में सभी प्रकार के धार्मिक पुस्तकें उपलब्ध थी माता एवं पिता को अध्ययन का ही विशेष शौक था इसलिए भ्रगुसंहिता पराशर संहिता व्रहद संहिता आदि के सतत अध्ययन से मैं ज्योतिष में आगे बढ़ना शुरू किया। और और जन्म पत्रिका के नवम भाव पर विशेष उपलब्धि प्राप्त की। तुलसी पत्र खाकर 16 सोमवार एवं शिवलिंग के समक्ष रामचरितमानस के पाठ एवं नियमित राम रक्षा स्त्रोत के पाठ से भगवान की विशेष कृपा हुई। मैं 1993 से ज्योतिष में प्रवेश किया था। इस प्रकार गहन अध्ययन की स्थिति 96 से प्रारंभ हुई। लगभग 27 वर्षों से मैं ज्योतिष के क्षेत्र में कार्य कर रही हूं। क्योंकि मेरा एमएससी गणित विषय सी रहा दर्शन एवं तत्व विज्ञान के विशेष अध्ययन से एवं रामरक्षा स्त्रोत के नियमित पाठसे होरोस्कोप में मेरा कैलकुलेशन एवं रिजल्ट्स एक्यूरेट आते हैं।
मैं जहां-जहां पर रही हूं निरंतर उस क्षेत्र में ज्योतिष के कार्य से मात्र जन कल्याण की भावना से ज्योतिष के कार्य संपादित करती रही हूं। मैं गवर्नमेंट टीचर भी हूं और नौ से 12 तक अध्यापन कराती हूं। मैंने शाहरी एवं देहाती दोनों क्षेत्रों में अध्यापन एवं ज्योतिष के कार्यों को संपादित किया है मैं ज्योतिष के क्षेत्र में अथक श्रम किया है रात्रि के 8:00 बजे अध्ययन के लिए बैठी तो सुबह की 8:00 बज गए रात्रि ऐसा लगा जैसे 1 घंटे में ही बीत गई हो। मेरे माता-पिता जो मेरे गुरु हैं उनके आशीर्वाद एवं निरंतर अथक श्रम करके ज्योतिष के गहन अध्ययन को किया। मेरे पति खाद बीज की कंपनी में उच्च पद पर कार्यरत हैं एवं में एक बेटी और एक बेटी की मां भी हूं। मेरी दोनों बच्चे गणित विषय को लेकर ही आगे बढ़ रहे हैं एवं ज्योतिष को दोनों ने हीं मुख्य विषय बनाया है। ज्योतिष में मुख्य विषय गणित होता है गणित के बिना ज्योतिष की कल्पना भी नहीं की जा सकती। परंतु ज्योतिष शास्त्र में संसार के सभी विषय आ जाते हैं कोई भी एक विषय कमजोर रह जाए तो ज्योतिष पूर्णता प्राप्त नहीं करता यह निरंतर चलते रहने वाला विषय है इसका आदि एवं अंत नहीं है।
ज्योतिष का क्रम में कुछ इस प्रकार से रखती हूं। गणित संस्कृत ज्योतिष दर्शन तत्व विज्ञान,अध्यात्म एवं ध्यान। इन सभी विषयों में परिपक्वता चाहिए। तभी आप एक सफल ज्योतिषि कहलाएंगे।





