5 मई राष्ट्रीय न्यूनतम मजदूरी दिवस और
20 मई 2025 की राष्ट्रव्यापी हड़ताल ऐतिहासिक बनाएं
“अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस“ हर साल 1 मई
को मनाया जाता है। इसका ऐतिहासिक महत्व मजदूर
आंदोलनों और श्रमिक अधिकारों की लड़ाई से जुड़ा
है। इसकी शुरूआत 19वीं सदी के अंत में हुई, जब
औद्योगिक क्रांति के दौरान श्रमिकों को अमानवीय
परिस्थितियों, लंबे कार्य घंटों ;12 से 16 घंटेद्ध, कम
वेतन और असुरक्षित कार्यस्थलों का सामना करना
पड़ता था।
मई दिवस की नींव
अमेरिका के शिकागो शहर में 1886 में मजदूरों की
हड़ताल से पड़ी। मजदूर 8 घंटे के कार्यदिवस की
मांग कर रहे थे। 4 मई को ‘हे मार्केट’ चौक पर एक
शांतिपूर्ण रैली के दौरान साजिश के तहत बम विस्फोट
कराया गया और पुलिस कार्रवाई में कई लोग मारे गए।
अमेरिका के उद्योगपतियों ने सत्ता सहमेल से
शिकागो के मजदूर आंदोलन के नेताओं को झूठे
आरोपों में गिरफ्तार कराकर फांसी एवं जेल की
अमानवीय सजा दिलायी। बाद में अमेरिकी कोर्ट ने
भी स्वीकार किया कि केस झूठे थे।
1889 में पेरिस में आयोजित द्वितीय कम्युनिस्ट
इंटरनेशनल की बैठक में, 1 मई को अंतरराष्ट्रीय
मजदूर दिवस के रूप में मनाने का प्रस्ताव पारित
हुआ, ताकि शिकागो के अमर शहीदों को श्र(ांजलि
दी जाए और मजदूरों के अधिकारों के लिए वैश्विक
एकजुटता दिखाई जाए।
20वीं सदी में, मई दिवस दुनिया भर में मजदूरों
के संघर्ष, एकता, आर्थिक और सामाजिक न्याय की मांग
का प्रतीक बन गया। कई देशों में और भारत के कई राज्यों में इसे सार्वजनिक
अवकाश घोषित किया गया है।
मई दिवस न केवल मजदूरों के ऐतिहासिक संघर्षों की याद दिलाता है,
बल्कि श्रमिक अधिकारों, सामाजिक समानता और आर्थिक न्याय के लिए
निरंतर लड़ाई का भी प्रतीक है।
आज के वैश्विक परिदृश्य में मजदूर वर्ग कई जटिल चुनौतियों का सामना
कर रहा है। ये चुनौतियां अकूत मुनाफे की लालच के साथ तकनीकी, आर्थिक,
सामाजिक और पर्यावरणीय परिवर्तनों से उत्पन्न हुई हैं।
1917 में संपन्न महान अक्टूबर क्रांति के बाद दुनिया में बदली विश्व
व्यवस्था की स्थिति में वैश्विक स्तर पर मजदूरों को कानूनी श्रम अधिकार
मिले। अंतर्राष्ट्रीय श्रम मानक बनाया गया। रूसी क्रांति से घबराकर अंतर्राष्ट्रीय
श्रम संगठन 1919 में बना। प्रथम वैश्विक कन्वेंशन में 8 घंटा का कार्यकाल निर्धारित किया गया। अक्टूबर क्रांति के बाद दुनिया के पूंजीपतियों में व्याप्त दहशत की पृष्ठभूमि में श्रम क्षेत्र में मानक निर्धारण के लिए त्रिपक्षीय फोरम आईएलओ ;जो आज संयुक्त राष्ट्र संघ की मान्यता
प्राप्त संगठन हैद्ध का गठन किया गया। उसमें सरकार, नियोजकों और श्रमिक प्रतिनिधि बराबर की संख्या में प्रति वर्ष अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन कर मजदूरों के वैश्विक मुद्दे पर विमर्श कर, अंतर्राष्ट्रीय श्रम मानक
बनाते हैं और उसके कार्यान्वयन तथा उल्लंघन पर
विमर्श कर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर निर्णय लिया जाता
रहा है। परंतु नब्बे के दशक में सोवियत संघ के पतन
के बाद बने एकध्रुवीय विश्व में वैश्विक पूंजीपति
निरंकुश ढंग से श्रम अधिकारों पर हमले कर रहे
हैं और अपने ही बनाए बाध्यकारी श्रम मानकों का
खुलेआम उल्लंघन कर रहे हैं। विश्व बाजार पर कब्जा
और अकूत मुनाफे तथा वित्तीय पूंजी के वर्चस्व के
लिए नब्बे के दशक में शुरू वैश्वीकरण, उदारीकरण
और निजीकरण की नीति पर समझौता कर सामाजिक सरोकार, कल्याणकारी दृष्टिकोण और श्रम अधिकारों का सम्मान को तिलांजलि दे दिया गया है। मुनाफे के लिए अमानवीय और एकतरफा पूंजीवादी वर्चस्व की कार्रवाई को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसे स्थायित्व देने हेतु दुनिया में विकसित हो रहे चौथी पाचवीं पीढ़ी की तकनीकी क्रांति, डिजिटल तकनीक, एआईं, जिसका स्वामित्व पूंजीपतियों के हाथ में है, का भी मजदूर आंदोलन को कमजोर करने एवं दबाने में उपयोग किया जा रहा है।
प्रस्ताव पारित
हुआ, ताकि शिकागो के अमर शहीदों को श्र(ांजलि
दी जाए और मजदूरों के अधिकारों के लिए वैश्विक
एकजुटता दिखाई जाए।
20वीं सदी में, मई दिवस दुनिया भर में मजदूरों
के संघर्ष, एकता, आर्थिक और सामाजिक न्याय की मांग
का प्रतीक बन गया। कई देशों में और भारत के कई राज्यों में इसे सार्वजनिक
अवकाश घोषित किया गया है।
मई दिवस न केवल मजदूरों के ऐतिहासिक संघर्षों की याद दिलाता है,
बल्कि श्रमिक अधिकारों, सामाजिक समानता और आर्थिक न्याय के लिए
निरंतर लड़ाई का भी प्रतीक है।
आज के वैश्विक परिदृश्य में मजदूर वर्ग कई जटिल चुनौतियों का सामना
कर रहा है। ये चुनौतियां अकूत मुनाफे की लालच के साथ तकनीकी, आर्थिक,
सामाजिक और पर्यावरणीय परिवर्तनों से उत्पन्न हुई हैं।
1917 में संपन्न महान अक्टूबर क्रांति के बाद दुनिया में बदली विश्व
व्यवस्था की स्थिति में वैश्विक स्तर पर मजदूरों को कानूनी श्रम अधिकार
मिले। अंतर्राष्ट्रीय श्रम मानक बनाया गया। रूसी क्रांति से घबराकर अंतर्राष्ट्रीय
श्रम संगठन 1919 में बना। प्रथम वैश्विक कन्वेंशन में 8 घंटा का कार्यकाल
निर्धारित किया गया। अक्टूबर क्रांति के बाद दुनिया
के पूंजीपतियों में व्याप्त दहशत की पृष्ठभूमि में श्रम
क्षेत्र में मानक निर्धारण के लिए त्रिपक्षीय फोरम
आईएलओ ;जो आज संयुक्त राष्ट्र
मजदूरों को महंगाई के हिसाब से न्यूनतम वेतन निर्धारण नहीं किया जा
रहा है और निर्धारित न्यूनतम वेतन का भी भुगतान नहीं हो रहा है। देश के
ट्रेड यूनियनों की मां एटक ने उसके विरु( मई दिवस के बाद 5 मई को, जो
महान दार्शनिक कार्ल मार्क्स का जन्मदिन है, को राष्ट्रीय न्यूनतम मजदूरी
दिवस के रूप में आयोजन कर न्यूनतम मजदूरी की भुगतान की गारंटी हेतु
संगठित विरोध का आयोजन का आवाहन किया है।
इसी तरह भारत में श्रम अधिकारों पर हमले के विरु( देश के दस केंद्रीय
श्रम संगठनों और स्वतंत्र सेक्टोरल फेडरेशनों द्वारा, सरकार और नियोजकों
के सहमेल से समाप्त किए गए 29 श्रम कानूनों के बाद विधायी प्रक्रिया को
ठेंगा दिखा संसद तक में विमर्श के बिना कोविड काल में संसद में स्वीकृत
कराकर बनाया गया चार मजदूर विरोधी श्रम संहिताओं को निरस्त करने
सहित 17 सूत्री मांगों के पक्ष में 20 मई को राष्ट्रव्यापी हड़ताल का आवाहन
किया गया है। यह सुखद संयोग है कि देश के किसानों का संयुक्त मंच,
संयुक्त किसान मोर्चा और ग्रामीण क्षेत्र के मजदूरों और कृषि संगठनों ने इस
हड़ताल का समर्थन करते हुए एक व्यापक जनगोलबंदी सृजित किया है।
2025 का मई दिवस के अवसर पर देश दुनिया के मेहनतकशों का
अभिनंदन के साथ दुनिया और खास कर भारत में उत्पन्न अभूतपूर्व खतरनाक
एवं अनंत चुनौतियों से रूबरू होते हुए उससे निपटने का संकल्प लेने का दिन है।
जैसा कि हम रोज व रोज देख रहे हैं कि भारत में संपूर्ण संवैधानिक,
जनतांत्रिक और न्यायिक प्रणाली, जो देश की आजादी के बाद स्थापित की गई,
उसके जड़ मूल पर हमले हो रहे हैं। सत्ता में पहुंची अशिष्ट एवं दंभी शक्तियां,
जो स्वतंत्रता आंदोलन में अंग्रेजों के पक्ष में दलाली किया करती थी, आज
आजाद भारत का स्वर्णिम संविधान और सर्वोच्च न्यायालय तक को भी खुली
चुनौती दे रही है। देश का संवैधानिक जनतांत्रिक आत्मा आज भयाक्रांत है।
वैसे तो विगत 10-11वर्षों से संवैधानिक, न्यायिक, विधायी और जनतांत्रिक
मूल्यों पर निरंतर हमले जारी हैं पर हाल की कुछ घटनाएं, खासकर सर्वोच्च
न्यायालय के दो-तीन ऐतिहासिक फैसलों पर सत्ताधारी दल का मोदी चहेता
एक सांसद द्वारा यह कहा जाना कि सर्वोच्च न्यायालय देश में धार्मिक और
गृह यु( फैलाना चाहता है एक बेहद खतरनाक संकेत है। इतना ही नहीं देश
के संवैधानिक पद पर बैठा राज्यसभा का सभापति और उपराष्ट्रपति धनखड़
द्वारा अपने पद की मर्यादा और संवैधानिक नैतिकता का मर्दन करते हुए
सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ संविधान में वर्णित अनुच्छेद 142 जो
सर्वोच्च न्यायालय को विशेषाधिकार देता है, को ‘न्युक्लियर मिसाइल’ कहते
हुए खतरनाक टिप्पणियां की। सत्तारूढ़ दल की सोशल मीडिया में ट्रोल सेना
द्वारा सर्वोच्च न्यायालय पर आक्रामक ट्रोलिंग, देश के संवैधानिक मर्यादा और
जनतांत्रिक तथा नैतिक मूल्यों पर अपूर्व खतरा पैदा कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट
द्वारा बुलडोजर न्याय के विरू( आदेश एवं प्रयागराज-महाराष्ट्र पर जुर्माना,
तमिलनाडू के राज्यपाल द्वारा विधान सभा के विधेयक को वर्षों तक रोक रखने
को अवैध करार देकर तीन माह की समय सीमा निर्धारण में राष्ट्रपति को भी
शामिल करने और देश में धार्मिक ध्रुवीकरण हेतु संवैधानिक प्रावधानों के विरू(
स्वीकृत वक्फ विधेयक के प्रावधानों पर रोक के बाद भाजपा सांसद निशिकांत
दूबे का सर्वोच्च न्यायलय पर देश में धर्मयु( भड़काने का आरोप 11 वर्ष के
सत्ता की मदहोशी एवं खुला फासिज्म का प्रतीक है। देश में जनतंत्र, नागरिक
आजादी, धार्मिक और संवैधानिक अधिकार पर अपूर्ण खतरा मंडरा रहा है। ऐसी
स्थिति में देश के शोषित पीड़ित जन-गण, मजदूर, किसान, बेरोजगार, छात्र,
नौजवान और एक-एक मानवतावादी बु(िजीवी और राष्ट्र प्रेमी शक्तियों का
फौरी दायित्व है कि संविधान, संसदीय जनतंत्र, न्यायिक प्रणाली और जनतंत्र
का चौथा स्तंभ पत्रकारिता ;जो आज संपूर्ण रूप से सत्ता के अधीन हो चुका
हैद्ध और अभिव्यक्ति की आजादी की रक्षा के लिए व्यापक जनगोलबंदी कर
फासिस्ट शक्तियों को सत्ता से हटाने का सामूहिक अभियान शुरू किया जाए।
देश में सदियों से स्थापित सहिष्णुता वाली बहुआयामी धार्मिक प्रवृत्तियां
एवं साझी सांस्कृतिक विरासत पर भी अपूर्व खतरा पैदा हो गया है। धर्म की
आत्मा दया, करूणा और परोपकारी प्रवृत्ति और सहृदयता, सदासयता के मूल
पर सत्ता संपोषित और संरक्षित शक्तियों का निरंतर सतत प्रहार, धर्म और
धार्मिक मूल तत्व तक को विनष्ट करने पर तुला है। इसलिए मई दिवस 2025
के मौके पर अपने अधिकारों की रक्षा के साथ संविधान, जनतंत्र, संसदीय
प्रणाली, मानवाधिकार के साथ-साथ धर्म के मूल तत्वों और वसूलों की रक्षा
के लिए भी संघर्ष को विकसित करने में आगे आने का संकल्प का दिवस के
रूप में आयोजित किया जाना चाहिए।
हमारे देश की महान विरासत, साझी संस्कृति, सर्वधर्म समभाव का श्लोक “अयं निजं परंवेती गणना लघुचेतशाम, उदार चरितानाम वसुधैव कुटुंबकम“
अर्थात यह मेरा है वह तेरा है की गिनती करने वाले नीच लोग होते हैं, उदार चरित्र वाले तो वह है जो दुनिया को परिवार मानते हैं, का न सिर्फ स्मरण या
जाप करें बल्कि इस धर्म उपदेश के दुश्मनों को, जो धर्म के नाम पर घृणा फैलाता है और गंदे राजनीतिक और भ्रष्ट आर्थिक हित यानी अपने चहेतों को भ्रष्ट तरीके से देश एवं जनता की सारी संपत्ति एवं धन सौंप देने हेतु सत्ता पर बने रहना चाहता है, उसे देश हित, जन हित और धर्म हित में सत्ताच्युत करने के लिए संकल्प लेकर आगे बढ़ने का निश्चय करें।
मई दिवस अमर रहे!20 मई की हड़ताल सफल करें!





