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मई दिवस की रस्म अदायगी

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राकेश श्रीवास्तव

हो
मार्क्स ने मजदूरों के लिए आह्वान किया था कि दुनिया के मजदूरों एक हो।पर आज के समय मे लगता है कि मजदूर तो शायद उनकी बात नहीं मान रहे हैं परन्तु अन्य वर्ग अवश्य मान रहे हैं।श्रमिक वर्ग के विरुद्ध संघर्ष मे दुनिया के पूंजीपति एक हो गये हैं।उद्योगपति एक हो गये हैं।सरकारें एक हो गईं हैं। राजनैतिक दल एक हो गये हैं।ठेकेदार एक हो गये हैं।यहां तक कि उनके हितों की लड़ाई लड़ने वाले भी एक हो गये हैं।

यह बात बार बार दोहराते रहने से कोई लाभ नहीं होने वाला है कि यह दिन अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर दिवस के तौर पर मनाया जाता है।यह सत्य तो है पर उसी तरह अपनी करेंसी खोता जा रहा है जैसे कि यह कहना कि सार्वजनिक जीवन मे रहने वालों को शुचिता का पालन करना चाहिए।अब गलत संसाधनों के प्रयोग को सही सिद्ध करने के लिए गीता, रामायण, कुरान, बाइबल इत्यादि धर्मग्रंथों तक की बातों को अपनी सुविधानुसार तोड़ मरोड़ लिया जाना ही चतुराई समझा जाता है।

आज मई दिवस के समारोहों मे मजदूरों, कामगारों, मेहनतकशों की भलाई के संकल्पों के लिए अनेकानेक कार्यक्रम आयोजित किए जायेंगे। बड़े बड़े वादे किए जायेंगे। उनकी बेहतरी की लड़ाई की कसमें खाने का भी दस्तूर है।यह बडे-बडे आयोजन आलीशान हालों,पंडालों और पांच सितारा होटलों मे उनके शोषण को खत्म करने की ब्ल्यू प्रिंट बनायेंगे, कार्ययोजनायें बनेंगी और परिवर्तनकारी घोषणाएं होंगी।अन्त में चाय नाश्ते के साथ या हाई टी और कहीं कहीं क्रांतिकारी डिनर के साथ समाप्त होंगी।फिर इन्तजार रहेगा अगले मई दिवस का।

कहीं कहीं मजदूरों का सम्मान भी किया जाएगा। उनको पुरस्कार दिए जायेंगे,अंगवस्त्रम या शाल पहनाये जायेंगे, कहीं-कहीं पैर भी धोए पूजे जा सकते हैं।पर उनको पूरी मजदूरी मिले यह नहीं सुनिश्चित किया जाएगा।कार्य स्थल पर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जायेगी।उनके शोषण के विरुद्ध जमीन पर लड़ाई नहीं लड़ी जायेगी।ठेकेदार या आजकल के सर्विस प्रोवाइडर के माध्यम से काम पाने वाले मजदूरों के वेतन का कितना हिस्सा काट कर दिया जाता है इसको कोई नहीं देखेगा।

महात्मा गांधी कहते थे कि किसी भी राष्ट्र की तरक्की उस देश के कामगारों और किसानों पर निर्भर करती है।उद्योगपति अपने को मालिक या प्रबंधक समझने की बजाय अपने-आप को ट्रस्टी समझें।लोकतन्त्र में तो लोग सरकार को चुन कर देश की बागडोर ट्रस्टी के रूप में सौंपते हैं।सरकार मज़दूरों, कामगारों और किसानों की बेहतरी,भलाई,विकास,कानून व्यवस्था आदि बनाऐ रखने के लिए संविधान से बंधी होती है।परंतु वह अधिकांशत पूंजीपतियों के हितों का संरक्षण करती हैं।

आज देश मे अनेक स्थानों पर श्रम कानूनों का उल्लंघन होता है।नये बनाये गये श्रमिक कानूनों मे तमाम प्राविधान कामगारों के हितों मे नहीं है।अनेकानेक सरकारी उद्योगों का निजीकरण हो रहा है।सरकारी सम्पत्तियां औने-पौने दामों पर निजी हाथों मे बेच दी जाती हैं।पर क्या इसके लिए कहीं पर सार्थक लड़ाई लड़ी जा रही है?विपक्षी दल भी केवल औपचारिकता निभाते हैं। ट्रेड यूनियन भी किसी सार्थक लड़ाई का हिस्सा नहीं है। सभी केवल शब्दाडंबर से भरे व्यक्तव्य को ही विरोध का उत्कर्ष मान चुके हैं।सरकार तो अलंकारिक व्यक्तव्यों के लिए जानी ही जाती है। पिछले कुछ सालों से सड़क की लड़ाई गायब हो चुकी है।कामगारों को काम छूटने पर दो वक्त की रोटी का संकट है। वह जानता है कि उसके लिए कोई खड़ा होने वाला नहीं है।इसलिए वह सड़क पर आने से डरता है।आज उसके पास कोई कोई गांधी,सुभाष,पटेल,नेहरू,जेपी,लोहिया,जॉर्ज फर्नांडिस नहीं है।न ही अब उसके पास एच एल परवाना, ए बी बर्धन, दत्ता सामंत, गुरु दास गुप्ता, चतुरानन मिश्रा, एस ए डांगे, इन्द्रजीत गुप्ता जैसे यूनियन के नेता रहे।

हम लोग और अधिक आत्म केंद्रित होते जा रहे हैंl इन वर्गों के प्रति हमारी उदासीनता बढ़ती जा रही है और यह लोग मुख्य धारा के विमर्श से धीरे धीरे गायब हो रहे हैं lआज कामगारों के हितों की रक्षा के लिए अन्य संवैधानिक सुरक्षाओं के साथ ही उनके बच्चों को स्तरीय शिक्षा और बीमार पड़ने पर उचित निःशुल्क चिकित्सा दिया जाना सबसे ज्यादा जरूरी है।यह हमारा न केवल नैतिक कर्तव्य है वरन् संवैधानिक दायित्व भी।

मै अपनी बात एक अपील,जो मै पिछले कई सालों से कर रहा हूं,के साथ करूंगा।
आप सभी सोचिये कि
— क्या इनको इज्जत की दो जून की रोटी मिल रही है
–क्या इनको उचित इलाज मिल पा रहा है
—क्या इनके बच्चे पढ़ रहे हैं
सरकारें जो कर रही हैं या करेंगी वो अपनी जगह है।आज मेरा एक विनम्र निवेदन है।हम सबके आसपास कामगार हैं।इनमें से कम से कम एक परिवार की सहायता करने का संकल्प लें।उनके बच्चों को पढ़ने मे मदद करें,चिकित्सा मे मदद करें, जीवन-यापन मे जिस प्रकार भी संभव हो मदद करें।जितनी संभव हो बस उतनी ही करें।
हाँ, यह बहुत बड़ा कदम नहीं होगा परन्तु कम से कम एक परिवार में रोशनी की एक किरण ला सकता है।सामूहिक रूप से आप देखिये कितने परिवारो को यह मदद कर सकता है।

हो तिमिर कितना भी गहरा;
हो रोशनी पर लाख पहरा;
सूर्य को उगना पड़ेगा,
फूल को खिलना पड़ेगा।

हो समय कितना भी भारी;
हमने ना उम्मीद हारी;
दर्द को झुकना पड़ेगा;
रंज को रुकना पड़ेगा।

सब थके हैं, सब अकेले;
लेकिन फिर आएंगे मेले;
साथ ही लड़ना पड़ेगा;
साथ ही चलना पड़ेगा।

रामधारी सिंह दिनकर

Ramswaroop Mantri

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