देश कितना भी आगे बढ़ रहा हो पर मीडिया की विश्वसनीयता लगातार गर्त में जा रही है। जिस मीडिया का समाज में एक अलग ही रुतबा हुआ करता था। उस मीडिया को आज की तारीख में संदेह भरी दृष्टि से देखा जा रहा है। इसके जिम्मेदार मीडिया मालिक और सत्ता कम बल्कि मीडिया के कर्णधार ज्यादा हैं। एक समय था कि जब पत्रकार को समाज में विशेष दर्जा मिलता था। सरकारी मशीनरी की खामियों को दिखाना और भ्रष्टाचार उजागर करना ही सच्ची पत्रकारिता मानी जाती थी। यह वह दौर था कि एक जागरूक आदमी बिना अख़बार पढ़े अपने को अधूरा महसूस करता था। यह दौर प्रिंट मीडिया का था।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आने के बाद जैसे ही पत्रकारिता में ग्लैमर आया तो टीआरपी के चक्कर में पत्रकारिता का स्तर लगातार गिरता चला गया। पत्रकारिता ने कारोबार का रूप ले लिया। ख़बरों में मुनाफा देखा जाने लगा। मीडिया समूह के मालिकों ने पत्रकारिता को व्यापार का रूप देकर पत्रकारों को नौकर बना दिया। पत्रकार भी नौकर बनते चले गए। आज पत्रकारिता कहां है यह किसी से अब छिपी नहीं हुई है।
दरअसल भारतीय पत्रकारिता का जन्म आजादी की लड़ाई की कोख से माना जाता है। देश की आज़ादी में पत्रकारिता का बड़ा योगदान रहा है। एक पत्रकार को विपक्ष का नेता माना जाता रहा है। वह बात दूसरी है कि आज की तारीख में बड़ा पत्रकार होने का दंभ भरने वाले लोग सत्ता के दलाल बनकर रह गए हैं। जिसकी सत्ता में जितनी बड़ी पैठ वह उतना ही बड़ा पत्रकार। जो मालिक का जितना काम सरकार से करा दे वह उतने ही प्रमोशन पा लेता है। जैसे पत्रकारिता से अब किसी का कोई मतलब नहीं रह गया है। न तो प्रिंट मीडिया और ही इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया। हां कुछ जुनूनी लोग हैं जो आज भी विभिन्न माध्यमों से पत्रकारिता का धर्म निभा रहे हैं।
बहुत लोगों को यह कहते सुना जाता है कि भाई नौकरी करनी है मालिक जो कहेगा वह करना पड़ेगा। यह बात वह पत्रकार ज्यादा कहते हैं जिन्होंने सत्ता की दलाली कर लाखों-करोड़ों रुपए कमा रखे हैं। कम वेतन पाने वाले आज भी पत्रकारिता का धर्म निभाने का प्रयास करते हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि पत्रकारिता के गिरते स्तर से आखिर देश पर क्या असर पड़ रहा है ?
दरअसल ख़बरें पढ़कर और सुनकर ही लोग अपनी धारणा बनाते हैं बदलते हैं। मतलब यदि ख़बरें सत्ता के हस्तक्षेप से चलेंगी तो फिर देश और समाज दोनों का ही नुकसान होगा। एक तो सत्ता से सवाल नहीं पूछे जाएंगे तो सत्ता बेलगाम हो जाएगी दूसरे भ्रष्टाचार उजागर नहीं होगा। लोग भ्रमित अलग से होंगे। यही देश में हो रहा है। मोदी सरकार न तो राष्ट्रनीति में सफल है न ही विदेश नीति में। सारी सफलता बस सत्ता दरबारी मीडिया में ही दिखाई जा रही रही। ऐसा माहौल बना रखा है कि जैसे देश में काम होना ही मोदी के पीएम बनने के बाद हुआ है।
दरअसल 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी लोगों को सपने दिखाते रहे और लोग उनके झांसे में आते रहे। चाहे प्रतिवर्ष दो करोड़ युवाओं को रोजगार देने का वादा हो, 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का वादा हो। विदेश से काला धन वापस लाने का वादा हो। स्मार्ट सिटी का वादा हो, स्मार्ट विलेज का वादा हो। हर वादे को मोदी ने भुनाया पर जनता को झुनझुना ही मिला। अब पहलगाम आतंकी हमले के बाद मोदी सरकार हर मोर्चे पर विफल साबित हुई है। भूखे नंगे देश पाकिस्तान से सीजफायर करने वाली सरकार अपनी पीठ खुद थप थपाकर फूले नहीं समा रही है। अजहर मसूद, हाफिज सईद जिंदा हैं। पहलगाम हमले के आतंकी कहां है किसी को पता नहीं।
देश के प्रधानमंत्रियों से सबसे अधिक विदेशी दौरे करने के बावजूद पाकिस्तान से युद्ध के समय हमारे साथ खुलकर कोई एक देश तक खड़ा न हो सका। भूखे देश पाकिस्तान के साथ कई देश खुलकर सामने आ गए। देश को विश्वगुरु बनाने के दावे करने वाली बीजेपी और उसके समर्थक यह समझने को तैयार नहीं कि अब भारत को आतंकवाद के मुद्दे पर खुद पाकिस्तान की सहमति लेनी पड़ेगी। चीन ने आतंकवाद विरोधी समिति का अध्यक्ष पाकिस्तान को जो बनवा दिया है। इससे समझा जा सकता है कि मोदी की विदेश नीति की स्थिति क्या है?
(चरण सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं






