डॉ. विकास मानव
_ध्यान की पूर्व स्थिति धारणा (Concentration) है। पहले मन में किसी पदार्थ (विषय या वस्तु) को धारण (Retain/ Concentrate) किया जाता है । तदुपरान्त उस पर विचार (Contemplate) किया जाता है।_
हठयोग में त्रटक की विधि वर्णित है जिससे किसी वस्तु पर एक टक चिरकाल तक दृष्टि टिकाई जाती है। यह क्रिया पहले खुली आंखों से की जाती है और बाद में आँखे मूँद कर उस वस्तु को अन्तः मन से देखा जाता है।
त्राटक क्रिया वस्तु को मन में धारण करने की प्रक्रिया है।
त्राटक निम्न किसी एक प्रकार से किया जा सकता है :
क) दीवार पर ठीक आँखों के समानान्तर कोई गोलाकार आकृति बनाएँ। अभीष्ट आसन में सीधे, पीठ व गर्दन को बिना झुकाए, बैठ कर उसे एक टक बिना पलकें झपके देखते रहें।
आँखें झपकने के बाद भी उसी को एक टक देखते रहें।
आस्तिक जन प्रणव (ओ३म्), क्रॉस या क्रिसैंट , की आकृति पर भी एक टक त्राटक कर सकते हैं।
जब थकान महसूस करें, आँखें मूँद कर, उस आकृति पर ध्यान लगाए रखें।
तीन-चार बार इसकी पुनरावृति करें। ओ३म् या ईश्वर के किसी अभीष्ट नाम का मानसिक जप करें।
तीन मिनिट तक इस आकृति पर दृष्टि टिकाना पर्याप्त है।
तदनन्तर अन्तः दृष्टि से ध्यान लगाना चाहिये।
ख) मेज या चौकी पर एक दीपक या मोमबत्ती जला कर रखें जो आँखों के ठीक सामने हो।
गर्दन सीधी रहे; झुकी या ऊपर उठी नहीं होनी चाहिये।
अभीष्ट आसन में बैठ कर, उसकी लाट को एक टक देखते रहें।
जब थकान होने लगे, आँखे मूँद लें और दीपक की लाट को मानसिक तौर से देखें।
अब आँखें खोल कर पुनः जितनी देर हो सके बिना पलकें झपकें, दीपक की लाट को देखते रहें।
पुनः आँखें मूँद कर लाट को मानसिक तौर से देखें।
इस प्रकार पुनरावृत्ति करते रहें। साथ ही ओ३म् का मानसिक जप करें।
तीन मिनिट तक यह प्रक्रिया करें।
तदनन्तर आँखें मूँद कर मानसिक ओ३म् जप सहित ध्यान लगाएँ।
ग) अभीष्ट आसन में बैठें। दोनों भौंवों (Eyebrows) के बीच के भाग जिसे त्रिकुटि, भ्रुकुटि या आज्ञाचक्र का स्थान व त्रिनेत्र का स्थान कहते हैं, खुली आँखों से देखें।
जितनी देर सम्भव हो सके देखते रहें।
थकान होने पर आँखें बंद कर लें और त्रिनेत्र बिन्दु को मानसिक तौर पर देखें।
पुनः आँखें खोल कर त्रिनेत्र बिन्दु को देखें।
इस प्रकार तीन- चार बार पुनरावृत्ति करें। ओ३म् का मानसिक जाप करते रहें।
इस प्रक्रिया को दो मिनिट तक करना पर्याप्त है।
उपरोक्त तीनों विधियाँ धारणा सिद्ध करने में सहायक होती हैं।
त्राटक करते समय, विशेष कर जब आँखें मुँदी हों, कुछ ज्योति जो लाल, नीली, पीली, हरी, बैंगनी रंग की हो सकती है, मस्तिष्क में दिखाई देगी, उसे देखते रहें।
ऐसी स्थिति पर समझना चाहिये कि धारणा सिद्ध हो रही है। तदुपरान्त ध्यान की अन्य विधियों द्वारा ध्यान लगाया जा सकता है।
*उल्लेखनीय :*
त्राटक हठयोग की षट्क्रिया/षट्कर्म की एक क्रिया है। क्योंकि यह धारणा से सम्बन्धित है, इसलिए हमने इसे ‘ योग वाटिका : ध्यान ‘ में सम्मिलित कर दिया है। राजयोग या पातञ्जलयोग में इसका कोई उल्लेख नहीं है।
योगदर्शन में धारणा का पाँचवे अङ्ग के रूप में उल्लेख है। इसमें आँखे खोल कर एक टक किसी स्थूल वस्तु पर ध्यान लगाने का विधान नहीं है, प्रत्युत आँखें मूँद कर मानसिक रूप से किसी विषय या पदार्थ को धारण करने का विधान है।
शान्त चित्त हो कर, अभीष्ट आसन में आँखें मूँद कर बैठें और विशिष्ट विषय या वस्तु को मानसिक तौर पर मन में धारण करें जैसे ओ३म् की आकृति।
इसके लुप्त होने पर पुनः इसे मन में धारण करें । इसके साथ-साथ ओ३म् का अर्थ सहित जप करें।
महर्षि दयानन्द ने ‘धारणा’ का उल्लेख इस प्रकार किया है:
“धारणा उसको कहते हैं कि मन को चंचलता से छुड़ा के नाभि, हृदय, मस्तिष्क, नासिका और जीभ के अग्रभागादि देशों में स्थिर करके ओंकार का जप और उसका अर्थ जो परमेश्वर है, उसका विचार करना।”





