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*उद्धव-राज की एकता से बदली मुम्बई की राजनीति*

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कांतिलाल मुणोत

कट्टर हिंदुत्ववादी और मराठी अस्मिता के प्रखर प्रतीक बाला साहेब ठाकरे के जाने के बाद जिस शिवसेना की राजनीति बिखराव, टूट और आपसी संघर्ष की मिसाल बन गई थी, वही राजनीति अब एक बार फिर एकता के सूत्र में बंधती दिखाई दे रही है। वर्षों तक एक-दूसरे के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी रहे उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे ने “बंटेंगे तो बिखरेंगे” की सोच के साथ आगामी महानगरपालिका चुनाव एक साथ लड़ने का निश्चय कर महाराष्ट्र की राजनीति में नया अध्याय खोल दिया है।

यह फैसला सिर्फ एक चुनावी समझौता नहीं, बल्कि बाला साहेब की विरासत को फिर से जीवित करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। बाला साहेब ठाकरे के जीवित रहते शिवसेना एक मजबूत कैडर आधारित पार्टी थी, जिसकी जड़ें मुंबई से लेकर महाराष्ट्र के कोने-कोने तक फैली थीं। मराठी मानुस, हिंदुत्व और आक्रामक राजनीति का जो मेल बाला साहेब ने तैयार किया था, उसने दशकों तक कांग्रेस, बाद में बीजेपी तक को चुनौती दी। उनके जाने के बाद शिवसेना नेतृत्व विहीन होती चली गई।

उद्धव ठाकरे ने संगठन को संभालने की कोशिश की, लेकिन पार्टी में वैचारिक और सांगठनिक खींचतान बढ़ती गई। दूसरी ओर राज ठाकरे, जो अपने चाचा बाला साहेब के सबसे तेजतर्रार राजनीतिक उत्तराधिकारी माने जाते थे, 2005 में शिवसेना से अलग होकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना लेकर आए। उस वक्त यह बंटवारा भावनात्मक भी था और राजनीतिक भी। बीते बीस वर्षों में उद्धव और राज की राजनीति अलग-अलग दिशाओं में चलती रही। राज ठाकरे ने मराठी मुद्दों को तीखे तेवरों में उठाया, उत्तर भारतीयों और गैर-मराठियों के खिलाफ आक्रामक बयान देकर सुर्खियां बटोरीं, लेकिन संगठनात्मक विस्तार में वह शिवसेना जैसी पकड़ नहीं बना पाए।

उद्धव ठाकरे ने अपेक्षाकृत संतुलित राजनीति अपनाई, बीजेपी के साथ सरकार चलाई और फिर अलग होकर कांग्रेस-एनसीपी के साथ सत्ता में आए। इसके बाद शिवसेना में टूट, एकनाथ शिंदे का विद्रोह और पार्टी का विभाजन हुआ। इन सियासी आरोह-अवरोह के बाद उद्धव ठाकरे खुद को हाशिये पर महसूस करने लगे, जबकि राज ठाकरे भी लंबे समय से अलग-थलग पड़े नजर आ रहे थे। ऐसे में दोनों नेताओं का एक मंच साझा करना स्वाभाविक नहीं, बल्कि परिस्थितियों की देन है। मुंबई महानगरपालिका चुनाव, जो महाराष्ट्र की राजनीति की धुरी माना जाता है, दोनों के लिए अस्तित्व की लड़ाई बन गया था।

यही कारण है कि 20 साल बाद शिवसेना (यूबीटी) और मनसे का चुनावी गठबंधन अस्तित्व में आया। यह गठबंधन मराठी वोटों के एकीकरण का बड़ा प्रयास है। उद्धव ठाकरे का यह कहना कि हमारी सोच एक है, सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि अतीत की कड़वाहट को पीछे छोड़ने का संकेत है। दोनों नेताओं का शिवाजी पार्क पहुंचकर बाला साहेब को श्रद्धांजलि अर्पित करना प्रतीकात्मक रूप से बेहद अहम माना जा रहा है। शिवाजी पार्क वही जगह है जहां से बाला साहेब ठाकरे ने दशकों तक मराठी राजनीति को दिशा दी। यहीं उनकी दहाड़ गूंजती थी और यहीं से शिवसेना की ताकत का प्रदर्शन होता था।

उद्धव और राज का एक साथ वहां पहुंचना यह संदेश देता है कि वे बाला साहेब की विरासत को विभाजित नहीं, बल्कि संरक्षित करना चाहते हैं। राज ठाकरे का यह कहना कि मुंबई का मेयर मराठी होगा। सीधे-सीधे मराठी अस्मिता का मुद्दा है। यह बयान उन शहरी, गुजराती और उत्तर भारतीय वोट बैंक को भी संदेश देता है कि मराठी राजनीति एक बार फिर संगठित हो रही है। हालांकि यह गठबंधन बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है, क्योंकि अब तक बीजेपी ने शहरी इलाकों, गुजराती और उत्तर भारतीय मतदाताओं में मजबूत पकड़ बना ली थी। मराठी वोटों का बिखराव बीजेपी के लिए फायदेमंद रहा, लेकिन उद्धव-राज की एकता उस समीकरण को बदल सकती है।

बाला साहेब ठाकरे के कार्यकाल की एक रोचक और चर्चित घटना आज भी मुंबई की राजनीति में किस्से की तरह सुनाई जाती है। 1990 के दशक में जब मुंबई में दंगे और अराजकता का माहौल था, तब बाला साहेब ने अपने खास अंदाज में कहा था कि अगर शिवसेना सड़क पर उतर आई, तो पुलिस भी पूछेगी कि आदेश किसका मानें। यह बयान सिर्फ धमकी नहीं था, बल्कि उनकी पकड़ और कैडर की ताकत का प्रतीक था। उस दौर में शिवसेना का नेटवर्क इतना मजबूत था कि मुंबई की गलियों से लेकर महानगरपालिका तक उसका दबदबा था।

बाला साहेब नेताओं से ज्यादा कार्यकर्ताओं पर भरोसा करते थे और यही वजह थी कि शिवसेना एक आंदोलन की तरह काम करती थी। आज वही नेटवर्क कमजोर पड़ चुका है। शिवसेना के कैडर में असमंजस है कि किस धड़े के साथ जाएं। उद्धव ठाकरे के समर्थक भावनात्मक रूप से बाला साहेब की विरासत को अपना मानते हैं, जबकि शिंदे गुट सत्ता और संगठनात्मक ताकत के साथ आगे बढ़ रहा है। ऐसे में मनसे के साथ गठबंधन उद्धव के लिए संजीवनी साबित हो सकता है। राज ठाकरे के पास भले ही सीमित सीटें हों, लेकिन उनकी भाषण कला और मराठी मुद्दों पर पकड़ आज भी असर रखती है। आगामी 15 जनवरी को होने वाले चुनाव इस गठबंधन की असली परीक्षा होंगे। यह सिर्फ सीटों की लड़ाई नहीं, बल्कि मराठी राजनीति की दिशा तय करने वाला मुकाबला होगा। अगर दोनों पार्टियां मिलकर अच्छा प्रदर्शन करती हैं, तो यह संकेत होगा कि बाला साहेब की विरासत आज भी प्रासंगिक है।

अगर नाकामी मिली, तो यह सवाल उठेगा कि क्या समय बदल चुका है और मराठी राजनीति अब नए चेहरों और नए मुद्दों की मांग कर रही है। एक बात तय है कि उद्धव और राज का साथ आना महाराष्ट्र की राजनीति में हलचल मचाने वाला कदम है। यह गठबंधन भावनाओं, विरासत और अस्तित्व की राजनीति का संगम है। बाला साहेब ठाकरे ने जिस मराठी स्वाभिमान और आक्रामक राजनीति की नींव रखी थी, वह आज नए संदर्भ में लौट रही है। अब देखना यह है कि यह एकता सिर्फ चुनाव तक सीमित रहती है या भविष्य में मराठी राजनीति की स्थायी धुरी बन पाती है। मुंबई और महाराष्ट्र की सियासत के लिए यह फैसला इतिहास में दर्ज होने वाला है।

(L 103 जलवंत टाऊनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट रोड,नियर नन्दालय हवेली सूरत मो 99749 40324 वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार, स्तम्भकार)

Ramswaroop Mantri

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