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चलते रहने का नाम जिंदगी 

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           डॉ. विकास मानव 

 हम बहुत देर तक चलते रहे। इस गोल धरती के गोल-गोल चलते गुए दोबारा वहीं दुकान दिख गई तब लगा कि कहीं से चलकर वहीं पहुँच गए हैं। 

    हम चलते रहे। हम में दो थे लेकिन साथ चलने वाले भी मेरे साथ चलने लगे। कुछ ने चार कदम चला और कुछ ने ज़्यादा। वो चल नहीं रहे थे। मुझे देख कर चलने लगे। एक की गति से दूसरा भी गति में आ जाता है। 

हर शहर में जगह होनी चाहिए जहां पर घंटों चल सकें। जहां चलने के नाम पर कुछ लोग काफ़ी देर से खड़े हों। कुछ थक कर बैठें हों और कुछ बैठने के बाद चलने लगे हों। इन खड़े और बैठे लोगों से भी वो जगह चलती हुई लगीं जहाँ चलने लगा था। 

    अपने भीतर जम चुकी असंख्य बातों से बाहर आने के लिए चलना ज़रूरी लगा। चलने की धुन में उसे मना करना बुरा नहीं लगा जिसे एक सेल्फी की चाहत थी। एक झटके में लगा कि कितने सुंदर हेयर कट थे उसके और पूछने का विनम्र लहजा। पूछने की बात आधी तो हवा में रह गई। बाकी बात चेहरे के अपने-अपने भावों से हो गई। 

     मैंने कह दिया और वो समझ गईं। वो रूक गईं और मैं चल पड़ा। एक सेल्फी के लिए पूछने और मना करने पर बुरा न मानने का यह सुख चलने के कारण मिला क्योंकि हम वहां से बढ़ गए। उससे हो सकने वाले अफ़सोस को पीछे छोड़ किनारे के अंधेरे में चलने लगे। 

    मैं चला जा रहा था। अपने भीतर से निकल कर कनॉट प्लेस में। मेरा साथ-साथ मेरे कई सारे साल चल रहे थे जिनमें मैं इस सीपी में चला ही नहीं। चलते हुए किसी से मिल जाने और उस मुलाक़ात को वहीं छोड़ आगे बढ़ जाने का अपना सुख होता है, जो तब पता चलता है जब आप मिलने के तुरंत बाद चलने लग जाते हैं।मैं बस चल रहा था। इस ब्लॉक से उस ब्लॉक। 

     इतने लोगों के बीच भी कुछ लोग चुरा कर सिगरेट ख़रीद रहे थे। कुछ लोग लोगों के बीच ही अपना कोना बना कर सिगरेट पी रहे थे। शायद वो अपने लोगों से दूर लोगों को ही बीच सिगरेट पीने का सुख चाहते होंगे। एक झटके में देखा। काउंटर के पीछे से सिगरेट लेते हुए और बेचने वाले के चेहरे पर अपार ख़ुशी छलकते हुए। हर आदमी अपनों से अजनबी और अजनबी से अपनों के बीच की यात्रा में लगा रहता है। हमने कितनों को मन से याद किया। उन्हें भी लेकर चलते रहे। 

      कनॉट प्लेस की उस शाम मैं चलता जा रहा था।इतने लोग टीवी नहीं देख रहे थे। कई लोग वहां की रौशनी में भी अंधेरा खोज कर चुपचाप बैठ गए थे।आस-पास बैठे लोग एक दूसरे से बात नहीं कर रहे थे। सब अपनी जगह पाकर चुप थे। मैं उन्हें चलते-चलते देख रहा था।

      एक सज्जन बिहार से आए अपने पिता के लिए कुर्ता ख़रीदने आए थे। मैं उन्हें नहीं जानता था लेकिन प्रणाम कर आगे बढ़ गया। उनके पिता इस ज़माने में कब से ठहरे हुए लगे। कनॉट प्लेस को वो लंदन अमरीका की तरह निहार रहे थे, जैसे ये बाज़ार उनके साधारण कुर्ते में ब्रांड की रौशनी भर देगा और वो ग़ायब हो जाएंगे। मैं जानना चाह रहा था कि क्या सीपी आकर वे अपने किसी दोस्त को याद कर रहे हैं या पुराने कुर्ते से निकल कर नए कुर्ते में प्रवेश करने आए हैं। 

    मैं चलने लगा। कुछ लड़कियों का समूह ज़ोर से चीखा था। मैंने सोच लिया। मुड़ना नहीं और  रुकना नहीं है। 

   हम कॉफी हाउस आ गए। देखने कि अब भी वैसा है। 1942 लिखा था। अंदर की सजावट रेट्रो थी। 

कुछ तो बहुत ही सज-धज कर पूरे डिनर करने आए थे।अपने बेस्ट कपड़ों में तैयार होकर निकलना अपने आप में चलना ही है। कुछ लोग जैसे तैसे भी आ गए थे जैसे हम। 

     सज धज कर निकलना और चलते रहना बंद ही हो गया। ऐसा मैं नहीं कहता, मेरे कपड़ों ने मुझसे कहा है। लेकिन इधर उधर देखते हुए उन्हें नोट कर लिया जो एक दूसरे से मिलने के लिए घर से निकले हैं। आज भी एक दूसरे के लिए निकलते हैं, यह देख कर और चलने लगा।एक विदेशी महिला अकेले बैठी थी। 

     वेटर से बात करते करते ग्लास में बियर भर लिया। अब ग्लास को निहार रही थी। नज़रों से तराश रही थी।वो ख़ुद के साथ बैठी थी। जो चलता है वही तो बैठने का सुख पाता है। हमने वहाँ कॉफी पी।

     हम चले जा रहे थे। लोगों से मिलते हुए और लोगों को देखते हुए। इसी शहर में कितने साल चलता रहा हूँ। चलते-चलते कितना भर जाया करता था। चलते-चलते पता चला कितना ख़ाली हो गया था, नहीं चलने से। मुझे चलना है।

      किसी के घर नहीं जाना। घर से ही तो निकलना है। अगली बार गया तो ज़रा ठहर कर चलूँगा। चलना दौड़ना नहीं है।

Ramswaroop Mantri

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