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*नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका:विद्रोह-बगावत और क्रांति में अंतर*

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डॉ. सिद्धार्थ

विद्रोही-बगावती लोगों के पास किसे निशाना बनाना है, किस चीज को ध्वस्त करना इसकी पहचान तो होती है और इस मामले में उनकी एकता होती है, लेकिन ध्वंस के बाद किस चीज का निर्माण करना है, इसकी कोई स्पष्ट तस्वीर नहीं होती है, न ही उनके बीच भविष्य निर्माण के मुद्दे पर कोई एकता होती है-संदर्भ नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका में विद्रोह-बगावत। 

पिछले सालों में श्रीलंका, बांग्लादेश और हाल में नेपाल में जो हो रहा है, वह जनता के एक बड़े हिस्से की बगावत और विद्रोह था, जिसकी अगुवाई युवा कर रहे थे। 

तीनों देशों के विद्रोहियों-बगावतियों के निशाने पर राजनीतिक दल, राजनीतिक नेता और तत्कालीन सरकारें थीं। 

तीनों देशों के विद्रोहियों-बगावतियों ने तत्कालीन सरकारों को सत्ता छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया। सत्ता के प्रमुखों को देश छोड़ने कर भागने के लिए मजबूर कर दिया। परंपरागत राजनीतिक दलों को किनारे लगा दिया। 

ये विद्रोह-बगावत इतने व्यापक और तीखे थे कि उन्हें पुलिस या सेना अपने काबू में नहीं कर सकी। सारी कोशिश के बाद भी।

श्रीलंका में एक अब तक न आजमाया गया, राजनीतिक विकल्प मौजूद था। वह विकल्प श्रीलंका के वामपंथी पार्टी का था। उस पार्टी ने इस विद्रोह-बगावत को अंततोगत्वा एक राजनीतिक विकल्प दे दिया और वामपंथी सरकार कायम हो गई। कैसे वामपंथी हैं, कितना वामपंथ है, यह सब बहसें होती रह सकती हैं, होती रहेंगी।

बांग्लादेश में कोई राजनीतिक विकल्प नहीं था। लोगों का आक्रोश भले सबसे ज्यादा शेख हसीना के प्रति था, लेकिन निशाने पर पूरा राजनीतिक स्टैबलिसमेंट था। बगावती-विद्रोही किसी परंपरागत राजनीतिक दल को सत्ता सौंपने को तैयार नहीं थे। गैर-राजनीतिक व्यक्ति के नेतृत्व में केयर टेकर सरकार बनी।

अब यही स्थिति नेपाल में दिखाई दे रही है। नेपाली विद्रोहियों-बगावतियों को दुश्मन के रूप में सरकार, राजनीतिक दल, उसके नेता और राजनीतिक संस्थाएं दिखीं। उन्होंने उसको निशाना बनाया, लेकिन उनके पास भविष्य के लिए कोई वैकल्पिक साझा राजनीतिक स्वप्न भी नहीं है, आर्थिक-सामाजिक स्वप्नों की बात ही छोड़ दीजिए। इसके चलते ही भविष्य का कोई रोड मैप नेपाल में नहीं दिखाई दे रहा है, न इसको लेकर विद्रोहियों-बगवातियों के बीच कोई एका दिख रही है।

इन देशों की जमीनी हकीकत को देखने वाला कोई व्यक्ति इन देशों के युवाओं को अगुवाई में होने वाले विद्रोह-बगावत को षड्यंत्र कहता या समझता है और कहता है कि वह किसी दूसरे देश के षड्यंत्र के चलते हुआ है, तो यह सच्चाई से मुंह मोड़ने जैसा है।

हां यह सच है कि जब किसी देश में असंतोष पनपता है, विद्रोह-बगावत उठ खड़ी होती है, तो दुनिया को नियंत्रित करने वाले देश और शक्तियां उसको अपने हितों के लिए इस्तेमाल करने की हर कोशिश करती हैं कई बार सफल भी होती हैं। लेकिन इसके चलते उस विद्रोह-बगावत को षड्यंत्र ठहरा दिया जाए, यह तर्क पद्धति जनता के असंतोष-गुस्से और उसकी बुनियादी वजहों को किनारे लगाकर ऐसी परिघटना को समझना है।

यहां तक की क्रांति को भी दुनिया को नियंत्रित करने वाले देश शक्तिशाली देश या पड़ोसी देश अपने लिए इस्तेमाल करने की पूरी कोशिश करते हैं, कुछ हद तक कुछ मामलों में सफल भी हुए हैं। इतिहास इसका साक्षी है।

क्रांति और विद्रोह बगावत में यह भी एक बुनियादी अंतर है। क्रांतिकारियों या क्रांतिकारी पार्टी-नेता के पास किस चीज को ध्वस्त करना है, यह तो पता होता है, लेकिन उसके स्थान पर किन चीजों का निर्माण करना है, यह भी काफी हद तक स्पष्ट होता है। क्रांतिकारियों के पास भविष्य का भी एक रोडमैप होता है, जो विद्रोहियों-बगावतियों के पास नहीं होता है।

Ramswaroop Mantri

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