अग्नि आलोक
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बिक कर छपते अखबार

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नहीं समाज के सजग ये प्रहरी
और कहां अब सच के पैरोकार
पहले छपकर बिकते थे पर
अब बिक कर छपते अख़बार

सत्ता के सब हो गए दलाल
हाकिम के तलवे चाटेंगे
ये हक़ीक़त को झुठलाएंगे
मतलब की खबरें बांटेंगे
भाट कहो या कहलो चाटुकार
अब बिक कर छपते अख़बार

बेकारी की बात न होगी
नहीं दिखेगी महंगाई
और बगावत से नफरत
उसकी हर आवाज़ दबाई
कलम बने न अब तलवार
अब बिक कर छपते अख़बार

हर धोखे का पर्दाफाश
अब यह बात पुरानी हुई
सच्ची बात कहां बेधड़क
सब इकतरफा बेमानी हुई
मकसद हो गया है व्यापार
अब बिक कर छपते अख़बार

लोकतंत्र का चौथा स्तंभ
जिम्मेदारी से कतराता
मुख पृष्ठ ही समाचार का
आए दिन है बिक जाता
हो गई विज्ञापन की भरमार
अब बिक कर छपते अख़बार

__टिल्लू वर्मा

Ramswaroop Mantri

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