अग्नि आलोक
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*किसी को इम्प्रेस करना मेरा हेतु नहीं, मगर…!*

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   डॉ. विकास मानव

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      ~ जन्मों बाद मोक्ष मिलता है. पात्र बनो, तन मन धन और पत्नी बेटी बहन अर्पित करो : यह मैं नहीं कहता.

  ~ पुरुष के लिए उसके द्वारा अपेक्षित पौरुषशक्ति का विकास, स्त्री के लिए उसके द्वारा अपेक्षित चरम यौनिक तृप्ति

~ विश्वास, आस्था, श्रद्धा रखो ऐसी शर्त नहीं. सारे शिविर निःशुल्क. और क्या चाहिए मुझ से?

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किसी को प्रभावित करना, किसी से कुछ लेना मेरा लक्ष्य कभी नहीं रहा। पर हुआ यह कि मेरा लेखन, प्रयोग और जीवन लोगों को अविश्वसनीयता की हद तक चकित करता रहा है। 

     सिर्फ मौलिकता के लिए, मनुष्यता के लिए, असम्भव की संभाव्यता के लिए मैं सर्जनात्मक प्रयोग करता हूं।  पुरानी – नई बात कहने की जगह सही बात करना और सावित करके दिखाना पसंद करता हूं। इसके लिए और वैदुष्य के क्षेत्र में मौलिकता ही नहीं,  तार्किकता और प्रामाणिकता भी जरूरी होती है। महज मौलिकता दोष है, और इसके कई ज्वलंत उदाहरण है. जिसने भी ऐसी अभिव्यक्ति किया उसे बेइज्जत करके भगा दिया गया या फिर उसके सृजन को सामूहिक रूप से नकार दिया गया।

   इसके बाद भी मुझे  प्रायः लगा कि मैं जो कुछ कहता रहा हूं उन के पक्ष में प्रमाण तो असंख्य है, परंतु उनकी ओर पहले किसी ने ध्यान नहीं दिया। उनकी ओर ध्यान दिलाने पर केवल नजरिया ही नहीं बदलता, परिदृश्य इस तरह बदल जाता है मानो जादू हो गया हो। जादूगरी धोखाधड़ी है, यह धोखाधड़ी हमारे इतिहास के साथ उन लोगोे ने की थी जिन्होंने, अपनी जरूरत से, ज्ञान-व्यवस्थथा पर एकाधिकार करके अर्धसत्यों के सहारे आप को सभी योग्यताओं से शून्य सिद्ध करने के लिए एक भ्रामक व्याख्या लिखा था और आज भी लिख रहा है।  

   सबसे अधिक हैरान लोग इन टॉपिक्स को लेकर होते हैं और आपस में सवाल करते हैं : “ध्यान अपरिमित पौरुष देता है, ऐसा और कहीं पढ़ने-सुनने क्यों नहीं मिलता? कोई इंसान एक-एक घंटे का सात राउंड सेक्स कैसे कर सकता है? यह कैसे संभव है कि कोई इंसान एक रात में 15 हॉटेस्ट फीमेल्स तक को बेसुध कर सकता है, जबकि लोग बीस मिनट भी नहीं टिकते, एक को भी संतुष्ट नहीं कर पाते? यह कैसे संभव है कि लोग अपनी पत्नी और बेटी तक बर्बादी से बचाने के नाम पर आपसे सटिस्फैक्शन दिलाने आते हैं?

   तो महान आत्माओं, आपस में खानाफूसी करने, गुटरगूं करने से क्या सिद्ध होगा? औकात दिखाओ न भाई, आओ और आज़माओ. न कुछ मांगता हूँ, न दुराचार करता हूँ. ऐसा होता तो कब का मार दिया गया होता, या सदा के लिए काल कोठरी में डाल दिया गया होता. इतनी- सी बात आपकी खोपड़ी में क्यों नहीं घुसती. उसमें गोबर भरा है या भूसा?

        अर्धसत्य के कई घटक होते हैं, पर प्रमुख घटक होता है किसी भी विषय में उपलब्ध प्रमाणों में से केवल ऐसे प्रमाणों को चुनना जिनको खींचतान कर इच्छित परिणाम पर पहुंचा जा सके। यह इतिहास नही जादूघर (तिलिस्म)  होता है। 

      मैं केवल उन साक्ष्यों को सामने लाता रहा हूँ जिन पर ध्यान नहीं दिया गया था। कहें, मैं मात्र साक्षात्कार कराता रहा हूं जिससे जादू टूटता है तो सचाई का साक्षात्कार ही आप को चकित कर देता है।  मैं केवल उन प्रमाणों को सामने लाता हूं जो ओझल रह गए थे. स्वयं कुछ नही कहता, मेरी हऱ गतिविधि का काम प्रमाण करते हैं। पहले पात्र बनो, जन्मों की तपस्या के बाद पूर्णत्व मिलता है, मेरे भक्त बनो, तन मन धन, पत्नी बहन बेटी मुझे अर्पित करो : ये मैं नहीं कहता. विश्वास,आस्था,श्रद्धा की माँग भी मैं नहीं करता. मेरे सारे शिविर निःशुल्क होते हैं, अब और क्या चाहिए मुझ से.

     अबिन्दुम् अविसर्गं च अकारं जपतो महान्।

उदेति देवि सहसा ज्ञानौघः परमेश्वरः।।

    बिन्दु और विसर्ग रहित मात्र अकार को जपने से सच्चिदानन्दघन परमात्मा का साक्षात्कार होता है।

अर्थात..”बिन्दु,अर्ध-चन्द्र अ उ म” अर्थात अकार के एक ओर बिन्दु और अर्ध-चन्द्र है और दूसरे ओर उकार और मकार। अब इसे यदि आप एक वृत्त मान लें तो मकार निश्चित रूप से सीधे बिन्दु से जुड कर वृत्त का, अर्थात संसार चक्र का विसर्जन पुनश्च सर्जन के लिये करता है।

      संस्कृत लीपि का ये चमत्कार है कि….”अ”……से लीपि का प्रारम्भ और “ह” अर्थात ह् + अ अर्थात अंत में भी “अ” ही आता है।

   अ का उच्चारण करके देखिए.

अ अर्थात विराट् पुरूष के सहस्त्रों सहस्त्र मुख से समूचा ब्रम्हाण्ड सतत् प्रवाहित हो रहा हो और हूँ कि वर्ण लीपि में स्वतंत्र अक्षर ह् अर्थात अधूरी योनि ही है, प्रकृति अर्थात अकार की वो शक्ति जिसपे अपने स्वामित्व के निर्वहन हेतु अः अर्थात अर्धनारिनाटकेश्वर का भाव सर्वत्र व्याप्त है।

सर्वव्यापकताभूमिर्ज्ञत्वकर्तृकत्व सम्मता।

निजाभासचमत्कारमयी शिवदशा स्मृता॥

    अर्थात स्त्री-तत्त्व, भूमि, भैरवी, प्रकृति अर्थात नकारात्मक उर्जा ही वह महास्रोत है जिससे प्रकट होते हुवे ब्रम्हाण्ड को कोई भी देखता है।

   अर्थात शिव-स्वरूप शक्ति. इसे ही अपने आपको प्रकाशित करता हुवा अपने आपको दिख सकता है। यदि यह उर्जा स्वरूपिणी शक्ति न हो तो अकार अप्रकाशित ही रहता है, वे अपनी स्त्री मायावी शक्ति से ही अपनी सत्ता का विस्तार, पालन और अंततः स्वयम् से स्वयं में ही विसर्जन भी कर लेता हैं।

  उपनिषद कहते हैं :

   मात्राप्तेरादिमत्त्वाद्वाप्नोति ह्वै. 

सर्वान्कामानादिश्च भवति य एवं वेद॥

अर्थात जो जागृत स्थान है वह वैश्वानर व्याप्ति और आदित्व के कारण ओंकार की पहली मात्रा अकार है और जो उपासक इस प्रकार जानते है वह सम्पूर्ण कामनाओं को प्राप्त कर लेते हैं और महापुरुषों में प्रधान होते हैं।

   अकार जहाँ ब्रम्हा को कहते हैं, वहीं यही वाग्देवी सरस्वती भी हैं,अर्थात ब्रम्हा का अपनी पुत्री अर्थात अन्यान्य ककारादि के द्वारा, सरस्वती के द्वारा सृष्टि-सर्जन करने के दृष्टान्त का ये भी सैद्धांतिक रहस्य है।

    बुद्धि की समस्त भूमिकाओं में सबसे परम् अहंकार की भूमिका है, यदि अहंकार का अभाव हो तो बुद्धि का अस्तित्व हो ही नहीं सकता । आप पुरूष इसी लिये पुरूष हो क्यूँ कि आपमें स्त्री के प्रति अहंभाव है, अर्थात आपके अहं की पोषिका स्त्री. यदि यह स्त्री यानि माया अर्थात विसर्ग न हो तो पुरुष मात्र और मात्र पुरु है।

अर्थात पुरु की बीज-शक्ति अर्थात शुक्र स्त्री है और इस स्त्री शुक्र स्वरूपा बीजात्मकीय ऊर्जा के अकार कदापि सृष्टि का सर्जन नहीं कर सकते ऐसा ही वेद और शास्त्र कहते हैं। 

प्रत्यक्षं किम् प्रमाणम् ?

Ramswaroop Mantri

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