सुसंस्कृति परिहार
आजकल अतिक्रमण दस्ता जबरदस्त ताकत से लबरेज हो अपने कार्यों को जिस तरह अंजाम दे रहा है वह चिंतनीय है ।जिधर देखिये उधर शहर-गांव को सुन्दर बनाने का उपक्रम जारी है गरीब गुरबों की बात छोड़ दीजिए ।ये पहला मौका है जब बड़ी तादाद में भगवानों को भी विस्थापन का दर्द झेलना पड़ रहा है । मंदिरों के रोजाना पूजन करने वाले पुजारी भी परेशान हैं।काशी विश्वनाथ मंदिर के आस पास के तमाम भगवानों का अता पता भी नहीं बहुसंख्यक भगवान कहां प्रस्थान किए हैं?लोग उन्हें आज तक ढूंढ रहे हैं।पुजारी भी बैठे डाले बेरोजगार हो गए हैं।

अजीब नजारा है ।मंदिरों को मलवे में बदल भगवानों को अतिक्रमण विहीन मंदिरों में शरण दी गई है ।शिव मंदिर से शिव-पार्वतीजी जी को उठाकर हनुमंत के दरबार में पनाह दी गई है तो सीता माता रामजी के साथ राधाकृष्ण मंदिर में शरणागत हैं ।अब तक ऊंची आसंदी पर विराजे रघुवीर महावीर की छत्रछाया में बैठकी लगाये हुए हैं । दुर्गा, सरस्वती ,लक्ष्मी आदि देवियों का साथ साथ बैठा देखना सुखद लग रहा है राम कृष्ण जी के साथ यूं बैठे हैं जैसे पूछ रहे हों, तुम्ही हो मेरे अवतार ? सीता जी सन्नारियों की तरह मौन हैं तो राधा जी की नजरों में विचलन है ।विघ्नविनायक गणेशजी को शनि महराज का सामीप्य मिला है । भारी भीड़ में घिरे गणेश चौकड़ी भूल गए हैं उनका सारथी क्षतिग्रस्त हुआ है ।चर्चा है ,गणेशजी सुरक्षित हैं खंडित नहीं ।कुछ उनकी पूजा को अनुचित मान रहे हैं ।वे मंदिर धन्य हो गए जहां ज्यादा भगवानों की आमद हुई है ।
बहरहाल, कुछ भगवानों को नया ठिकाना मिल गया है पर कई भक्त परेशान हैं जिस मंदिर तरफ कभी झांका नहीं वहाँ अपने भगवान की खातिर जाना पड़ रहा है अपने इष्ट का ध्यान करने में मन चलायमान हो जाता है ।क्या करें समाज में रहना है तो यहाँ जाना तो पड़ेगा ही ।उधर टूटे मंदिरों के मठाधीशों का हाल ये है कि वे किसी अन्य के अंडर में मंदिर में काम करना तौहीन समझते हैं ठीक भी है दूसरे के मंदिर से उन्हें क्या लाभ मिलेगा ?भगवान भले दूसरे मंदिर में चले गए ,पुजारी जी नहीं जायेंगे ।अत:बेरोजगारी के शिकार हैं । २०-२५ सालों से भी पुराना कारोबार जे० सी० बी० ने मिनटों में लील लिया । उनके परिवार जन जो भगवान के भोगों और चढ़ावों में मस्त थे वे त्रस्त हैं ।कुछ परिवारों में मातमी माहौल है ।जार-जार अश्रु धार बह रही है ।मंदिर के साये में दूकानें चलाने वालों की भी शामत आ गई है ।

सरकार के एक बड़े भक्त प्रवर ने लोगों को दिलासा देते हुये कहा -भगवान जब खुद विपदा में हों तो हम किस खेत की मूली हैं ।कोई कह रहा है अतिक्रमण किया है तो दंड मिलेगा ही ।एक तमककर कहता है-भगवान तो इंसान ने बनाया है ,वरना पत्थर को कौन पूछता ? अबे संभलकर बोल कोई गुर्राया ।एक समझदार बोला -देख भाई सरकार सबसे बड़ी ! भगवान कहां बैठाना है? कहां से हटाना है ये उसका काम है ।तुझे नहीं मालूम भगवान भले मंदिर से हट जायें पर वे अब हमारे दिमागों में बिराजेंगे ।वे प्राईमरी स्कूल से लेकर बड़े बड़े तकनीकी विश्वविद्यालय तक के सिलेबस में आ रहे हैं। विद्या भला बिना भगवान के कैसे संभव है ?भगवान ही तकलीफ, तरक्की, बीमारी, लाभ-हानि और कठिन परीक्षाओं के वक्त काम आता है ।प्रभु से अनुराग और उनका अवलंबन बहुत जरूरी है ।बिना प्रभु के कैसा जीवन ?भाई ,आज जो सरकार है वह यूं ही नहीं बनी उसने भगवान के लिये बड़ी लंबी लड़ाई लड़ी है मंदिर बना ही रहे हैं ।बन जायेगा देर-सबेर। हमारे राम जी ने कितनी धूप, धूल,ठंड ,बरसात, ताप और बर्फबारी सही पर भक्तों को सत्ता सुख दिला दिया और क्या चाहिए ?दीनानाथ है हमारा भगवान खुद दीन और अनाथ है पर भक्तों के सिर पर सदा उसका हाथ है ।
भगवानों के इस विस्थापन से सर्वाधिक प्रभावित है मंदिरों का पुजारी वर्ग ।उनके रोजगार का मसला गंभीर है यूं तो गरीबों की चाय दूकान ,पान की गुमटी, मोचियों की दूकानें, अस्थायी छतरी के नीचे लगी दूकानें हमेशा हटाई जातीं रहीं हैं तथा आगत में भी हटती रहेंगी ।क्योंकि उनकी आहें-कराहें , कभी शाप नहीं बनती लेकिन ब्रह्मणों की शाप के अनगिनत किस्से पौराणिक कथाओं में मौजूद हैं ।शापित हों , इससे पहले इस पहलू पर गंभीर मंथन कर रोजगार का इंतजाम किया जाये काशी के पंडितों की शाप खतरनाक हो सकती है।
मेरा ख्याल है,ऐसे मंदिरों के कुछ प्रकांड पंडितों को स्कूलों में भारतीय संस्कारों के ज्ञान प्रदाता तो बनाया भी जा सकता है ।वे पूजन -अर्चन के तौर तरीके ,विभिन्न कर्मकाण्डों के प्रतिफलन ,ज्योतिष -वर्तमान और भविष्य की श्रेष्ठतम जानकारी के साथ योग ,गीता पुराण और रामायण के लुप्त होते बहुमूल्य तथ्यों से पाश्चात्य रंग रहे लोगों को भटकाव से मुक्त करा सकते हैं मृत भाषा संस्कृत में जान फूंक सकते हैं ।यही शिक्षा है जो इंडिया को भारत बनाने की क्षमता रखती है ।कुलीन अभिजात्य संस्कारों का संसर्ग पा पीढ़ियां कृतार्थ होंगी । वेतन देकर हम यदि अपेक्षा करें कि गुरु समग्र ज्ञान दे पायेगा ऐसी बात सोचना करना फिजूल है पंडितों के उसूल के खिलाफ भी है ।उन्हें गुरू दक्षिणा के साथ छप्पन भोग भी चाहिए बच्चे के जन्म से लेकर ,यज्ञोपवीत, विवाह ,मृत्यु एवं श्राद्ध के क्षेत्र आरक्षित कर देना चाहिए जो इन संस्कारों की उपेक्षा करे ।उसे कठोर दंड दिया जाये ।कब तलक इस इंडिया को ढोते रहेंगें ।सरकार के रिमोट संघ का यह ऐजेंडा भी है। फिर देर कैसी? वैसे भी ब्राह्मण लोग आजकल सरकार से नाराज़ चल रहे हैं।
इधर भगवानों को साथ -साथ पाकर मेरे जैसे कई लोग बहुत खुश हैं ।काश हमारे 33 करोड़ देवी -देवतागण साथ हो जाते ।तो तीरथ यात्राओं से मुक्ति मिल जाती । सरकारी खर्च भी बचता ।ये यात्रायें भी सुरक्षित नहीं रहीं अमरनाथ यात्रा में आतंकी ख़तरा बना ही रहता है ।केदारनाथ का कहर भी सबको अच्छी तरह याद होगा ही ।खतरा क्यों मोल लिया जाये ?हर जिले में एक मंदिर ऐसा बन जाये जिसमें तैंतीस करोड़ देवता विराजमान हो जाएं तो मजा आ जाये। सबसे मिलकर बढ़ती मंहगाई, रोजगार,कोरोनावायरस जैसी बीमारियों को हटाने की प्रार्थना तो कर सकेंगे। कोई ना कोई तो सुन ही लेगा।
विश्वास है, भगवानों का विस्थापन एक दिन हमारी तमन्ना पूरी करेगा।इससे दुखित ना हों।






