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पास्ट की घटना और मेरी प्रजेंट लाइफ 

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         डॉ. विकास मानव

   हिप्टोनिज्म (सममोहन) एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है. इस के ज़रिये आपको आपके पास्ट में ले जाया जा सकता है. लेकिन सम्मोहन से जैसे ही आपको बाहर निकाला जायेगा, आप पास्ट का सब भूल जाएंगे. हाँ, आपने जो भी देखा था और अनुभव किया था उसे रिकॉर्ड करके शोधपरक सर्वें द्वारा प्रमाणित अवश्य किया जा सकता है.

     मेडिटेशन में पास्ट का दर्शन कराने वाली टेक्निक जाति-स्मरण कहलाती है. इसमें आप जो देखते और अनुभव करते हैं, वह कायम रहता है. इसलिए कि आप साधना द्वारा यह अर्जित करते हैं.

     सामान्यतः पास्ट का सबकुछ प्रकृति डिलीट कर देती है. आपको पिछले जन्म का कुछ भी याद नहीं रहता है. प्रकृति की यह व्यवस्था आपके जीवन की हितैषी है. पास्ट का सबकुछ याद रहे तो आपका जीवन नर्क बन जाए. आप न भूत के रह पाएं और न वर्तमान के.

    उन लोगों का पास्ट डिलीट नहीं होता जो लोग सजगता से, द्रष्टा बनकर ‘स्व’ को साधते रहे हैं, चेतना का विकास करते रहे हैं. उनको पास्ट, प्रजेंट, फ्यूचर से सामंजस्य बनाये रखने में भी कोई दिक्कत नहीं होती. इसलिए की वे होश में जीते हैं, होश में ही मरते हैं और होश में ही फिर जन्मते हैं. चेतना का विकास करते-करते एक स्टेज ऐसा आता है कि वे चैतन्य ही बन जाते हैं. यानी अंतत: भगवत्ता को उपलब्ध होकर मोक्ष में स्थित हो जाते हैं.

   मेरा पिछला जन्म वर्तमान एम.पी. में स्थित देवास क्षेत्र के ग्रामीण परिवेष से संबंधित है. भौतिक दृष्टि से ग़रीबी का ऐटमॉस्फीयर. कच्ची मिट्टी का मकान. बहुत ही काम आबादी वाला एरिया. घर में बूढी दादी. सामने बड़ा- सा भू-भाग. उसी पर नीम का पेड़ और अपना एक कुआँ. गाय -बकरी के लिए एक छप्पर भी. चुल्ले में और आलाव में जलाने के लिए कुछ लकड़ियाँ और सूखे झाड-झखाड़.

     मेरा वर्तमान जन्म उत्तर प्रदेश स्थति वाराणसी संभाग अंतर्गत जौनपुर के एक गांव में हुआ. अध्ययनकाल में वाराणसी जनपद से भी मैं सक्रिय रहा. इसका विवरण मैं अगली पंक्तियों में अंकित करूंगा.  

    उपरोक्त से पूर्व : सात सौ तीस वर्ष पहले, अपने पूर्वजन्म में मैं मृत्यु से पूर्व चालीस दिन की एक विशिष्ट ध्यान साधना कर रहा था। उसके बाद मुझे शरीर छोड़ना था। इसके पीछे कुछ कारण थे, लेकिन मैं चालीस दिन पूरे नहीं कर सका। तीन दिन बच गए। वे तीन दिन इस जीवन में पूरे करने पड़े। यह जीवन उसी जीवन के क्रम में है।

     दोनों जन्मों के बीच का जो समय है, उसका इस संदर्भ में कोई अर्थ नहीं है। विशिष्ट चेतना सम्पन्न इंसान का पुनर्जन्म तुरंत नहीं होता. उसके योग्य गर्भ की प्राप्ति नहीं होने तक उसको कुदरत प्रेतयोनि- देवयोनि से परे विशिष्ट लोक में रखती है.

    उस जन्म में जब केवल तीन ही दिन बचे तो मेरी हत्या हो गई। वे तीन दिन बचे रह गए। यदि वे दिन भी पूरे हो जाते तो शायद पुनः जन्म ले पाना संभव न होता। वह जो हत्या थी, वह मू्ल्यवान हो गई।

  इस जन्म में पूर्णत्व के लिए अथक प्रयास करने के बाद मुझे वह उपलब्ध हुआ जो उन ‍तीन दिनों में संभव था। 

     उस जन्म के तीन दिनों के बदले मुझे एक-एक दिन के लिए अनेक वर्ष बिताने पड़े।

    शरीर में रहते हुए समय की जो माप है वह चेतना की अन्य अवस्थाओं के समय से भिन्न होती है। जन्म के समय, समय बहुत धीरे-धीरे चलता है। मृत्यु के समय, समय बहुत तेजी से चलता है।

    हम समय की ग‍‍‍ति को नहीं समझते हैं क्यों‍कि हमारी समझ में समय की कोई गति नहीं है। हम तो बस यही समझते हैं कि सारी चीजें समय में चलती हैं।

     बच्चे के लिए समय की गति बहुत धीमी होती है, लेकिन एक वृद्ध व्यक्ति के लिए बहुत तेज होती है और सघन होती है।

     बूढ़े लोगों के लिए समय छोटे से विस्तार में बहुत तेजी से चलता है, जबकि बच्चों के लिए एक लंबे विस्तार में बहुत तेजी से चलता है, जबकि बच्चों के लिए एक लंबे विस्तार में बहुत धीरे-धीरे चलता है। 

अपने पिछले जन्म के उस साधना काल में बाकी का काम तीन दिन में पूरा हो जाता क्योंकि समय बहुत सघन था. समय बहुत तेज चल रहा था। उन तीन दिनों की कहानी मेरे इस जन्म के बचपन में जारी रही। मेरे पूर्व जन्म में यात्रा अपने अंत पर थी, लेकिन इस जन्म में उस काम को पूरा करने के लिए इक्कीस वर्ष लगे।

     ज्योतिषी को मेरी कुंडली बनानी थी। कुंडली पढ़ने के बाद वह बोला, यदि यह बच्चा सात वर्ष जिंदा रह जाता है, उसके बाद ही मैं इसकी कुंडली बनाऊँगा- क्योंक‍ि इसके लिए सात वर्ष से अधिक जीवित रहना असंभव ही लगता है, इसलिए कुंडली बनाना बेकार ही है।’ मेरे प्राइमरी के टीचर भी शायद ज्योतिष के ज्ञाता थे. एक बार छड़ी से मारने के लिए उन्होंने जब मेरी हथेली अपने सामने पाया तो रुक गए. बोले तुमको कभी नहीं मारूंगा. 

      तब से पूरा मेरा पालनकर्ता परिवार मेरी मृत्यु की इस संभावना से चिंतित रहने लगा। इस जन्म वाली दादी से मैं बहुत प्रेम करता था। दादी भी मुझे इतना प्रेम करती थी कि अपने जीते जी उन्होंने कभी मुझे अपने माता-पिता के पास नहीं फटकने दिया। वे कहती, ‘मेरे मरने के बाद ही तुम इसे अपने पास सुला सकते हो।’

    सात वर्ष की उम्र में मैं बच गया लेकिन मृत्यु का एक गहरा अनुभव मुझे हुआ। अपनी मृत्यु का तो नहीं, लेकिन अपने दादी की मृत्यु का। उनसे मैं इतना जुड़ा हुआ था कि उनकी मृत्यु मुझे अपनी मृ्त्यु ही लगी। 

    मृत्यु के पहले दौर में उनकी आवाज चली गई। चौबीस घंटे तक हम गाँव में ही इंतजार करते रहे कि कुछ हो जाए। लेकिन, कोई भी उनमें सुधार नहीं हुआ। मुझे याद है, किस तरह वे कुछ कहने के लिए क‍ोशिश कर रही थी लेकिन बोल नहीं पा रही थी। वे कुछ कहना चाहती थी लेकिन कह नहीं सकी। 

   हम बैलगाड़ी में लेकर उन्हें शहर की ओर चल पड़े। एक-एक करके उनकी सारी इंद्रियाँ बंद हो रही थीं। वे एकदम से नहीं मरी बल्कि धीरे-धीरे और पीड़ा से भरकर मरी। पहले उनकी आवाज बंद हुई, फिर सुनना बंद हो गया। फिर उन्होंने अपनी आँखें भी बंद कर लीं। बैलगाड़ी में मैं सब कुछ बड़े ध्यान से देख रहा था और बत्तीस साल की यात्रा थी।

    जो कुछ भी हो रहा था, उस समय मुझे अपनी समझ के बाहर लगा। बुद्ध के बचपन की तरह ही यह मेरे सामने हो रही पहली मृत्यु थी. मुझे इतनी भी समझ नहीं थी कि वे मर रही हैं।

    धीरे-धीरे उनकी सभी इंद्रियाँ बंद हो गईं और वे बेहोश हो गई। जब तक हम शहर पहुँचे वे आधे मर चुकी थी। उनकी साँस चलती रही, लेकिन बाकी सब खो चुका था। इसके बाद वे होश में नहीं आई, लेकिन तीन दिन तक साँस लेते रही। वे बेहोश ही मरी।

    इस तरह धीरे-धीरे इंद्रियों का बंद होना और उनका मर जाना मेरी स्मृति पर गहरे अंकित हो गया। उन्हीं के साथ मेरा सबसे गहरा संबंध था। वे मेरा ही एक हिस्सा थी। मैं उनकी मौजूदगी में, उनके प्रेम में ही बड़ा हुआ। जब वे मरी तो मैंने भी उसका अनुभव किया। अब तो मैं खाना भी बड़ी मुश्किल से खा पाता था। अब मैं जीना नहीं चाहता था। वह बचकानी बात थी, लेकिन उससे एक बहुत गहरी घटना घटी :

   तीन दिन तक मैं लेटा रहा, बिस्तर से भी नहीं उठा। मैंने कहा, यदि वे मर गई हैं तो मैं भी जीना नहीं चाहता।’

    सात वर्ष की उम्र से फिर अकेलेपन ने मुझे पकड़ लिया। अकेलापन मेरा स्वभाव हो गया। उनकी मृत्यु ने हमेशा-हमेशा के लिए सब संबंधों से मुक्त कर दिया। उनकी मृत्यु मेरे लिए सब आसक्तियों की मृत्यु बन गई। इसीलिए इसके बाद मैं किसी से भी रिश्ते-नाते का कोई बंधन नहीं बना सका। जब भी किसी के साथ मेरा संबंध ‍घनिष्ठ होने लगता तो वह मृत्यु मेरी ओर घूरने लगती।

    इसलिए, जिनसे भी थोड़ी-बहुत मेरी आसक्ति बनी, मुझे लगा कि आज नहीं कल यह व्यक्ति भी मर सकता है। मेरे लिए प्रेम अनिवार्य रूप से मृत्यु के साथ जुड़ गया। इसका अर्थ हुआ कि मृत्यु के प्रति जागे बिना मैं प्रेम करने में असमर्थ था।

    दोस्ती होती थी, करुणा जगती थी, लेकिन‍ फिर कोई भी बंधन मुझे बाँध नहीं सका। इस तरह जीवन की विक्षिप्तता ने मुझे प्रभावित नहीं किया। इससे पहले कि जीवन की दौड़ शुरू होती, मृत्यु ने मुझे घूरना शुरू कर दिया।

   मेरे जीवन के पहले कदम में ही यह संभावना समाप्त हो गई कि कोई और मेरे जीवन का केंद्र बन जाए। पहला जो केंद्र बना था वह टूट गया, और कहा जाए तो, मैं अपने स्वरूप पर फेंक दिया गया।

    बाद में मुझे लगा कि इतनी कच्ची उम्र में इतने करीब से मृत्यु को देखना मेरे लिए एक छिपा हुआ वरदान बन गया। यदि ऐसी मृत्यु कभी बाद में हुई तो शायद मैं अपनी दादी का कोई और विकल्प खोज लेता। यदि मैं किसी और में उत्सुक हो जाता तो अपनी ओर यात्रा करने के अवसर से चूक जाता। मैं दूसरों के लिए एक अजनबी सा हो गया।

   साधारणत: इसी उम्र में हम दूसरों के साथ जुड़ते हैं, समाज में प्रवेश करते हैं। इसी उम्र में हम उस समाज के अंग बनते हैं जो हमें आत्मसात कर लेना चाहता है। लेकिन मैं कभी भी तथाकथित समाज का हिस्सा नहीं बना। समाज में मैं एक व्यक्ति की तरह घुसा, लेकिन एक द्वीप की तरह अलग-थलग बना रहा।

  वर्तमान जन्म में चौथी कक्षा में पढ़ने के दौरान से ही मैं अदृश्य के दर्शन की दिशा में खोज करने लगा.

    जीवन- जगत के रहस्यों के प्रति रुझान मुझे पास्ट लाइफ से मिली थी. जिज्ञासाएं अनंत थी. समाधान की खोज स्वाभाविक थी.

      शिक्षार्जन के साथ तमाम संतों-फकीरों, औघड़ों-तांत्रिकों और स्व-घोषित भगवानों तक भटकने लगा. किसी से कुछ नहीं मिला. फिर खुद ही साधनाएं करने लगा और ज़िद में बहुत सी सिद्धियां प्राप्त किया.

      आर्य समाज से संपर्क हुआ तो बताया कि गया 25 साल तक की उम्र ब्रह्मचर्य की होती है. इस समय तक स्त्री को छूना, उससे बात करना तो दूर उसको सुनना, उसके बारे में सोचना भी पाप होता है. मैं ब्रह्मश्चर्य साधना में इन्वाॉल्व हो गया.

       गावों में तब बचपन में ही विवाह कर देने का रिवाज था. मेरे लिए लाये जाने ने वाले सारे रिश्तों को मैं मना करता गया.

     बाद में बेलुढ़ मठ (विवेकानंद के गुरू का सेंटर) हावड़ा से कनेक्ट हुआ.

  अब 25 साल का हो गया था. लेकिन आने वाले रिश्तों को अब भी मना करता रहा. इसलिए कि विवेकानंद बनना था. वे अविवाहित थे.

     ऐसे में लोगों को लगा ये या तो संत है या नपुंसक. परिवार- रिस्तेदारी के लोग नाराज होकर, मुझ से कटने लगे.

         इस बीच यूनिवर्सिटी में अध्ययन के दौरान एक ईसाई सहपाठी से मैत्री हुई और फिर प्रेम में बदल गई. प्यार का ऐसा तूफान आया जीवन में कि पिछले सारे आदर्श हवा में उड़ गए. मैंने डिक्लेयर कर दिया कि शादी इससे ही करूंगा.

     यहीं से ज़माना दुश्मन बन गया. घर वालों के हाथ से दान- दहेज गया. दूसरी तरफ लड़की विजातीय ही नहीँ विधर्मी भी. हालात इतने बिगड़े कि मुझे चल-अचल सम्पत्ति से लीगली बेदखल कर दिया गया.

    वाराणसी शहर आकर “आज” नामक अख़बार में साहित्य सम्पादक का दायित्व स्वीकारा. शहर में सिफ्ट हुआ और सब ठीक से चलने लगा.

      प्रेमिका ने बॉडी रिलेशन की डिमांड की. “शादी से पहले पाप” कहकर मैं मना कर दिया. अब तक के साधनाओं वाले जीवन का असर था. आज के स्टेज पर होता तो मना नहीं करता.

     अगले दिन पता चला की वो प्रेमिका तो पिछले कुछ माह से मेरे एक इंडस्ट्रिलिस्ट मित्र के साथ एक होटल में खुद को शेयर करती है. अब सच तो पता करना था ही. कोशिश किया तो दोनों को रंगे हाथ पकड़ा.

     उसके रोने-गिड़गिड़ाने और अब ऐसा नहीँ करने की बात कहकर बारबार शॉरी बोलने पर मैंने माफ कर दिया उसे. सोचा इतनी सिद्द्त से इसे प्यार किया हूँ, एक मौका तो देना ही चाहिए.

      लेकिन~

 उसी दिन की रात वो अपने प्रेमी से मुझ पे प्राणघातक हमला करवा दी. टेरिस पर सोया था. वो सफल नहीँ हुआ, मैं किसी तरह कुदकर भाग निकला.

     जान तो बची, मगर सब कुछ ख़त्म हो गया. घर से भी गया और घाट से भी. गंगा तट पर पंहुचा और सोचने लगा की अब ऎसी जान किस काम की. पागलखाने में भर्ती होना या पागल बनकर सड़क पर भटकना मंज़ूर नही था. शरीर से मुक्त होना ठीक लगा.

       गंगा में विसर्जित होने लगा कि, किसी ने धक्का देकर पीछे फेक दिया. आवाज आई कि : तू सक्षम है. और भी अधिक सक्षम बन. कम से कम उनके लिए जी, जो तेरे जैसी दशा में लाये जाते हैं.

   तमाम कोशिश के बाद भी कहीं कोई नहीं दिखा. देवात्मा थी या प्रेतात्मा : पता नहीँ चला. लेकिन उसकी ये बात मेरे मस्तिष्क में बैठ गई.

      बेलुढ़ मठ हावड़ा के यूपी (कानपुर) सेंटर आया. सब कुछ जानने के बाद ये लोग मुझे अमेरिका भेज दिये. वहाँ से मनोचिकित्सा और मेडिटेशन में डॉक्टरेट किया.

     इण्डिया वापस लौटकर मुंबई में 2000/- फीस पर मात्र 50 पेसेंट देखकर डेली एक लाख कमाने लगा. यानी महीने में कम से कम 30 लाख. करता क्या इतने पैसे?

       बसा सकता था घर. अब भी बसा सकता हूँ. मुझ से ऐसा चाहने वालियों की लाइन कभी ख़त्म नहीं होती. मगर प्यार बिना ये बसावट नर्क होगी. वास्तविक रूप से, सुपर लेबल पर, मेरे स्तर का प्यार कहीं दिखता नहीँ आज धरती पर. आज प्यार के मायने ही अलग हैं.  स्वार्थ, शोषण, व्यापार और बलात्कार ही अब प्यार है.

   कभी किसी गर्ल/फीमेल में मेरे प्रति वास्तविक प्यार दिखा तो, कर लूंगा शादी. फिर से कमर्शियल बन जाऊंगा, फ्री सेवा देना बंद कर दूंगा.

       तो अपनी कमाई के सब पैसे डोनेट करने लगा. बाद में पता चला कि जिन असहाय लोगों के लिए मैं डोनेट करता हूँ — उनको कोई लाभ इसका नहीँ मिलता. दान लेने वाले लोग खा जाते हैं.

    मुझे लगा मैं खुद ही निःशुल्क हो जाऊं – हर जरुरतमंद को सीधे मुझ से लाभ मिले.  निशुल्क सेवा देने का मिशन यहाँ से शुरू हुआ.

        अब देश- विदेश में मेरे कैम्प लगते हैं. मन और मन से उपजे तन के रोगों का निवारण करने के साथ ध्यान का प्रशिक्षण भी जरूरतमंदो को देता हूँ. इसके आलावा 16 से 60 साल तक के नामर्दों का इलाज़ करके, उनको स्त्री के लिए पर्याप्त सेक्स करने की केपेसिटी भी देता हूँ.

     इस रियलिटी से हॉटेस्ट गर्ल्स/विमेंस को लगता है कि अगर खुद यह इंसान ही मुझे सुलभ हो जाये तो ख़ुशी-तृप्ति का कितना बेहतर स्टेज देगा. इसलिए वे हर क़ीमत चुकाने की तैयारी के साथ लाइन लगी रहती है : वन-नाईट के लिए, मेरे जैसी एक संतान के लिए, एक बार या बारबार की फीलिंग्स के लिए. मग़र~

   मै योगी_ध्यानी डॉक्टर हूँ. अपनी ऊर्जा ऐसे बर्बाद नहीं क़र सकता. दुराचारी बनने का अर्थ है : जिस विद्या/साधना/क्षमता के बल पर मैं समाधान देता हूँ — वह सब स्वाहा. मेरा पेनिस उसका ही होगा जो, पूरी सिद्द्त से जुड़ेगी.

      इसका मतलब यह भी नहीं कि मैं सब को निराश करता हूँ. उन्हें जो चाहिए, मिलता है. उनको सुपर ऑर्गज्मिक भी स्टेज देता हूँ : बस पेनिस यूज़ नहीं करता. उनको आम खाकर- चूसकर तृप्त होने से मतलब होता है, गुठली से किसी को मतलब क्यों होगा.

     मेरे पास इसके लिए मेडिटेशन थेरेपी, टच/मसाज थेरेपी, प्राणिक हीलिंग, ऊर्जाट्रांसफर थेरेपी, योनिमसाज/योनिपूजा थेरेपी का मेथड है. पूरी तरह संतुष्ट होकर देश-विदेश की हर गर्ल्स/विमेंस ने यही कहा है : “मेरा काम कल्पना से भी अधिक बेहतर हो गया. अब बस.”

     मेरी नज़र में बिना समग्र प्यार के, पेनिस वाला सेक्स जानवर करते है. यह पाप हो या न हो लेकिन ज़हर जरूर सावित होता है. खासकर गर्ल्स -विमेंस के लिए. अवसाद, आत्मग्लानि, अपराधबोध, होर्मोन्स का असंतुलन, आर-एच फैक्टर में व्यवधान, मन और फिर तन के रोग.

    हमारी सारी सेवाएं निःशुल्क हैं. सिर्फ़ होमसर्विस स-शुल्क है. होमसर्विस का पैसा भी मुझे नहीं मिलता. अनाथ बच्चों को बचपन- अध्ययन का अनुभव देने के लिए सक्रिय “ज्योति अकादमी” ट्रस्ट मुझे मैनेज करता है. यह पैसा पार्टी डायरेक्ट इस ट्रस्ट को ही भेजती है. मुझे सिर्फ यात्रा-व्यय, भोजन और आवास संबंधी जरूरतपूर्ति की चाह रहती है.

    अब मैं पुनः जन्म ले सकता हूँ, लेकिन प्रकृतिगत विवसता से नहीं अपनी इच्छा से, किसी प्रयोजन से।  यह इस पर निर्भर करता है कि मुझे उसका कोई उपयोग नजर आता है या नहीं। अब इस पूरे जीवन में मैं ये देखूँगा ‍कि और जन्म का कोई उपयोग है या नहीं।

    यदि एक और जन्म लेने जैसा लगा तो ठीक है, वरना काम पूरा हुआ और अब आगे किसी प्रयास की जरूरत नहीं है.

Ramswaroop Mantri

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