
डॉ हिदायत अहमद खान
गुजरात के अहमदाबाद में संपन्न हुआ कांग्रेस का दो दिवसीय अधिवेशन महज एक औपचारिक सभा नहीं थी, बल्कि इसे एक सियासी पुनर्जागरण के तौर पर देखा जाना चाहिए। दशकों से गुजरात की सत्ता से बाहर कांग्रेस ने यहां से एक नई रणनीति, नई चेतना और शायद एक नए आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने की कोशिश की है। कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी के बयानों से स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि पार्टी अब आक्रामक तेवरों के साथ मैदान में उतरने के मूड में है।
दरअसल अधिवेशन की शुरुआत करते हुए मल्लिकार्जुन खड़गे ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन की पारदर्शिता पर सवाल उठाए और बैलेट पेपर से चुनाव कराए जाने की मांग भी रखी। खड़गे कहते हैं कि सरकार ने एक ऐसी तकनीक अपनाई हुई है जिससे विपक्ष को नुकसान पहुंचाया जा सके। उन्होंने महाराष्ट्र चुनाव का हवाला देते हुए कहा कि 150 सीटों में से 138 सीटों पर बीजेपी की जीत संदिग्ध है। खड़गे ने यह कहकर सरकार पर आरोप ही नहीं लगाए बल्कि उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं और देश के मतदाताओं में यह विश्वास पैदा करने की कोशिश की है, कि ईमानदार चुनावों के जरिए सत्ता परिवर्तन संभव है। वहीं राहुल गांधी ने अपने सशक्त भाषण से अधिवेशन में जहां जान फूंकने का काम किया वहीं पार्टी से जुड़े लोगों को एक पार्टी विचारधारा के तहत एकजुट होकर मैदान में आने का आव्हान भी किया है।
उन्होंने यहां वक्फ संशोधन कानून पर बीजेपी पर सीधा हमला बोला और इसे ‘फ्रीडम ऑफ रिलीजन’ और संविधान पर हमला करार दिया है। साथ ही, उन्होंने गुजरात में कांग्रेस के भीतर व्याप्त गुटबाजी पर खुलकर बात की और यह स्वीकार किया कि पार्टी के कुछ नेता जनता से कटे हुए हैं या विरोधी दलों से मिले हुए हैं। पार्टी के शीर्ष नेताओं का यह आत्ममंथन इस बात की ओर इशारा करता है कि कांग्रेस अब संगठनात्मक शुद्धि की दिशा में भी कदम बढ़ा रही है। यह एक तरह से देर आयद दुरुस्त आयद को ही चरितार्थ करने जैसा है। इस पर दो दशक पहले ही विचार कर लिया जाना चाहिए था, तब शायद पार्टी को इतना ज्यादा नुक्सान भी नहीं हुआ होता। नेताओं की आपसी खींचतान और बेमानी रुतबे के कारण पार्टी रसातल पर पहुंच गई। पहले एक-एक कर कांग्रेस के गढ़ कहे जाने वाले राज्य हाथ से जाते गए और फिर केंद्र में भी पकड़ ढीली हो गई।
नतीजा यह हुआ कि पार्टी के साथ नेताओं का भी बर्चस्व जाता रहा और स्थानीय स्तर पर भी कांग्रेस का वो कद नहीं रहा जो पहले कभी हुआ करता था। इस स्थिति से पार्टी को उबारने के लिए राहुल गांधी और उनकी सीमित टीम जी-जान से लगी रही। यहां कहना गलत न होगा कि राहुल की मेहनत पर पानी फेरने का काम विरोधी सियासी पार्टियों और उनके नेताओं ने उतना नहीं किया जितना कि खुद कांग्रेस के असंतुष्ट नेताओं ने किया। बात अगर गुजरात राज्य की ही कर लें तो यहां कांग्रेस पिछले तीन दशकों से सत्ता से बाहर है। ऐसे में दावा किया जा रहा है कि गुजरात में युवाओं की एक ऐसी पौध तैयार हो चुकी है जिसे शायद यह भी न पता हो कि कांग्रेस की रीति-नीति और उसकी सरकार क्या और कैसे काम करती है। बहरहाल यह कहने की बात है, क्योंकि यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि गुजरात में कांग्रेस का लगभग 30 प्रतिशत वोट शेयर है, जो यह संकेत देता है कि पार्टी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। पार्टी की नीति और रीति के प्रति जनता में लोकप्रियता बरकरार है। बस चुनाव के दौरान चाहने वालों और प्रशसंकों को वोट में कनवर्ट करने का जादू और फार्मूला पार्टी नेताओं ने भुला दिया है। यह कम बात नहीं है कि राहुल गांधी ने गुजरात में कांग्रेस की कमजोरी को स्वीकारा है और यह भी कहा है कि अगर संगठन में 30-40 लोगों को हटाना पड़े तो वो इसके लिए तैयार हैं। यह बयान न सिर्फ कांग्रेस की नीयत को दिखाता है, बल्कि एक नई शुरुआत की मंशा भी जाहिर करता है।
पिछले 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने गुजरात में एक सीट जीती और करीब 31 प्रतिशत वोट हासिल किए थे। यह नतीजा भले ही मामूली हो, लेकिन कांग्रेस के लिए यह मनोवैज्ञानिक जीत थी, खासकर पिछले चुनाव में मिली करारी हार के बाद यह ऑक्सीजन जैसी प्रतीत हुई है। अब जबकि विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी के साथ कांग्रेस का गठबंधन टूट चुका है, कांग्रेस को अकेले ही गुजरात में अपनी जमीन फिर से तैयार करने के लिए आगे बढ़ना चाहिए। वैसे भी पार्टी अधिवेशन के जरिए कांग्रेस ने एक बार फिर यह जतला दिया है कि वह गुजरात को हल्के में नहीं ले रही है। संगठन निर्माण, जनसंपर्क और आक्रामक राजनीति के जरिए वह बीजेपी को टक्कर देने की तैयारी कर रही है।
हालांकि अभी बीजेपी गुजरात में बेहद मजबूत है, लेकिन राजनीति संभावनाओं का खेल है। अगर कांग्रेस अपने संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत कर पाती है, नए और प्रभावशाली नेताओं को उभारती है और जनता से सीधा संवाद कायम करती है, तो आने वाले वर्षों में वह फिर से राज्य की राजनीति में दमदार वापसी कर सकती है। अंतत: इस अधिवेशन से कोई जादुई मंत्र तो निकलता हुआ नहीं दिखा, लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि कांग्रेस ने अपने घर को सजाने-संवारने के साथ ही एक विचारधारा के सूत्र में पार्टी को पिरोने का जो काम शुरू किया है यही शायद जीत की पहली शर्त होती है।





