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ईडी की साख पर सवाल? आधी-अधूरी चार्जशीट, दस्तावेजों का गायब होना

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सनत जैन

नेशनल हेराल्ड मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को दिल्ली की राउ एवेन्यू कोर्ट से एक बडा झटका लगा है। जब अदालत ने सोनिया गांधी और राहुल गांधी एवं अन्य आरोपियों को नोटिस जारी करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा जब तक ईडी अपनी चार्जशीट के साथ सभी आवश्यक दस्तावेज पेश नहीं करती है, तब तक किसी भी आरोपी को कोर्ट नोटिस जारी नहीं करेगी। अदालत की यह कार्यवाही कानूनी प्रक्रिया की पारदर्शिता एवं न्यायपालिका की विश्वसनीयता के लिए जरूरी है।

यह इसलिए भी जरूरी हो जाता है, क्योंकि चार्ज शीट में विदेशी नागरिक को भी आरोपी बनाया गया है। इतने महत्वपूर्ण केस में ईडी की यह लापरवाही जांच एजेंसी की जिम्मेदारी और गंभीरता पर सवाल खड़े करती है। चार्जशीट किसी भी आपराधिक मामले की बुनियाद होती है। जांच मे आरोपियों के खिलाफ साक्ष्यों को जुटाती हैं। चार्ज शीट में जांच अधिकारियों द्वारा जो दस्तावेज प्रस्तुत किए जाते हैं। उसी के अनुसार न्यायालय को मुकदमे की सुनवाई करनी होती है। न्यायालय को न्याय करने में चार्ज शीट ही महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है।

किसी व्यक्ति को अदालत में तलब किया जाए या नहीं, यह देखना न्यायालय का काम है। चार्ज शीट में कानून के हिसाब से जांच एजेंसी ने सही तरीके से जांच की है, या नहीं की है। जांच के दौरान अपराध से संबंधित दस्तावेज चार्ज शीट में संलग्न हैं या नही हैं। इसे अदालत शुरुआत में ही देखती है। किसी भी तरह की कमी होने की स्थिति में न्यायालय चार्ज शीट को स्वीकार नहीं करती हैं। न्यायालय, चार्ज शीट स्वीकार करने के पहले जांच एजेंसी को सही तरीके से जांच कर दस्तावेज प्रस्तुत करने का आदेश देती है। चार्ज शीट में जरूरी दस्तावेज नहीं हैं, तो इसका सीधा असर न्यायिक प्रक्रिया पर पड़ता है।

कोर्ट की इस चेतावनी से यह साफ है, जांच एजेंसियां किसी दबाव में कार्य न करें। जांच एजेंसी जांच के दौरान मुकदमे के लिए आरोपी के खिलाफ या आरोपी के पक्ष में जांच में जो भी दस्तावेज उपलब्ध हुए हैं, उन्हें चार्ज सीट में संलग्न करे। दस्तावेजी साक्ष्यों और सबूत के आधार पर ही मामले की सुनवाई शुरु की जाती है। यह मामला पिछले एक दशक से राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का केंद्र रहा है। कांग्रेस इसे बदले की कार्रवाई कहती रही है। गांधी परिवार के ऊपर इसे एक राजनीतिक हमले के रूप में बताया जा रहा है। ईडी ने जो आरोपी बनाए हैं, उसमें सोनिया गांधी, राहुल गांधी और कांग्रेस के कई बड़े नेता शामिल हैं।

सत्तारूढ़ पक्ष इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई बता रहा है। सबसे ज्यादा समय तक इस मामले की जांच चली है। अदालत के इस निर्देश से स्पष्ट है, आरोप कितने भी गंभीर हों, सक्षम जांच एजेंसी ने जब जांच की है, ऐसी स्थिति में न्यायालय के समक्ष सबूतों और साक्ष्यों को रखा जाए। बिना इसके न्यायालय किसी पर भी कार्रवाई नहीं कर सकता है। न्यायालय के सामने दोनों ही पक्ष समान रूप से अधिकार रखते हैं। न्यायालय द्वारा न्याय के लिए दोनों ही पक्षों को समान अवसर दिए जाते हैं।

न्याय के लिए यह देखना जरूरी होता है। ईडी जैसी संवैधानिक संस्था का यह कानूनी एवं नैतिक दायित्व है। वह प्रत्येक दस्तावेज को गंभीरता के साथ न्यायालय के सामने प्रस्तुत करे। इस मामले में कोर्ट की टिप्पणी से स्पष्ट है, न्याय प्रक्रिया में जल्दबाज़ी या लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं है। जब तक न्यायालय में अपराध सिद्ध ना हो जाए तब तक दोनों ही पक्षों को समान अधिकार संविधान और कानून से प्राप्त हैं। यह मामला केवल राहुल या सोनिया गांधी तक सीमित नहीं है। यह मामला भारत की जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता और न्याय पालिका की गरिमा और विश्वसनीयता से जुड़ा है। कहते हैं कि जान-बूझकर जांच एजेंसी दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर रही है। मुकदमा शुरू करने के पहले उन्हें प्रस्तुत करना जांच अधिकारियों का दायित्व है। इस मामले की 2 मई को अगली सुनवाई है। तब स्पष्ट होगा, ईडी ने जो जांच की है।

सभी नियम और कानून का पालन करते हुए दस्तावेजी सबूतों को एकत्रित किया होगा। जो नियम हैं, उसके अनुसार जांच की है, या नहीं। जांच एजेंसी द्वारा किसी दबाव में आकर यदि किसी व्यक्ति या समूह को प्रताड़ित किया जा रहा है, इसकी प्रारंभिक जांच करना अदालत का कर्तव्य है। न्यायालय में आरोप पत्र के आधार पर मामला चलने योग्ग है या नहीं इसका फैसला न्यायालय को करना होता है। इस प्रक्ररण में पिछले 10 साल से सीबीआई और ईडी जैसी संवैधानिक संस्थाएं जांच करती आई हैं।

आरोपियों से कई दिनों तक पूछताछ की गई है। वर्षों पुराने इस मामले में जांच एजेंसियों ने हर स्तर पर जांच करके यदि मामला अपराधिक पाया तो यह जांच एजेंसी की जिम्मेदारी है, कि वह जांच से संबंधित सभी दस्तावेजों को चार्ज शीट के साथ संलग्न करे। न्यायालय को जब यह विश्वास हो जाता है कि मुकदमा चलाए जाने के लिए पर्याप्त आधार है। तभी मुकदमा न्यायालय में शुरू किया जा सकता है। उसके बाद ही आरोप तय किए जा सकते हैं, उसके पहले नहीं। यदि ऐसा किया गया तो दोनों पक्षों में से किसी न किसी एक पक्ष को प्रताड़ना सहना पड़ सकती है। वहीं पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में इसका लाभ आरोपियों को मिल सकता है। यह देखना न्यायालय का काम है। न्यायालय ने अपने दायित्व को बखूबी निभाया है। इससे न्यायपालिका की साख बढ़ती है। लोगों का विश्वास भी न्याय व्यवस्था पर बढ़ता है। ट्रायल कोर्ट ने अपने दायित्व का सही तरीके से निर्वहन किया है। यही कहा जा सकता है।

Ramswaroop Mantri

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