अनिल कर्मा
नवग्रह की नगरी खरगोन अपने नवग्रह मेले के बहाने दो साल के ‘कोरोना-कारावास’ से बाहर निकलने की कोशिश कर ही रही थी कि उसे फिर ‘नजर’ लग गई। सांप्रदायिक उन्माद ने आंसू दिए, तो सियासत ने पहले उस खारे पानी में ‘खून’ मिलाया और अब कड़वा ‘जहर’ भी मिला रही है। पूरी मुस्तैदी है कि कहीं बेहयाई और बदनीयती में कोई कमी न रह जाए। कदाचित सियासत भी नफरत फैलाने के अपने धंधे पर दो साल के ‘लॉकडाउन’ की पूरी ‘पूर्ति’ खरगोन से ही कर लेना चाहती है। ऐसे बयान, ऐसे तर्क और ऐसी हरकतें सामने आ रहीं हैं कि शर्म भी पथरा जाए। कुछ ‘अभूतपूर्व’ टाइप के ‘पूर्व’ तो जैसे ‘उत्सवी उत्साह’ में हैं। मानो इस बात की ‘सुपारी’ ले रखी हो कि कहीं से भी कुछ भी जुटाकर वे इस उष्ण-उर्वरा जमीन को कुंदा के पाषाण तटों में तब्दील करके रहेंगे।
क्या यह सचमुच दो संप्रदायों की लड़ाई है? क्या कोई वाजिब मुद्दा था इस लड़ाई का? या यह शुद्ध सियासत है? महज वोटों का ‘खेल’ ? क्या उत्तरप्रदेश सहित पांच राज्यों के चुनाव परिणामों के बाद आगे की जो ‘झांकी’ दिख रही है, उसके उत्साह-अतिरेक या गहन-चिंता के चलते ध्रुवीकरण के ‘गणित’ इस विधि से हल किए जा रहे हैं? कांग्रेस-भाजपा की मिली-जुली पैठ वाले खरगोन जिले में पिछले चुनावों में 6 विधानसभा सीटों में से 5 पर कांग्रेस और एक पर निर्दलीय की जीत हुई थी, बाद में बड़वाह विधायक ने कांग्रेस से भाजपा में छलांग लगा ली। क्या ये नंबर ही इस ‘बवंडर’ के मूल में है?
देश की बात करें तो खरगोन अकेला शहर नहीं जहां रामनवमी पर ‘आग’ भड़की। छह राज्यों के अलग-अलग शहरों में ऐसा ही ‘खेला’ खेला गया। गुजरात, झारखंड, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक और दिल्ली में। और अब हनुमान जयंती पर फिर दिल्ली का दिल दुखा। सब में एक बात कॉमन। पत्थरबाजी। तो क्या यह कोई राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र है? क्या कश्मीर में चलने वाले ‘नापाक पत्थर’ वहां से 370 हटाए जाने के बाद देश के कोने-कोने में भेजे जा रहे हैं? क्या यह ‘कश्मीर फाइल्स’ के बहाने बेपर्दा हो रही सच्चाई के खिलाफ ‘रिएक्शन’ है? या कहीं ऐसा तो नहीं कि राम मंदिर का निर्माण अयोध्या के (और देशभर के भी) हिंदू-मुस्लिमों में तो प्रत्यक्ष-परोक्ष रोजगार की आस जगा रहा हो, लेकिन कई सियासत-दाँओं को अपना ‘रोजगार’ खोने का भय सता रहा हो, और इसलिए रामनवमी पर उन्होंने ‘घृणा का ठेला’ लगा लिया हो? सवाल कई हैं। और ये सारे सवाल चूंकि ‘पत्थरों’ ने खड़े किए हैं इसलिए जवाब भी लिजलिजे नहीं चलेंगे, ठोस ही खोजने होंगे। खरगोन की बात पर लौटें तो शरारती तत्वों के निरंकुश और तयशुदा बवाल के बाद बुलडोजर लेकर ‘तीव्र’ हरकत में आए हुक्मरानों से पूछा जाना चाहिए कि ‘शांति की गारंटी’ लेने वाली सरकार के होते हालात आखिर यहां तक पहुंचे कैसे? इतने संवेदनशील शहर में ऐसे संवेदनाहीन अफसर आखिर क्यों तैनात कर दिए गए? कब, किसने इन नए, अनुभव से खाली और अव्यवहारिक अफसरों की पूरी फौज यहां भेज दी? ऐसी कौन सी ट्रेनिंग लेकर आए हैं ये जो दफ्तर को ही ‘आखिरी दरवाजा’ समझते हैं और ‘शांति समिति’ को ही शहर। जागरुक, बौद्धिक और सक्रिय लोगों से मिलने तक में जिनकी कोई रुचि नहीं। जिनका अपना कोई खुफिया तंत्र नहीं। जो न शहर का इतिहास-भूगोल जानते हैं और न बाशिंदों की तबियत का भौतिक-रसायन। वरना ऐसा कैसे हो सकता है कि कुल जमा डेढ़-दो लाख आबादी और 66-33 के हिन्दू-मुस्लिम अनुपात के 8-10 संवेदनशील गलियों वाले शहर में एक आकार-प्रकार के पत्थर,डंडे, पेट्रोल बम इकट्ठा किए जाते रहें और प्रशासन को इसकी भनक तक नहीं लगे? एक साथ चार जगह से पत्थरों की बरसात होने लगे और अफसर ‘फोर्स नहीं है..’ का बोर्ड टांगे यही तय ना कर पाए कि कहां कैसे निपटना है? पांच घंटे तक कर्फ्यू को लागू न करवाया जा सके, रातभर आगजनी होती रहे और लोगों को अपने स्तर पर कॉलोनी-कॉलोनी में उपद्रवियों का सामना करना पड़े? कर्फ्यू के पांच-छह दिन बाद तक हरकतें बदस्तूर जारी रहें और बाहरी तत्व आकर अपना ‘काम’ दिखाते रहें?
सवाल तो लोकतंत्र में जनता की असल आवाज माने जाने वाले विपक्ष से भी पूछे जाने चाहिए। न्याय दिलाने के लिए आवाज उठाते समय ‘जनता’ की उनकी परिभाषा इतनी सिकुड़ क्यों जाती है? उनका ‘सद्भाव’ एकतरफा क्यों है? उन्हें जला दिए गए आशियानों की पीड़ा आखिर क्यों महसूस नहीं होती? आरोपियों के गैरकानूनी निर्माणों को तोड़े जाने पर इतना ‘मातम’ करने वालों को एक मासूम किशोर के हाथ-पैर तोड़ दिए जाने पर आंसू तक क्यों नहीं आते? उनकी डिक्शनरी में शब्दों के अर्थ गिरगिट की तरह रंग क्यों बदलते हैं? बिहार के फर्जी फोटो को खरगोन का बताकर जो सवाल उठाया गया, वही सवाल जुलूस पर पथराव के असल फोटो और वीडियो पर क्यों नहीं उठा? बहुत हल्का होने के बावजूद यह सवाल भी पूरी ताकत से पूछा जाना चाहिए कि समय-समय पर पेट्रोल की बढ़ती कीमतों का विरोध करने के पीछे कहीं पेट्रल-बम की लागत बढ़ जाने की चिंता तो नहीं रही? आखिर ऐसे बम वालों से सहानुभूति का सच्चा ‘आधार’ क्या है?
सवाल तो उठाने होंगे। अभी तरह-तरह से भरमा रहे और अपना-अपना पाला संभाल रहे ‘जादूगर’ थोड़े ही समय बाद जनता के बीच झोली फैलाए खड़े होंगे। तब समानता और सुशासन की बात करने वालों से सिर्फ वोट देते समय नहीं बल्कि हाथ हिलाते-मिलाते-उठाते समय हर बार लीजिएगा इस चोट का हिसाब। पूछिएगा- आपके दो दल, दो पक्ष, दो मकसद, दो मतलब, दो विचारधाराएं और दो मानसिकताएं होंगी, रखिए, लेकिन समाज, सद्भाव और सौहार्द को इस तरह दो फांक करने की इजाजत आपको किसने दी? आपके अलग-अलग चश्मों और उनके अनुरूप चली गई चालों ने जो खाई पैदा की है, उसे हम क्यों झेलें? खरगोन क्यों झेले? देश क्यों झेले? बार-बार क्यों झेले?
एक देश-एक संविधान की तर्ज पर ‘एक चश्मा-एक नजर’ होने तक पत्थरों से ज्यादा कठोर सवाल इन ‘पत्थर दिलों’ से करना हर अमन-पसंद नागरिक का कर्तव्य हो जाता है क्योंकि शांतिपूर्ण जीवन हम सबका मौलिक अधिकार है। हमेंशा।
सवाल ‘पत्थरों’ ने खड़े किए हैं तो जवाब भी लिजलिजे नहीं चलेंगे, ठोस ही चाहिए





