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राष्ट्र चिंतन : बुल्डोजर’न्याय,  विध्वंसक’अभियान और कानून

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 प्रिया सिंह

       _देश पिछले कुछ हफ्तों से विध्वंस अभियान का उन्माद देख रहा है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 300A में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि “कानून के अधिकार के बिना किसी भी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जाएगा।”_

        बुलडोज़र के माध्यम से त्वरित ‘न्याय’ सुनिश्चित करने का विचार उत्तर प्रदेश में उत्पन्न हुआ। नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 के विरोध में उत्तर प्रदेश सरकार ने सार्वजनिक संपत्ति को नष्ट करने में कथित रूप से शामिल लोगों से हर्जाना वसूलने के आदेश पारित किये।

        राज्य सरकार का दावा है कि ये विध्वंस, अवैध अतिक्रमण के जवाब में हैं। हालाँकि तथ्य यह है कि ये मनमाने ढंग से विध्वंस एक विशेष समुदाय के कथित दंगाइयों के खिलाफ किये जा रहे हैं और इसका उद्देश्य दंगों में शामिल लोगों को सामूहिक रूप से सज़ा देना है। 

*विध्वंस अभियान कैसे समस्याग्रस्त :*

     पर्याप्त आवास का अधिकार: आवास का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत  एक मौलिक अधिकार है। 

       _ICESCR: आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय वार्ता (ICESCR) का अनुच्छेद 11.1 “पर्याप्त भोजन, कपड़े और आवास सहित अपने एवं अपने परिवार के लिये पर्याप्त जीवन स्तर, रहने की स्थिति में निरंतर सुधार के लिये सभी के अधिकार” को मान्यता देता है।_

       इसके अलावा अनुच्छेद 11.1 के तहत पर्याप्त आवास के अधिकार जैसे इन अधिकारों की प्राप्ति सुनिश्चित करने के लिये देश “उचित कदम” उठाने के लिये बाध्य हैं।  

       ICESCR के तहत मान्यता प्राप्त अधिकारों को राज्यों द्वारा केवल तभी प्रतिबंधित किया जा सकता है जब कानून द्वारा इन अधिकारों की प्रकृति के अनुकूल और पूरी तरह से समाज के सामान्य कल्याण को बढ़ावा देने के लिये सीमाएँ निर्धारित की जाती हैं।

 हालाँकि वाचा में दिये गए अधिकारों जैसे पर्याप्त आवास के अधिकार पर लगाए गए किसी भी प्रतिबंध से इन अधिकारों का हनन नहीं हो सकता है। ICESCR इन्हें विशेष रूप से अनुच्छेद 5 में मान्यता देता है। 

      _अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानून की रूपरेखा: यह अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानून ढाँचे के तहत एक अच्छी तरह से प्रलेखित अधिकार भी है, जो भारत पर बाध्यकारी है।_

       उदाहरण के लिये मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा (UDHR) के अनुच्छेद-25 में कहा गया है कि “हर किसी को अपने और अपने परिवार के स्वास्थ्य एवं कल्याण के लिये पर्याप्त जीवन स्तर को बनाए रखने का अधिकार है, जिसमें भोजन, कपड़ा, आवास तथा चिकित्सा शामिल है। 

इसके अलावा अंतर्राष्ट्रीय कानून किसी व्यक्ति के संपत्ति के अधिकार में मनमाने हस्तक्षेप को भी प्रतिबंधित करता है। उदाहरण के लिये UDHR के अनुच्छेद 12 में कहा गया है कि “किसी की भी गोपनीयता, परिवार, घर या पत्राचार के साथ मनमाने ढंग से हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा, न ही उसके सम्मान एवं प्रतिष्ठा पर हमला किया जाएगा”।

      _अनुच्छेद 12 यह भी निर्धारित करता है कि “हर किसी को इस तरह के हस्तक्षेप या हमलों के खिलाफ कानून के तहत संरक्षण का अधिकार है”।_

       ICCPR: नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय प्रतिज्ञापत्र (ICCPR) के अनुच्छेद 17 में यह भी प्रावधान है कि प्रत्येक व्यक्ति को एकल एवं सामूहिक रूप से संपत्ति का अधिकार है और किसी को भी उसकी संपत्ति से मनमाने ढंग से वंचित नहीं किया जाएगा।

     इस प्रकार किसी व्यक्ति की संपत्ति में मनमाना हस्तक्षेप करना ICCPR के नियमों का घोर उल्लंघन है। 

*संबंधित सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय :*

       ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे नगर निगम निर्णय 1985, (Olga Tellis vs Bombay Municipal Corporation judgment in 1985): न्यायालय ने निर्णय दिया कि फुटपाथ पर रहने वालों को बिना तर्क के बल प्रयोग कर तथा उन्हें समझाने का मौका दिये बिना बेदखल करना असंवैधानिक है।

     _यह उनके आजीविका के अधिकार (Right to Livelihood) का उल्लंघन है।_

         मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978): इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 21 के दायरे की व्याख्या करते हुए कहा कि “कानून की उचित प्रक्रिया” “कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया” का एक अभिन्न अंग है, यह समझाते हुए कि ऐसी प्रक्रिया निष्पक्ष, न्यायपूर्ण और उचित एवं तर्कसंगत होनी चाहिये।

 यदि कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया काल्पनिक, दमनकारी और मनमानी प्रकृति की है तो इसे प्रक्रिया बिल्कुल नहीं माना जाना चाहिये तथा इस प्रकार अनुच्छेद 21 की सभी आवश्यकताओं को पूरा नहीं किया जाएगा। 

      _नगर निगम, लुधियाना बनाम इंद्रजीत सिंह (2008): इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि यदि नगरपालिका कानून के तहत नोटिस देने का अधिकार प्रदान किया जाता है, तो इस अधिकार का अनिवार्य रूप से पालन किया जाना चाहिये।_

       देश के सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि कोई भी प्राधिकरण बिना नोटिस दिये तथा  कब्ज़ा करने वालों को सुनवाई का अवसर दिये बिना, अवैध निर्माणों हेतु भी सीधे विध्वंस कार्य नही़ कर सकता है। 

*अन्य महत्त्वपूर्ण निर्णय :*

        सर्वोच्च न्यायालय ने बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य (1980), विशाखा बनाम राजस्थान राज्य (1997) जैसे मामलों में तथा हाल ही में प्रसिद्ध पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ (2017) में इस सिद्धांत को निर्धारित किया है कि संविधान के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकारों को पढ़ा और उनकी व्याख्या इस तरह से की जानी चाहिये जो अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के साथ उनकी अनुरूपता को बढ़ाएगा। 

आगे की राह –

    _यह उचित समय है कि भारत की संवैधानिक व्यवस्था के संरक्षक के रूप में न्यायपालिका कार्य करे और कार्यपालिका शक्ति के बेलगाम प्रयोग पर आवश्यक रोक लगाए। न्यायालयों को राष्ट्रवादी-लोकलुभावन विमर्श का मुकाबला करने के लिये अंतर्राष्ट्रीय कानून का उपयोग करना चाहिये।_

       आपराधिक कृत्य के दंडात्मक परिणाम के रूप में विध्वंस अभियान का औचित्य पूरी तरह से आपराधिक न्याय के स्थापित सिद्धांतों के खिलाफ है।

     _विध्वंस अभियानों का संचालन एक प्रतिशोधी उपाय के रूप में यहांँ तक कि हिंसा को रोकने के लिये घोषित उद्देश्य के साथ तोड़-फोड़ करना कानून के शासन के सिद्धांत का उल्लंघन है।_ 

(चेतना विकास मिशन)

Ramswaroop Mantri

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