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*हक़ीक़त,जज़्बात नहीं*

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शशिकांत गुप्ते

आज सीतारामजी सन 1953 में प्रदर्शित फिल्म दो बीघा ज़मीन के इस गीत की पंक्तियां गुनगुना रहे हैं
गीत लिखा है गीतकार शैलेद्रजी
मैने सीतारामजी पूछा आज पुराने गीत की पंक्तियां गुनगुनाने का कोई खास मकसद है?
सीतारामजी ने कहा उक्त पंक्तियां आज के संदर्भ में प्रासंगिक हैं।
अजब तोरी दुनिया, हो मोरे रामा
क़दम-क़दम देखी भूलभुलैय्या

सीतारामजी ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा आज आम आदमी की जो स्थिति है।
वह इन पंक्तियों में बयां होती है।
या-धरम सबकुछ बिकता है, लोग लगावें बोली
मुश्किल है हम जैसों की ख़ाली है जिनकी झोली

मैने कहा व्यंग्य के लिए उक्त पंक्तियों का प्रयोग उचित हो सकता है। लेकिन प्रत्यक्ष देखा गया है कि, प्रायः फिल्मी गीत कल्पनातीत ही होते हैं,और किसी निश्चित परिदृश्य के लिए लिखे जातें है। फिल्मी गीतों में लिखी शब्द रचना का व्यवहारिक जीवन में कोई तालमेल होना जरूरी नहीं है। उदाहरण के लिए मैंने कहा
फिल्म राम और श्याम के इस गीत की पंक्तियां जो गीतकार शकील बदायुनी ने लिखी हैं।
अब ना कोई भूखा होगा और ना कोई प्यासा
अब ना कोई नोकर होगा और ना कोई आंका

यह फिल्म प्रदर्शित हुई थी,सन 1967 में। आज सन 2023 में क्या स्थिति है।
आज तो वाणी की स्वतंत्रता पर ही खतरा मंडरा रहा है।
इस संदर्भ में शायर माहिर-उल क़ादरी यह शेर सटीक है।
अक़्ल कहती है दोबारा आज़माना जहल है
(जहल=अनपढ़, गंवार)
दिल ये कहता है फ़रेब-ए-दोस्त खाते जाइए
मेरी बात सुनकर सीतारामजी ने जवाब दिया सच में हम जज्बातों में आकर ही धोखा खा रहें हैं। इतना कहते हुए सीतारामजी ने शायर अख़्तर अली अख़्तर का ये शेर सुनाया।
मुझी को पर्दा-ए-हस्ती में दे रहा है फ़रेब
वो हुस्न जिस को किया जल्वा-आफ़रीं मैं ने

( जल्वा-आफ़री = सुंदरता की तारीफ)

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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