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मेडिकल छात्रों के पूर्व समाजवादी देशों में जाने के कारण

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,मुनेश त्यागी

भारत के 23000 छात्र यूक्रेन में फंसे हुए हैं। सरकार समय रहते इन छात्रों को वहां से निकालने में नाकाम रही है और अब उन्हें युद्ध की काली छाया ने आ घेरा है। यहां पर मुख्य सवाल यह उठता है कि भारत के इतने सारे छात्रों को इनकी संख्या लगभग 60,000 प्रतिवर्ष है जो विदेशों में डॉक्टरी पढ़ने जाते हैं। भारत के बाहर इन पूर्व समाजवादी देशों के मेडिकल में पढ़ाई के लिए जाना क्यों पड़ता है?
 इसके बहुत से कारण है जैसे भारत की दोषपूर्ण शिक्षा व्यवस्था, शिक्षा में जन स्वास्थ्य की शिक्षा में सरकार द्वारा पर्याप्त मात्रा में धन न खर्च करना और भारतीय सरकार द्वारा अपनी स्वास्थ्य प्रणाली विकसित न करके स्वास्थ्य की एलोपैथिक प्रणाली चिकित्सा प्रणाली को अपनाना, भारत में पर्याप्त मेडिकल कॉलेजों का न होना, भारत में 1.33 अरब जनसंख्या पर लगभग 550 मेडिकल कॉलेज हैं जिनमें मात्र 60 से 70000 छात्रों को ही शिक्षा दी जाती है। बहुत सारे प्राइवेट कॉलेजों में पर्याप्त सुविधाएं और शिक्षा की गुणवत्ता भी मौजूद नहीं है, शिक्षा पर होने वाला खर्च जिसे केवल धनवान लोग ही वहन कर सकते हैं, भी छात्रों को बाहर जाने के लिए विवश करता है। प्रशिक्षण और शिक्षा की बेहतर सुविधाएं और अवसरों की कमी भी मेडिकल छात्रों को इन पूर्व समाजवादी देशों में भेजने को मजबूर करती हैं।
इन सब वजहों से भारत के मेडिकल छात्र विदेशों की ओर रुख करते हैं। वे भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में जाना पसंद नहीं करते। भारत में आज 1000 जनसंख्या पर 1.5 डॉक्टर भी उपलब्ध नहीं है। यही हाल ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य और दूसरी सेवाओं का पर्याप्त मात्रा में न होना भी है। भारत में विशेषज्ञ डॉक्टर की बड़ी भारी कमी है क्योंकि सरकारी नीतियां और स्वास्थ्य पर खर्च होने वाले बजट की अपर्याप्त उपलब्धता है। यूरोप के कई देश, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका आदि कई देश मेडिकल सिस्टम को कई सब्सिडी प्रदान करते हैं।
 मेडिकल छात्रों का पूर्व समाजवादी देशों में शिक्षा पाने के लिए जाने का मुख्य कारण है कि वहां की मेडिकल शिक्षा को भारी मात्रा में छूट प्रदान की जाती है, शिक्षा पर पर्याप्त बजट खर्च किया जाता है, वहां की शिक्षा, रहना, खाना बेहद कम खर्चीली है, वहां की शिक्षा उच्च कोटि की है, दाखिले भी आसानी से हो जाते हैं। रूस, यूक्रेन मध्य एशिया के देश और पूर्व समाजवादी देशों में मेडिकल की पढ़ाई बेहतरीन किस्म की है और वहां के मेडिकल इक्विपमेंट्स भी आधुनिकतम स्तर के हैं। यहीं पर यह बताना भी जरूरी है कि भारत में डॉक्टरी कोर्स करने के लिए 1 करोड रुपए तक खर्च होते हैं जबकि समाजवादी देशों में पढ़ने, रहने, खाने का खर्चा कुल 25 से 30 लाख रुपए है केवल इतने रुपए में ही पूर्व समाजवादी देशों से या वर्तमान समाजवादी देशों से कोई भी योग्य छात्र मेडिकल की डिग्री प्राप्त कर सकता है।
 मेडिकल छात्रों द्वारा विदेशों में जाने की समस्या केवल भारत की ही नहीं है बल्कि इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, कनाडा में भी मेडिकल ग्रेजुएटस की भारी संख्या में कमी है। यहां के डाक्टर ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी सेवाएं प्रदान करने को तैयार नहीं हैं क्योंकि उन्हें पर्याप्त सुविधाएं और अवसर मुहैया नहीं कराए जाते। भारत में 10% डॉक्टर भी ग्रामीण क्षेत्रों में नहीं जाना चाहते। आखिर पूर्व समाजवादी देशों और चीन, रूस, कोरिया और क्यूबा जैसे वर्तमान समाजवादी देशों में देशों में यह सब समस्याएं क्यों नहीं हैं ? इसका मुख्य कारण है कि वहां की शिक्षा और स्वास्थ्य पर पर्याप्त बजट का प्रावधान है, वहां की मेडिकल शिक्षा को बाजार की शक्तियों के हवाले नहीं किया गया है, वहां डाक्टरी पेशे का मुख्य उद्देश्य जनता की सेवा करना है, पैसा कमाना नहीं। वहां पर  आधुनिकतम स्तर की शिक्षा, स्वास्थ शिक्षा, प्रशिक्षण और अवसर मौजूद हैं, वहां पर स्वास्थ्य सेवाओं को उच्चतम मानवीय सेवा समझा जाता है।
  यहां पर समाजवादी क्यूबा का जिक्र करना बेहद आवश्यक है वहां पर जनसंख्या के अनुपात में दुनिया में सबसे ज्यादा में 10000 लोगों पर 167 यानी 1000 लोगों पर सात डाक्टर मौजूद हैं, जबकि भारत में 10000 लोगों पर केवल 6 डाक्टर मौजूद हैं यानी कि भारत से 10 गुना ज्यादा डॉक्टर मौजूद हैं और अधिकांश समाजवादी देशों में लगभग यही स्थिति है।
 उपरोक्त तथ्यों के हालात के मद्देनजर कहा जा सकता है कि भारत में शिक्षा व्यवस्था, मेडिकल कॉलेजों की संख्या, शिक्षा की गुणवत्ता, अवसर की उपलब्धता और शिक्षा और स्वास्थ्य शिक्षा पर पर्याप्त बजट जैसे कारणों पर गंभीरता से विचार करना होगा, तभी मेडिकल क्षेत्र में हो रहे ब्रेन ड्रेन को रोका जा सकता है और छात्रों को बाहर जाने से रोका जा सकता है और यह सब सुविधाएं सभी योग विद्यार्थियों को डॉक्टरों को मिलनी चाहिए इसे कुछ धनवानों की गिरफ्त से निकालना होगा।
 यही पर हम कह सकते हैं कि अगर एमबीबीएस की फीस कम और सीट ज्यादा होती तो हमारे छात्र विदेश में पढ़ने नहीं जाते। भारत की आबादी के अनुपात में हमें जितने डॉक्टर की जरूरत है उसके लिए भारत में मेडिकल की पढ़ाई मुफ्त शिक्षा और हर जिले में मेडिकल कॉलेजों की सुविधा का विस्तार करने की विस्तार करने की जरूरत है। जबकि मोदी सरकार गैर जिम्मेदाराना तरीके से लाखों करोड़ों रुपए की पत्थर की मूर्तियां, स्मारकों,धार्मिक राजनीतिक आयोजनों पर फिजूलखर्ची कर रही है मगर शिक्षा स्वास्थ्य और सुविधाओं की और उसका कोई ध्यान नहीं है। 
 हकीकत यह भी है कि जिस देश में विद्यालयों, विश्वविद्यालयों की जगह जनता के टैक्स के पैसे से मंदिर बनवाए जाएंगे, मूर्तियां बनवाई जाएंगी तो ऐसे में बच्चे पढ़ने विदेश तो जाएंगे ही और वे वहां जाएंगे जहां उन्हें बेहतर शिक्षा सुविधाएं उपलब्ध होंगी और क्योंकि पूर्व समाजवादी देशों में और वर्तमान समाजवादी देशों में मेडिकल शिक्षा की सुविधाएं पर्याप्त मात्रा में और आधुनिक आधुनिक स्तर की है इसलिए हमारे छात्रों को वहां जाना पड़ता है। यह उनका शौक नहीं उनकी मजबूरी है।

Ramswaroop Mantri

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