डॉ. विकास मानव
_कुछ समय पहले काशी में एक महात्मा रहते थे : रामेश्वरानंद। वास्तव में वे संत थे–विरक्त, निस्पृह और निर्विकार।_
सुना था–बाबा कभी ब्रिटिश सेना में कोई बड़े अधिकारी थे। किसी कारणवश नौकरी छोड़कर हिमालय की ओर चले गए और जब वापस लौटे तो उनका भीतर-बाहर –सब कुछ बदल चुका था–तन भी, मन भी और आत्मा भी।

चेहरे पर एक विशेष प्रकार की आभा फूट आयी थी। पूर्ण संत हो गए थे रामेश्वरानंद बाबा। बचपन के मानव, विद्यार्थी मानव यानी मेरे प्रति उनका विशेष लगाव था। मैंने ने अपनी खोज और आंतरिक उपलब्धि की उनसे चर्चा की तो बाबा मुस्कराए और बोले :
मनुष्य के लिए प्रकृति की लीलाएं रहस्यमयी हैं, अनबूझ हैं। भौतिक जगत या ब्रह्मांड विलक्षण घटनाओं से भरा पड़ा है। सच पूछा जाय तो हमारा यह विश्व कल्पनाओं से भी अधिक विलक्षण है। प्रकृति में ही सब कुछ विद्यमान है। यह पार्थिव जगत विराट प्रकृति का ही एक छोटा हिस्सा है।
इस जगत में जितनी भी रोमांचक व विलक्षण घटनाएं हैं, सबका सम्बन्ध प्रकृति से है। मानव बुद्धि के लिए रहस्यमयी प्रतीत होने वाली घटनाओं के समाधान प्रकृति के परे जाकर किसी काल्पनिक जगत में खोजने की आवश्यकता नहीं है।
अब प्रश्न यह है–क्या प्रकृति के ये तमाम रहस्य मानव के लिए बुद्धिगम्य हैं ?
दर्शन के इस मूलभूत प्रश्न को वैदिक चिंतकों ने भी उठाया था। विश्व की उत्पत्ति के बारे में कोई कुछ नहीं जानता। देवता भी बाद में हुए। इसलिए कोई नहीं जानता।
विज्ञान का सरोकार अभी सिर्फ भौतिक जगत से है। अध्यात्म क्या है ?–इस प्रश्न का उत्तर भी वह भौतिक सीमाओं में खोजता है। लेकिन विज्ञान यह दावा नहीं करता कि उसने प्रकृति के सारे रहस्यों को जान लिया है। विज्ञान ने प्रकृति की अनेक गुत्थियां सुलझाई हैं परंतु अभी भी अनबूझ रहस्यों का विस्तार बहुत बड़ा है।
ऐसी ही कुछ अनबूझ घटनाओं पर अलौकिकता का आरोपण किया जाता है और प्रायः कहा जाता है कि विज्ञान के पास इनका कोई समाधान नहीं है। विज्ञान अपूर्ण है।
अध्यात्म के अंतर्गत प्राणशक्ति की चर्चा होती है। प्राण के बारे में बाबा ने आगे कहा–प्राण के कारण मन को गति मिलती है और उससे विचार को गति मिलती है और उस गति से मन, विचार, इच्छा आदि सभी में विद्युत उत्पत्ति होती है। प्राणशक्ति अत्यंत सूक्ष्म है।
इन्द्रियों से उसे ग्रहण करना सम्भव नहीं। वही शक्ति जब स्थूल रूप में विकसित होती है तो उसे विज्ञान की भाषा में ‘मैटर’ कहते हैं। दृश्यमान भौतिक जगत के मूल में वही एकमात्र तत्व है। विज्ञान जिस विद्युतशक्ति से परिचित है, वह प्राण की विद्युतशक्ति की अपेक्षा बहुत स्थूल है और उसकी गति भी कम है।
इसका कारण यह है कि विद्युतशक्ति भौतिक तत्वों के संघर्ष से उत्पन्न होती है, जबकि प्राण की विद्युतशक्ति उसके स्पंदनों के संघर्ष से उत्पन्न होती है। जिस प्रकार भौतिक विज्ञान का मूल आधार विद्युतशक्ति है, उसी प्रकार योगविज्ञान तथा तंत्रविज्ञान का मूल आधार प्राण की विद्युतशक्ति है।
जितना भी अर्जन संभव है, ध्यान से संभव है. ध्यान की अनेक विधियां हैं. कई की चर्चा और प्रक्रिया हम यहां आपसे साझा कर चुके हैं. आज एक सरलतम, सहजतम ध्यान विधि आपके लिए :
*स्वर्णिम प्रकाश के लिए ध्यान :*
(MeditatioN for GoldeN LighT)
सबसे अच्छा समय सुबह-सुबह का है, ठीक उसी समय जब आधे सोए और आधे जागे होते हो। प्रक्रिया बड़ी सरल है। इसके लिए किसी मुद्रा, किसी योगासन, किसी स्नान इत्यादि, किसी चीज की जरूरत नहीं है।





