डॉ. विकास मानव
ईश्वर की खोज करना अध्यात्म या दर्शन नहीं है। पुराने योग-सूत्रों ने ईश्वर की चर्चा ही नहीं की, बात ही नहीं उठाई. कोई जरूरत न थी। उसके बाद ईश्वर की चर्चा हुई भी तो उसको अध्यात्म की खोज का एक साधन कहा गया, साध्य नहीं। उसे भी कहा कि यह साधना में सहयोगी होता है इसलिए ईश्वर को मान लेना अच्छा है। साधना में सहयोगी होता है, अध्यात्म की खोज में, इसलिए। तो ईश्वर की कल्पना एक उपकरण है. ईश्वर भी एक विधि है : बस।
बुद्ध ने इनकार कर दिया, महावीर ने ईश्वर को इनकार कर दिया। उन्होंने दूसरी विधियां खोज लीं। उन्होंने कहा, इस विधि की कोई भी जरूरत नहीं है। अगर विधि ही है ईश्वर, तो फिर दूसरी विधियों से भी काम चल सकता है।
लेकिन बुद्ध और महावीर भी खुद को इंकार नहीं किए. ईश्वर कल्पित है, मिथक है, लेकिन अप जीवंत हैं, प्रत्यक्ष हक़ीक़त हैं. आप स्वयं साक्षी हैं. साक्षी को इनकार नहीं कर सकते; ईश्वर को इनकार कर सकते हैं।
सब कुछ इनकार किया जा सकता है, लेकिन अध्यात्म की जो आत्यंतिक आधारशिला है वह साक्षी है, उसे इनकार नहीं किया जा सकता। इसलिए चाहे ईसाइयत, चाहे इस्लाम, चाहे हिंदू, चाहे जैन, चाहे बौद्ध, एक बात आप खोज लेना: अगर किसी भी धर्म में साक्षी की कोई बात हो, तो समझना कि वह धर्म है; अगर साक्षी की बात ही न हो, तो समझना कि उसका धर्म से कोई भी संबंध नहीं है। बाकी सब बातें गौण हैं; सब बातें गैर-उपयोगी हैं; सब बातों में मतभेद हो सकता है, साक्षी के मामले में मतभेद नहीं हो सकता।
अगर किसी दिन सच में दुनिया में धर्म का विज्ञान निर्मित होगा तो उसमें ईश्वर, ब्रह्म, इन सबकी चर्चा नहीं होगी, क्योंकि ये सब स्थानीय बातें हैं, कोई धर्म मानता है, कोई नहीं मानता; लेकिन साक्षी की चर्चा जरूर होगी, क्योंकि साक्षी स्थानीय घटना नहीं है। धर्म ही नहीं हो सकता बिना साक्षी के। तो साक्षी भर एक वैज्ञानिक आधारशिला है समस्त धर्म-अनुभव की, समस्त धर्म की खोज और यात्रा की। इस साक्षी पर ही सारे उपनिषद घूमते हैं, इर्द-गिर्द। सारे सिद्धांत और सारे इशारे इस साक्षी को दिखाने के लिए हैं।
हमारा जो मन है वह एक तीर की तरह है, जिसमें एक तरफ फल लगा हुआ है तीर का। तीर को आपने देखा है? तीर दो तरफ नहीं चल सकता। अगर आप तीर को चला दें, तो एक ही तरफ जाएगा। या कि आप सोचते हैं दो तरफ भी जा सकता है? तीर के दो तरफ जाने का कोई भी उपाय नहीं है। तीर जाएगा अपने निशाने की तरफ, एक तरफ।
जब प्रत्यंचा पर कोई तीर को चढ़ाता है, और प्रत्यंचा से तीर छूटता है, तो दो बातें खयाल में ले लें। प्रत्यंचा, जहां वह चढ़ा था, वहां से छूट जाता है, दूर हटने लगता है; और जहां वह नहीं था – साध्य, लक्ष्य – उस तरफ बढ़ने लगता है। एक स्थिति यह थी कि प्रत्यंचा पर चढ़ा था तीर, दूर बैठा था पक्षी वृक्ष पर, उसकी छाती में नहीं चुभा था तीर, तीर था प्रत्यंचा पर, पक्षी पर नहीं था; फिर छूटा तीर, प्रत्यंचा से दूर होने लगा और पक्षी के पास होने लगा। फिर एक स्थिति आई कि पक्षी की छाती में चुभ गया; प्रत्यंचा खाली रह गई और तीर पक्षी की छाती में हो गया।
पूरे समय हम यही कर रहे हैं कि जब भी हमारे ध्यान का तीर छूटता है तो हमारी प्रत्यंचा से खाली हो जाता है, भीतर से; और जिसकी तरफ जाता है उस पर जाकर टिक जाता है।
कोई चेहरा आपको सुंदर लगा, तीर छूट गया ध्यान का। भीतर नहीं है अब तीर; अब ध्यान भीतर नहीं है; अब ध्यान भागा और दौड़ा और सुंदर चेहरे से जाकर लग गया। सड़क पर हीरा पड़ा है, तीर छूट गया प्रत्यंचा से। अब ध्यान भीतर नहीं है; अब ध्यान भागा, दौड़ा और जाकर चुभ गया हीरे की छाती में।
अब ध्यान हीरे में है, अब आप में नहीं है; या ध्यान अब कहीं और है। तो आपके सब ध्यान के तीर कहीं, कहीं जाकर छिद गए हैं। आपके पास भीतर कोई ध्यान नहीं है, हमेशा बाहर जा रहा है।
तीर तो इकतरफा ही हो सकते हैं, लेकिन ध्यान दोतरफा हो सकता है। और वही हो जाए, तो साक्षी का अनुभव होता है। ध्यान का तीर दोतरफा हो सकता है; उसमें दो फल हो सकते हैं। जब आपका ध्यान किसी की तरफ जाए, तो आप अगर इतना कर पाएं, तो आपको साक्षी का अनुभव किसी न किसी दिन हो जाएगा।
जब आपका ध्यान किसी पर जाए, रास्ते से गुजरी कोई सुंदर युवती, कोई सुंदर युवक – आपका ध्यान अटक गया। तब आप अपने को बिलकुल भूल गए। यहां भीतर ध्यान न रहा। अब आप होश में नहीं हैं। अब आप बेहोश हैं, क्योंकि आपका होश तो किसी और के पास चला गया। अब आपका होश तो उसकी छाया बन गया। अब आप होश में नहीं हैं।
अगर आप यह काम कर सकें कि कोई आपको सुंदर दिखाई पड़ा, ध्यान उस पर गया, उस समय इस पर भी भीतर ध्यान जाए जहां से प्रत्यंचा से तीर छूट रहा है; उसकी तरफ भी हम एक साथ ही अगर देख पाएं; जहां से ध्यान जा रहा है वह स्रोत और जिसकी तरफ ध्यान जा रहा है वह लक्ष्य, अगर दोनों हमारे ध्यान में एक साथ आ जाएं, तो आपको पहली दफा पता चलेगा कि साक्षी का क्या अर्थ है।
कहां से ध्यान जा रहा है, उस स्रोत का अनुभव होना चाहिए – कहां से ध्यान पैदा हो रहा है!
वृक्ष हमें दिखाई पड़ता है; शाखाएं दिखाई पड़ती हैं; फूल-पत्ते दिखाई पड़ते हैं; फल लग जाते हैं वे दिखाई पड़ते हैं; जड़ें हमें नहीं दिखाई पड़तीं, जड़ें अंधेरे में छिपी हैं। लेकिन वहीं से वृक्ष रस ले रहा है।
आपका ध्यान फैलता है चारों तरफ, जगत का बड़ा वृक्ष निर्मित हो जाता है। लेकिन जहां से ध्यान निकलता है, जिस स्रोत से, जिस चैतन्य के सागर से निकलता है, उस तरफ का आपको कोई भी पता नहीं है। उन जड़ों का भी बोध साथ-साथ होने लगे, एक साथ आपको दोनों बात दिखाई पड़ने लगे।
इसे ऐसा समझें : आप मेरे ध्यान शिविर में प्रतिभागी बने हैं. मैं बोल रहा हूं, तो आपका ध्यान मेरे बोलने पर लगा है। इसको दोहरा तीर बना लें। यह दोहरा तीर अभी, इसी वक्त भी बन सकता है। जब मैं बोल रहा हूं, तो आप केवल मैं जो बोल रहा हूं वही न सुनें, आपको यह भी स्मरण रहे कि मैं सुन रहा हूं। बोलने वाला कोई और है, वह बोल रहा है; मैं सुनने वाला हूं, मैं सुन रहा हूं। अगर आप एक क्षण को भी – अभी, यहीं – ये दोनों बातें एक साथ कर लें: सुनें भी और सुनने वाले का स्मरण भी, रिमेंबरिंग भी भीतर बनी रहे कि मैं सुन भी रहा हूं।
शब्द दोहराने की जरूरत नहीं है। अगर आप कहें कि मैं सुन रहा हूं, तो उतनी देर में आप सुन न पाएंगे; जो मैंने कहा वह चूक जाएगा। भीतर शब्द बनाने की जरूरत नहीं है कि मैं सुन रहा हूं, मैं सुन रहा हूं। अगर आपने ऐसा किया तो उतनी देर आप बहरे हो जाएंगे।
उस सेकेंड आप अपनी भीतर की आवाज सुनेंगे कि मैं सुन रहा हूं, लेकिन जो मैं बोल रहा हूं यहां से वह आपको सुनाई नहीं पड़ेगा।
मैं जो बोल रहा हूं वह सुनाई पड़ता रहे, और साथ ही आपको यह भी स्मरण हो जाए – शब्दों में नहीं – यह भी आपकी प्रतीति साफ हो जाए कि इधर सुनने वाला भी बैठा है। इधर सुनने वाला है, उधर बोलने वाला है। ये दोनों एक साथ आपकी चेतना में झलक जाएं, तत्क्षण आपको साक्षी का अनुभव हो जाएगा कि साक्षी क्या है। साक्षी वह है जो इन दोनों को देख रहा है।
थोड़ा और भीतर प्रवेश करें : आप सुन रहे हैं, मैं बोल रहा हूं, साक्षी वह है जो दोनों का अनुभव कर रहा है कि बोला जा रहा है, सुना जा रहा है। जब आपकी चेतना का तीर दोहरा हो जाता है तो तत्क्षण आप तीसरे बिंदु पर खड़े हो जाते हैं।
मैंने बोला; यह एक बिंदु हुआ। साधारणतः आपका ध्यान इसी पर लगा रहता है। आपने सुना भी, आप सुनने वाले हैं, ऐसी भी आपको प्रतीति हुई, एहसास हुआ, अनुभव हुआ; यह दूसरा बिंदु हो गया। यह दूसरा बिंदु पाना बहुत कठिन है। अगर यह दूसरा बिंदु आपको मिल जाए तो तीसरा बिंदु पाना बहुत सरल है।
वह तीसरा बिंदु यह है कि बोलने वाला है ‘अ’, सुनने वाला है ‘ब’, फिर आप कौन हैं भीतर जो कि दोनों को अनुभव कर रहे हैं – बोलने वाले को भी और सुनने वाले को भी! आप तीसरे हो गए, दि थर्ड प्वाइंट। वह जो तीसरा बिंदु है, वही साक्षी है। इस तीसरे के पार नहीं जाया जा सकता। यह तीसरा आखिरी बिंदु है।
यह है त्रिकोण जीवन का। दो बिंदु: विषय और विषयी। और तीसरा बिंदु: दोनों का साक्षी; दोनों को अनुभव करने वाला; दोनों को भी देख लेने वाला; दोनों का भी गवाह।





