
-निर्मल कुमार शर्मा
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन या international labor organization या ILO के अनुसार ‘प्रवासी मजदूर या श्रमिक उसे कहते हैं ,जो काम की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं या जो पहले से ही अपने स्थान से दूसरे स्थान पर प्रवास कर चुके हैं या प्रवासी श्रमिक या मजदूर वे श्रमिक होते हैं जो रोजगार के उद्देश्य से एक राज्य से दूसरे राज्य में या एक देश से दूसरे देश में पलायन करते हैं। ‘

संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार ‘प्रवासी श्रमिक जो किसी भी प्रकार की पारिश्रमिक गतिविधि में लगे हुए होते हैं ऐसे श्रमिक जिनके पास पूर्ण दस्तावेज नहीं हैं और न ही अपनी कानूनी औपचारिकता पूरी की है,लेकिन फिर भी देश में उनका प्रवास अधिकृत लंबाई से भी अधिक है !
अचानक लगाए लाकडाउन का सबसे बड़ा खामियाजा प्रवासी मजदूर भुगते !
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भारत में केंद्र सरकार द्वारा केवल 4घंटे की मोहलत पर 24 मार्च 2020 को लागू लाकडाउन के बाद 9अप्रैल 2020 तक सबसे ज्यादा 192 मौतें प्रवासी मजदूरों की ही घर लौटते समय हुईं थीं ! ये असहाय प्रवासी मजदूर बिना भोजन, बिना पानी,बिना परिवहन,बिना दवाओं और यहां तक कि सिर पर बिना छत के रहने को मजबूर कर दिए गए ! हालांकि इन परिस्थितियों का ध्यान पहले से ही रखा जा सकता था, लेकिन इस आसन्न संकट के प्रति सरकार को कदम उठाना बिल्कुल जरूरी नहीं लगा !
लॉकडाउन लगाने के दिन मतलब 24 मार्च 2020 के अगले दिन केन्द्र सरकार ने समाज के कमजोर वर्गों के लिए 1.7 लाख करोड़ रुपए के राहत पैकेज की घोषणा की,पांचवें दिन गृह मंत्रालय ने प्रवासियों की आवाजाही को प्रतिबंधित करने के लिए राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों को आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत आदेश जारी किया,मंत्रालय ने राज्यों को उन सभी प्रवासी कामगारों को मानक स्वास्थ्य प्रोटोकॉल के अनुसार 14 दिनों की न्यूनतम अवधि के लिए आश्रय में रोकने के लिए कहा जो घर जा रहे थे, उन्हें सार्वजनिक जगहों से दूर करने के लिए हरियाणा और चंडीगढ़ के प्रशासन ने इनडोर स्टेडियमों को अस्थायी जेलों में बदल डाला ! इस बीच उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य अधिकारियों ने प्रवासी श्रमिकों पर औद्योगिक कीटाणुनाशक का छिड़काव तक कर किया ! 29 मार्च 2020 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रेडियो में इस विपदा को संवेदना भरे शब्दों में कहा कि उन्होंने “सामाजिक रूप से पिछड़े भाइयों और बहनों ” से माफी मांगी और कहा कि कोविड-19 का सामना करने के लिए उनके पास देश में लॉकडाउन लगाने के अलावा “कोई दूसरा रास्ता ही नहीं ” था !
65 लाख प्रवासी मजदूरों को कोई अधिकार नहीं !
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विकासशील देशों के अनुसंधान और सूचना प्रणाली या Research and Information Systems of Developing Countries के प्रोफेसर अमिताभ कुंडू के अनुमान के अनुसार भारत में लगभग 65 लाख अंतर्राज्यीय प्रवासी श्रमिक हैं ! ये अपने मूल राज्य के बाहर रहने के कारण छुट्टी पर जाने या मतदान करने के लिए घर जाने में असमर्थ हैं इसलिए इनकी चिंताओं को उनकी संख्या की ताकत के अनुसार राजनीतिक महत्व नहीं मिलता है ! उदाहरणार्थ इसी देश के सैनिक,सरकारी कर्मचारी,जो विदेश में तैनात हैं और यहां तक कि भारत मे ना रहने वाले भारतीय भी डाक से मतदान करने के लिए पात्र हैं लेकिन इस तरह का कोई भी प्रावधान प्रवासी मजदूरों के लिए नहीं रखा गया है !
प्रवासी कामगारों के लिए उपलब्ध एकमात्र कानूनी संरक्षण 1980 में लागू हुआ था जिसे अंतर-राज्य प्रवासी कामगार (रोजगार और सेवा की शर्तें ) अधिनियम या Inter-State Migrant Workers (Employment and Conditions of Service) Act के नाम से जानते हैं ,यह अन्य सभी बातों के साथ न्यूनतम मजदूरी का भुगतान करने, प्रवासी श्रमिकों को आवास और यात्रा भत्ते का भुगतान करने के लिए बाध्य करता है,कानून में पांच या अधिक अंतर्राज्यीय प्रवासियों को रोजगार देने वाले सभी संस्थान भी शामिल हैं !
सत्तारूढ़ सरकारों द्वारा प्रवासी मजदूरों के मामले में सुप्रीम कोर्ट की भी अवमानना !
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वर्ष 1983 में भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत संघ के मामले में इस कानून को “व्यापक और विस्तृत व्याख्या ” दी ,अदालत ने इस कदम की आवश्यकता पर जोर दिया क्योंकि प्रवासी श्रमिक “पूरी तरह से एक अजीब वातावरण में रहते हैं, जहां उनकी गरीबी,अज्ञानता और अशिक्षा के कारण वे पूरी तरह से असंगठित, असहाय होते हैं और शोषण के आसान शिकार बन रहे हैं । ” इसने यह स्पष्ट किया कि अधिनियम की धारा 30 द्वारा प्रदान की गई शक्तियों को अधिभावी करते समय इसका मतलब था कि इसने इससे उलट किसी भी कानून,अनुबंध या स्थायी आदेशों को रद्द कर दिया है,यह प्रवासी श्रमिकों को कर्मचारी राज्य बीमा,भविष्य निधि और मातृत्व लाभ से वंचित नहीं करता है !
पहले से ही कानून में निहित प्राथमिक नियोक्ताओं,ठेकेदारों और राज्य सरकारों के दायित्वों के अलावा,भारतीय सुप्रीमकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पी.भगवती द्वारा लिखित इस फैसले ने इसके कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए केंद्र पर भी बोझ डाला था उन्होंने लिखा, “केंद्र सरकार संसद द्वारा राज्य के नीति निर्देशकद
सिद्धांतों का अनुपालन करते हुए श्रमिकों को बुनियादी मानवीय गरिमा का जीवन प्रदान करने के लिए बनाए गए विभिन्न सामाजिक कल्याण और श्रम कानूनों के पालन को सुनिश्चित करने के लिए बाध्य है.” 1982 में पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स बनाम भारत संघ या People’s Union for Democratic Rights Vs Union of India के मामले में दिए गए एक अन्य फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने जोर दिया था कि श्रम कानून का उल्लंघन करने से होने वाला लाभ ऐसे उल्लंघनों के लिए देय हर्जाने से अधिक नहीं होना चाहिए। “

कथित कृषि प्रधान देश में सबसे ज्यादा दुखी कृषक व प्रवासी कृषि मजदूर !
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मोदीराज के मजदूर विरोधी दुर्नीतियों की वजह से देश के दिहाड़ी मजदूरों की आत्महत्याओं के आंकड़े भयावहतम् हो चले हैं ! उनकी दर्दनाक हालात बयान करते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो या National Crime Records Bureau के हाल ही में आई एक रिपोर्ट के अनुसार अप्रवासी दिहाड़ी मजदूरों की आत्महत्या की दर अन्य वर्गों की तुलना में कहीं बहुत अधिक है ! कुल हुई आत्महत्या की संख्याओं में से 25.6 प्रतिशत इसी अप्रवासी दिहाड़ी मजदूरों के वर्ग से संबन्धित हैं। उनकी दयनीय स्थिति इस बात से भी जाहिर होती है कि पिछले कुछ सालों में ऐसे मामले लगातार बढ़ रहे हैं !उदाहरणार्थ वर्ष 2014 में 15735 अप्रवासी भारतीय दिहाड़ी मजदूर आत्महत्या किए,जो वर्ष 2020 में ये संख्या दोगुनी बढ़कर 37666 मजदूरों ने आत्महत्या करके अपना जीवन समाप्त कर लिए ! वर्ष 2021में यह दर 2.66गुना बढ़कर आत्महत्या करनेवाले मजदूरों की संख्या 42004 तक पहुंच गई ! यह दु:खद स्थिति आर्थिक दृष्टिकोण से अत्यंत गरीब और समाज के अंतिम पायदान पर खड़े दिहाड़ी मजदूर वर्ग की घोर अभाव ग्रस्त जिंदगी के प्रति भारतीय समाज और सत्तारूढ़ सरकारों की घोर उदासीनता और मजदूर विरोधी दुर्नीतियों को ही दर्शित करता है ! भारत सरकार के संस्थान नीति आयोग के आंकड़ों के मुताबिक या According to the data of NITI Aayog देश के कुल श्रमिकों का 85 प्रतिशत विशाल हिस्सा अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत दिहाड़ी मजदूरों या Daily Wage Laborers working in the Informal Sector का ही है।
नेताओं की कथनी के बिल्कुल उलट करनी !
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विडंबना यह है कि हर चुनाव के समय हर राजनैतिक दल किसानों और मजदूरों के जीवन को बेहतर बनाने के दावे का खूब धुंआधार प्रचार करते हैं ! कैप्टन अमरिन्दर सिंह सरकार द्वारा एकत्र किए गए क़र्ज़ दस्तावेजों के अनुसार पंजाब के किसानों पर 31मार्च 2017 तक 73777 करोड़ रुपये का संस्थागत क़र्ज़ था। गांव या शहर के साहूकारों से लिया क़र्ज़ इससे अलग था। उस समय जब किसानों का क़र्ज़ माफ करने की बात चली तो लगभग हर राज्यों के मजदूरों ने भी अपनी क़र्ज़ माफी की गुहार लगाई। एक सरकारी सर्वेक्षण के अनुसार हर मजदूर परिवार पर भी औसतन 77 हजार रुपये के क़र्ज़ है ! लेकिन केंद्र और राज्य सरकारों ने कर्ज में डूबे मजदूरों के हक में कोई भी बड़ा कदम नहीं उठाया है। लंबे समय तक तो सरकारों ने कर्ज से होने वाली मौतों के तथ्यों को ही स्वीकार नहीं किया !
सच को स्वीकारने वाला राजीव गांधी जैसा और कोई नहीं !
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इस देश में लंबे समय से न्यूनतम मजदूरी कानून सही रूप में लागू नहीं होने के चलते दिहाड़ीदार वर्ग को उचित लाभ नहीं मिल पाया है बल्कि उनके लिए बनाई गई योजनाओं में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर ही बार-बार चर्चा होती रही है। वर्ष 1980 के दशक में प्रधानमंत्री रहे राजीव गांधी के बयान को अक्सर उद्धृत किया जाता है कि दिल्ली से चलाई जाने वाली कल्याणकारी योजनाओं के लिए 90 फीसदी पैसा रास्ते में ही गायब हो जाता है और केवल दस प्रतिशत ही सही जगह पर पहुंचता है ! कम से कम भारत के प्रधानमंत्री पद पर कार्यरत एक बहादुर शख्स ने इस सच्चाई को स्वीकार तो किया ! आज के वर्तमान समय में बेरोज़गारी, भूखमरी, अशिक्षा, भ्रष्टाचार,मंहगाई आदि दिवंगत प्रधानमंत्री राजीव गांधी के समय से कई गुना ज्यादा है ! लेकिन इस सच्चाई को स्वीकार करने के बजाय पूरा सरकारी अमला कथित अमृत महोत्सव और स्वर्ण काल मनाने में व्यस्त है और मस्ती में झूम रहा है !
महिला प्रवासी मजदूरिनों के अधिकारों की घोर उपेक्षा !
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अधिकांश महिला प्रवासी श्रमिक गंतव्य देशों में पुरुषों की तुलना में अधिक योगदान देती हैं लेकिन भेदभाव, दुर्व्यवहार और शोषण के अतिरिक्त जोखिमों का सामना पुरूष मजदूरों से बहुत ज्यादा करती हैं।
दुनिया भर में 244 मिलियन से अधिक प्रवासी मजदूरों में से आधे महिलाएं हैं, और अनुमानित 20% अनियमित परिस्थिति में हैं।
अधिकांश महिलाएं गंतव्य देशों में व्यवसायों में पुरुषों की तुलना में अधिक योगदान देती हैं,जैसे कि देखभाल करने वाली, जबकि अपने मूल देशों में अपने परिवारों की भलाई के लिए और भी अधिक योगदान करतीं हैं, लेकिन महिला प्रवासी मजदूरिनों को विशेष रूप से भेदभाव,दुर्व्यवहार और शोषण का खतरा सबसे ज्यादा बना रहता है ! इसके अलावा अब देखने में यह आ रहा है कि आत्महत्या करने वाली महिला प्रवासी श्रमिकों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है। महिला प्रवासी मजदूरों के साथ दुर्व्यवहार तब और तेज हो जाता है जब उनकी अप्रवास स्थिति जोखिम भरी होती है। उन्हें अक्सर सबसे बुनियादी श्रम सुरक्षा,व्यक्तिगत सुरक्षा,उचित प्रक्रिया गारंटी,स्वास्थ्य देखभाल और उनके बच्चों को शिक्षा से वंचित कर दिया जाता है। वे अक्सर नस्ल, पहचान और उम्र के आधार पर अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर दुर्व्यवहार और उत्पीड़न का सामना करतीं हैं और वे अक्सर अवैध व्यापार,दासता या यौन उत्पीड़न का जोखिम उठातीं हैं !
घरेलू काम करनेवाली महिला प्रवासी मजदूर सबसे कमजोर समूह हैं !
घरेलू काम करनेवाली महिला प्रवासी श्रमिक सबसे कमजोर समूह हैं। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के अनुसार, दुनिया भर में 53 मिलियन महिलाएं और लड़कियां निजी घरों में घरेलू कामगारों के रूप में कार्यरत हैं। वे सफाई करते हैं, खाना बनाते हैं, बच्चों की देखभाल करते हैं, परिवार के बुजुर्ग सदस्यों की देखभाल करते हैं और अपने नियोक्ताओं के लिए आवश्यक कार्य देते हुए अन्य देखभाल करते हैं।
अपनी महत्वपूर्ण भूमिका के बावजूद, वे दुनिया में सबसे अधिक शोषित और दुर्व्यवहार करने वाले श्रमिकों में से हैं ! वे न्यूनतम वेतन से काफी कम मजदूरी के लिए अक्सर सप्ताह में सातों दिन 14 से 18 घंटे काम करतीं हैं। और उनके काम को अक्सर राष्ट्रीय श्रम संहिता के तहत काम के रूप में मान्यता भी नहीं दी जाती है !
नीति निर्माताओं को महिला प्रवासी मजदूरिनों के लिए सम्यक कानून बनाने चाहिए
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इसलिए हर देश में नीति निर्माताओं और अन्य हितधारकों को मुख्य मानवाधिकार संधियों और विशेष रूप से महिलाओं के खिलाफ भेदभाव के सभी रूपों के उन्मूलन पर कन्वेंशन के अनुरूप श्रम प्रवास कानूनों और नीतियों को विकसित करने में एक लिंग-संवेदनशील और अधिकार आधारित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। और प्रवासी कामगारों की समिति या Migrant Workers Committee (CMW), साथ ही प्रासंगिक ILO श्रम मानक या Labor Standards को न्यायोचित ढंग से लागू करना चाहिए।
सीएमडब्ल्यू राज्यों को उम्र, वैवाहिक स्थिति, गर्भावस्था या मातृत्व की स्थिति के आधार पर महिलाओं के प्रवास पर लिंग-विशिष्ट प्रतिबंधों और भेदभावपूर्ण प्रतिबंधों को निरस्त करने की भी सलाह देता है, जिसमें उन प्रतिबंधों को शामिल किया जाता है जिनके लिए महिलाओं को पासपोर्ट प्राप्त करने के लिए अपने पति या पुरुष अभिभावक से अनुमति लेने की आवश्यकता होती है। इस प्रतिबंध से उन्हें मुक्त करने का कानून बनना चाहिए।
नीति निर्माताओं को गांधीजी के सलाह पर भी थोड़ा ध्यान देना चाहिए
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गांधीजी का कहना था कि सरकारों द्वारा बनाई जानेवाली नितियों को इस हिसाब से बनाया जाना चाहिए कि उसका लाभ समाज में सबसे निचले पायदान पर रहनेवाले गरीब लोगों को भी पहुंचे,लेकिन आज वर्तमान समय में गरीबों के खाने के निवाले पर भी जीएसटी लागू कर उन्हें और महंगा कर दिया गया है ! दूसरी तरफ बड़े औद्योगिक घरानों के लिए गए 11लाख करोड़ मतलब 110 खरब रूपये के कर्जे को एनपीए के चोर दरवाजे से माफ कर दिया गया ! दूसरे शब्दों में उन्हें मुफ्त की रेवड़ी बांट दी गई ! इससे बड़ी विडंबना क्या होगी !
-निर्मल कुमार शर्मा गाजियाबाद उप्र संपर्क – 9910629632,





