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सावधान! युवाओं को निगल रही है बढ़ती बेरोजगारी

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सुसंस्कृति परिहार, Author at जनचौक

सुसंस्कृति परिहार
 मां बाप का बच्चों को अपना पेट काटकर पढ़ाना। उसके बाद नौकरियों के लिए उनका दर दर भटकना।कई जगह आवेदन करना ,परीक्षाएं देते रहना , इंटरव्यू  फेस करने के बाद, नियुक्ति पत्र के इंतज़ार में सालों गंवाने के बाद  भी नियुक्ति जब आकाश कसुम हो जाए तो ऐसा नवजवान अपनी तमाम ऊर्जा खपाने के बाद क्या करेगा ।उसकी मन:स्थिति क्या होगी इसकी कल्पना करके ही सिहरन होने लगती है।जिस पर  परिवार का बोझ भी हो उस पर जो गुज़रती है वह भला क्या करेगा ? बस एक ही रास्ता बचता है कि वह आकाश कुसुम लाने इस दीन दुनिया से छलांग ही लगा ले।ऐसी उलझन में हज़ारों युवा अपनी जान गंवा रहे हैं।इस तरफ ना तो केंद्र दिलचस्पी ले रहा है ना ही राज्य सरकारें।फलत:ये समस्या उबल रही है।जिसको लेकर युवा असंतोष बढ़ने लगा है यूपी में आंदोलन जारी है एम पी में तो युवाओं को खदेड़ कर भागने मज़बूर कर दिया गया। जिससे ना केवल युवाओं में बल्कि उनके परिजनों में गहरा आक्रोश भी पनप रहा है।अफ़सोसनाक ये है कि एक तो नौकरियां देने वाले बड़े संस्थान निजीकरण की भेंट चढ़ गए हैं या उन्हें बंद कर दिया गया है।स्कूल,रेल, आयुध निर्माणी जैसे क्षेत्रों में नौकरियों को कम कर उनसे काम चलाया जा रहा है।सेना में भी भर्तियां घटी हैं।स्कूलों और रेलों की संख्या घटाकर भर्ती कम कर दी गई है ।सेना ,शिक्षा और स्वास्थ्य का बजट घटाया गया है फिर नियुक्तियां कैसे संभव होंगी ये विचारणीय विषय है।


पिछले दिनों अन्तर्राष्ट्रीय आत्महत्या दिवस ने  ये घाव तरोताजा कर दिए ।याद आई  भोपाल के मिसरोद थाना क्षेत्र के सहारा स्टेट के  मामले की, जहां एक फ्लैट में ये वारदात हुई । बेरोजगारी और आर्थिक तंगी से परेशान होकर इंजीनियर ने पत्नी के साथ जहर पी लिया  और दोनों बेटे-बेटियों को ब्लेड से काट डाला था।इसी भांति मध्य प्रदेश में ही नियुक्ति के इंतजार में 32 हजार शिक्षक तीन साल से इंतजार में हैं 75 की हो चुकी मौत, हाल ही में तीन वर्ष पूर्व  चयनित खरगौन के एक शिक्षक ने कीटनाशक पीकर  बच्चे सहित आत्महत्या कर ली। ऐसे  घटनाक्रम बढ़ते जा  रहे  हैं जब नौकरियां ही ना के बराबर होंगी तो यह सब होना स्वाभाविक है। हम आत्महत्या के बढ़ते आंकड़ों से चौंकते हैं कि आखिर लोग ऐसा कैसे और क्यों करते हैं। किंतु सरकार को इस विषय पर सोचने की फुर्सत नहीं  तो क्या इन ऊर्जा से भरे युवाओं को ऐसे ही मरने छोड़ देंगे। बिल्कुल नहीं इससे तो आने वाली पीढ़ियां भी बर्बाद हो जाएंगी। अब  यह हम सबकी यानि समाज की ये जिम्मेदारी बनती है कि अगली बार जब हम ऐसी बात सुनें या आंकड़ों को देखें तो चौंकेें नहीं,  कि ये आंकड़े क्यों बढ़ रहे हैं ?बल्कि इसे रोकने का चुनौती पूर्ण कार्य अपने कंधों पर लें। कैसे हम इन लोगों की मदद कर सकते हैं, क्योंकि आज ये आंकड़े हैं, लेकिन कल इनमें कोई जाना-पहचाना हो सकता है। इसलिए उनकी मदद कीजिए, क्योंकि उन्हें इसकी जरूरत है। इसी सोच से इस समस्या का समाधान निकलेगा।मानसिक अवसाद के मरीजों के लिए कोलकाता में एक संगठन चलाने वाले किशोर चटर्जी कहते हैं, “हमारे पास ऐसे जितने मरीज या उनके फोन आते हैं वह अपने किसी न किसी मित्र या पारिवारिक सदस्य के जरिए आते हैं। मरीज को अपना अच्छा-बुरा नहीं सूझता. वह तो किसी तरह इस अवसाद से मुक्ति पाना चाहता है और कहीं से कोई सहारा नहीं मिलने की स्थिति में वह मौत का रास्ता चुन लेता है”
 इसके लिए सामाजिक संगठनों को मिल कर एक ठोस पहल करनी होगी ।इसके लिए जागरुकता अभियान चलाने के अलावा हेल्पलाइन नंबरों के प्रचार-प्रसार पर ध्यान देना होगा। इसके साथ ही समाज में लोगों को अपने आस-पास ऐसे लोगों पर निगाह रखनी होगी जिनमें आत्महत्या या अवसाद का कोई संकेत मिलता है. मनोवैज्ञानिक डा. दिलीप कुमार बर्मन कहते हैं, “यह काम उतना आसान नहीं है. लेकिन पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों को मजबूत कर ऐसे ज्यादातर मामले रोके जा सकते हैं. इसके लिए सबको मिल कर आगे बढ़ना होगा. ऐसा नहीं हुआ तो यह आंकड़े साल दर साल बढ़ते ही रहेंगे. ऐसे मामलों पर अंकुश लगाने की ठोस रणनीति व पहल के बिना विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस महज खानापूरी बन कर रह जाएगा।
आपको यह भी स्मरण होगा कि किसानों ने इससे पूर्व सबसे अधिक आत्महत्याएं कीं। अब क्या वे संतुष्ट हैं नहीं पर आत्महत्याओं पर काफी विराम लग चुका है इसकी वजह है उनका अपना मज़बूत संगठन तथा सरकार से संघर्ष करने का पक्का इरादा। युवाओं को भी समाज को साथ लेकर इस तरह की शांतिपूर्वक मुहिम चलानी चाहिए वह उन्हें व्यस्त तो रखेगी ही साथ ही साथ बहुत से दुखियारों के बीच अपने दुख दर्द को कम महसूस करेंगे। उत्तर प्रदेश में सभी तरह के बेरोजगार एक जुट होकर आंदोलन जारी रखे हैं। वहां चुनावी वर्ष है कुछ महत्त्वपूर्ण काम हो सकता है। संगठन में शक्ति होती है इस पावर को गेन करने की परम्परा आवश्यकता है क्योंकि आजकल जनबल का ही ज़ोर है। वैसे लोकतंत्र को भी भीड़ तंत्र कहा गया है। इसलिए यह ताकत बढ़ाएं ।अपनी ऊर्जा को बढ़ाएं। आत्महंता ना बने । परिवार और समाज को भी आगे बढ़कर युवाओं को प्रेम और सहयोग करना होगा ।वे अकेले ना पड़ें।उनको हम सब का साथ ज़रूरी है।देश का भविष्य बचाएं। चंद साल ही तो हैं इस सरकार के पास आने वाला उनका ही होगा।जियो मस्त रहो।सुनो,आत्महंता ना बनो यह बुजदिली है।आओ संघर्ष करो।

Ramswaroop Mantri

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