राकेश श्रीवास्तव
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा
ऋतुराज की आहट मंद मंद कानों मे झंकृत हो रही है। आम्र मंजरियों की सुगंध मन को भिगोती हुई वातावरण मे मादकता का संचार कर रही है। सरसों के पीले फूलों के आवरण से लदी धरती मां अपनी सुगंध से सबको सिंचित करने के अपने पराक्रम मे व्यस्त हैं।शरद की शीतलता अभी बनी हुई है और आने को बेकरार बसंती बयार की आहट भी सुनाई पड़ती है।
आज बसंत पंचमी को विद्या की देवी सरस्वती के जन्म की मान्यतानुसार सरस्वतीपूजन किया जाता है।विद्या, बुद्धि,वाणी और संगीत की देवी को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणा वादनी और वाग्देवी आदि कई नामों से पूजा जाता है।फागुन के मदनोत्सव की आहट सुनाई पड़ने लगी है।बसंत के पुत्र कामदेव का भी पूजन किया जाता है।बसंत ऋतु का महत्व इस बात से समझा जा सकता है कि भगवान कृष्ण गीता में कहते है ऋतुओं में मैं बसंत हूँ।इसीलिए बसंत को ऋतुराज कहा गया है।बसंत ऋतु राग रंग और उत्सव मनाने के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी गई है।

पंत,प्रसाद,निराला,महादेवी आदि अनेक कवियों की प्रेरणा तो बसंत रहा ही पर उसके पूर्व सूर,तुलसी,
कबीर,रसखान, जायसी,भारतेंदु हरिश्चंद्र इसके रस में आकंठ डूबे चुके हैं।
बसंत पंचमी को जन्में सरस्वती पुत्र सूर्यकांत त्रिपाठी निराला प्रार्थना करते हैं
“वीणावादिनि वर दे!
प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नव
भारत में भर दे!
काट अंध-उर के बंधन-स्तर
बहा जननि, ज्योतिर्मय निर्झर;
कलुष-भेद-तम हर प्रकाश भर
जगमग जग कर दे!”
मालिक मुहम्मद जायसी पद्मावत के बसंत खंड मे बहुत मनोहारी चित्रण करते हैं।
आजु बसंत नवल ऋतुराजा । पंचमि होइ, जगत सब साजा ॥
नवल सिंगार बनस्पति कीन्हा । सीस परासहि सेंदुर दीन्हा ॥
बिगसि फूल फूले बहु बासा । भौंर आइ लुबुधे चहुँ पासा ॥
पियर-पात -दुख झरे निपाते । सुख पल्लव उपने होइ राते ॥
अवधि आइ सो पूजी जो हींछा मन कीन्ह ।
चलहु देवगढ गोहने, चहहुँ सो पूजा दीन्ह ॥
वसंतोत्सव की शुभकामनाएं





